Delhi NCR News: सिलिंडर के बगैर चूल्हा हुआ ठंडा, तो बदला काम, अब नो-गैस से चल रही जिंदगी

पेट पालने के लिए ठेले वालों ने अपनाया नो-गैस बिजनेस मॉडल, पराठे-पूड़ी छोड़ अब ठेले पर बिक रहा जूस और शिंकजी अमर उजाला ब्यूरोनई दिल्ली।राजधानी की सड़कों पर अब सुबह-शाम पराठों की खुशबू, पूड़ी-सब्जी की भाप और छोले-भठूरे की वह चिर-परिचित महक फीकी पड़ गई है। इसकी वजह जायके में कमी नहीं, बल्कि उन चूल्हों का बुझना है जिन पर ये व्यंजन पकते थे। रसोई गैस सिलिंडर की किल्लत और आसमान छूती कीमतों ने छोटे रेहड़ी-पटरी वालों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। नतीजतन, कई ठेले वालों ने भारी मन से अपना काम बदल लिया है। जो हाथ तवे पर पराठे सेंकते थे, अब वही मजबूरी में फल काटकर जूस बेच रहे हैं। शहर के कई इलाकों में अब छोले-भठूरे के ठेलों की जगह शिकंजी, चाट या सूखे स्नैक्स के स्टॉल नजर आने लगे हैं, जिनमें गैस की जरूरत नहीं पड़ती।ठेला विक्रेताओं का गणित अब पूरी तरह बिगड़ चुका है। सामान्यतः एक ठेले पर एक सिलेंडर एक सप्ताह तक चल जाता है। कुछ समय पहले तक जो सिलेंडर 1000 से 1500 में मिल जाता था, अब उसकी कीमत ब्लैक मार्केट में 3000 से 4000 के बीच पहुंच गई है। यानी हर हफ्ते 2500 का अतिरिक्त बोझ। महीने के हिसाब से देखें तो एक छोटे दुकानदार की जेब पर 10,000 की सीधी चपत लग रही है, जो अक्सर उनकी कुल मासिक बचत से भी ज्यादा होती है। एक ठेला संचालक ने बताया, कमाई भले ही आधी रह गई हो, लेकिन 4000 का सिलेंडर खरीदकर खाना बेचना अब घाटे का सौदा है।कीमतें बढ़ाईं तो घट गए ग्राहक :ठेला विक्रेताओं ने बताया कि महंगा सिलेंडर खरीदकर अपने सामन की कीमतों में थोड़ी बढ़ोतरी की गई, ताकि इसकी भरपाई हो सके। लेकिन इसका असर सीधा ग्राहकों की संख्या पड़ा है। प्रतिदिन आने वाले ग्राहकों में कमी होने लगी। इससे काफी नुकसान हुआ। ऐसे में नो गैस वाला बिजनेस माॅडल पर काम शुरू किया।पहले मैं पराठे और पूड़ी-सब्जी बेचता था, लेकिन गैस सिलिंडर मिलना मुश्किल हो गया। जो मिलता भी है, वह बहुत महंगा पड़ता है। इसलिए मजबूरी में गन्ने का जूस शुरू किया। कमाई पहले से कम है, लेकिन अब गैस की चिंता नहीं रहती।शोएब (गन्ने का जूस, शास्त्री पार्क)गैस सिलिंडर के दाम इतने बढ़ गए कि खाना बनाकर बेचना घाटे का सौदा हो गया। कई बार ब्लैक में लेना पड़ता था। अब फल का जूस बेच रहा हूं। मेहनत ज्यादा है, लेकिन खर्च कम है, इसलिए जैसे-तैसे काम चल रहा है।मुन्ने खान (फल जूस, राजघाट) पहले छोले-भठूरे और कचौड़ी बेचता था। गैस की किल्लत और महंगाई ने सब बदल दिया। अब शिकंजी बेच रहा हूं, क्योंकि इसमें गैस की जरूरत नहीं पड़ती। ग्राहक भी मिल रहे हैं, लेकिन पुराना काम ज्यादा अच्छा चलता था। -क्यूम मंसूरी (शिकंजी, रिंग रोड)गैस सिलेंडर समय पर नहीं मिलता और अगर मिलता है तो बहुत महंगा होता है। रोज-रोज इतना खर्च उठाना मुश्किल था। इसलिए गन्ने का काम शुरू कर दिया। आमदनी कम हुई है, लेकिन नुकसान से बच गए हैं।राम नरायण (गन्ना, रामलीला मैदान के पास)

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Apr 01, 2026, 19:01 IST
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