मसाने की होली: बीच का रास्ता निकालिए, काशी के इस आयोजन को बंद कराने की बात मत करिए; पक्ष-विपक्ष में तर्क

मणिकर्णिका घाट पर मनाई जाने वाली मसाने की होली को लेकर विवाद और बढ़ गया है। आयोजकों का पक्ष इसे काशी की विशिष्ट परंपरा बता रहा है तो दूसरा शास्त्रसम्मत आधार पर सवाल खड़े कर रहा है। मर्यादा, महिलाओं की भागीदारी, भस्म के प्रयोग और भीड़ प्रबंधन जैसे मुद्दों पर बात हो रही है। अमर उजाला के कार्यालय में बुधवार को इन्हीं सब मुद्दों पर बात हुई। कुछ ने बीच का रास्ता निकालने की बात की तो कुछ लोगों ने कहा कि बीच का कोई रास्ता नहीं है। संवाद में आयोजक, धर्माचार्य, ज्योतिष, समाजसेवी और विद्वानों ने हिस्सा लेकर बात रखी। मसाने की होली हमारे शास्त्रों में नहीं है, वह हमारा अतीत नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि जो होता है उसमें लोक वाली चलती है या शास्त्र वाली। पूरा पूरब शब्दों का गलत उच्चारण करता है, तो क्या हम पूरे समाज को डंडा लेकर मारने दौड़ेंगे। नहीं। दौड़ना भी नहीं चाहिए। बीच का रास्ता, शास्त्र सम्मत रास्ता निकालना चाहिए। दो दशक में ही मसाने की होली खड़ी हो गई और अब उत्सव बन गई। इसे भी पढ़ें;Masan Holi: काशी में 15 से 20 लोगों के बीच ही खेली जा सकती है मसाने की होली, वजह जान लें अब सवाल यह है कि हम किस अधिकार से रोक रहे हैं और किस अधिकार से चला रहे हैं। मसाने की होली से जो शिकायतें हैं उन्हें दूर करना होगा। शास्त्रसम्मत हल तलाशना होगा। त्योहार को बनारसी बनाइए और गैर बनारसी तत्व को छोड़ना होगा। उस त्योहार को देश निकाला मत कहिए, उसे अपना बनाइए। -व्योमेश शुक्ला, प्रधानमंत्री, नागिरी प्रचारिणी सभा

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Feb 26, 2026, 12:07 IST
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