Holi: ब्रज की देहरी हाथरस में कभी टेसू के फूलों का चढ़ता था रंग, अब हर्बल गुलाल का है चलन
ब्रज की देहरी कहे जाने वाले हाथरस शहर में सजने वाले होली के बाजार ने बीते सात दशकों में लंबा सफर तय किया है। कभी टेसू के फूलों की खुशबू और उनके प्राकृतिक रंगों से सराबोर होने वाली होली आज हर्बल गुलाल के दौर तक पहुंच चुकी है। जनपद का रंग-गुलाल कारोबार अपनी अलग पहचान रखता है और देशभर में यहां तैयार उत्पादों की आपूर्ति होती है। आजादी से पहले हाथरस में बड़े पैमाने पर टेसू के फूलों की खेती होती थी। होली के अवसर पर इन फूलों को उबालकर तैयार किया गया केसरिया रंग आसपास के जनपदों तक भेजा जाता था। प्राकृतिक रंगों की मांग इतनी अधिक थी कि किसानों के लिए यह आय का अच्छा स्रोत माना जाता था। समय बदला और आजादी के बाद आधुनिक रंगों का चलन शुरू हुआ। डाइज कलर के माध्यम से रंग तैयार करने की छोटी-छोटी उत्पादन इकाइयां स्थापित हुईं। मस्जिद वाले चौराहे पर सबसे पहले एक यूनिट शुरू होने की चर्चा बुजुर्ग कारोबारी आज भी करते हैं। इसके बाद धीरे-धीरे अन्य परिवारों ने भी रंग बनाने का काम शुरू किया। बावजूद इसके बृज की देहरी हाथरस में होली की संस्कृति बरकरार है। यहां आज भी टेसू के फूलों का प्रयोग लोग होली पर करते हैं। ब्रज की सांस्कृतिक परंपरा में रची-बसी होली ने बदलते समय के साथ खुद को ढाला है। हमारा कारोबार आजादी से पहले का है। बुजुर्ग बताते थे कि एक समय केवल टेसू के फूलों से ही होली खेली जाती थी। उस दौर में यहां बड़े पैमाने पर खेती होती थी। आज भी हमारी दुकान से होली पर करीब 10 क्विंटल टेसू के फूलों की बिक्री हो जाती है। अब माल राजस्थान और मध्यप्रदेश से मंगाना पड़ता है।-रवि कुमार, जड़ी-बूटी विक्रेता। आजादी से पहले तक टेसू के फूलों का ही चलन था। बाद में डाइज कलर से रंग बनाने की शुरुआत हुई। बुजुर्ग बताते हैं कि सबसे पहली यूनिट मस्जिद वाले चौराहे पर खुली थी। समय के साथ कारोबार बढ़ता गया और अब हर्बल गुलाल के रूप में नया स्वरूप ले चुका है। सुरक्षा और गुणवत्ता को लेकर अब ग्राहक पहले से अधिक सजग हैं।-अभिनव गोयल, रंग-गुलाल कारोबारी।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Feb 21, 2026, 13:28 IST
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