हिसार: अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से हरी भरी वसुंधरा संस्था के साथ अपराजिता कार्यक्रम का आयोजन

तेजी से बढ़ता प्रदूषण, प्लास्टिक का बढ़ता उपयोग, गंदा होता पानी, जहरीली हवा और खत्म होती हरियाली, ये सिर्फ शहरों की नहीं बल्कि गांवों तक फैल चुकी गंभीर समस्याएं हैं। इन्हीं चुनौतियों के बीच हिसार में महिलाओं के एक समूह ने “हरी भरी वसुंधरा” संस्था के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन बनाने का संकल्प लिया है। अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से रविवार को हरी भरी वसुंधरा संस्था के साथ अपराजिता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह संस्था केवल बातें नहीं करती, बल्कि ज़मीनी स्तर पर काम करते हुए पेड़ लगाने से लेकर वेस्ट मैनेजमेंट, बर्तन बैंक, नहरों की सफाई, महिलाओं व बच्चों को जागरूक करने और जैविक खेती को बढ़ावा देने तक निरंतर प्रयास कर रही है। संस्था की खास बात यह है कि इसमें जुड़ी महिलाएं अपने-अपने स्तर पर छोटे लेकिन प्रभावशाली बदलाव कर रही हैं। इनका मानना है कि अगर हर व्यक्ति अपने घर, मोहल्ले और आसपास से शुरुआत करे तो पर्यावरण को बचाना मुश्किल नहीं है। संस्था की गतिविधियों ने यह साबित कर दिया है कि महिलाएं चाहें तो घर से निकलकर ही नहीं, घर में रहते हुए भी पर्यावरण के लिए बड़ा योगदान दे सकती हैं। संस्था की संस्थापक सुनिता रहेजा ने बताया कि हरी भरी वसुंधरा की शुरुआत उन्होंने बढ़ते प्रदूषण को देखकर की। प्रदूषण कोई नई समस्या नहीं है, यह अंतरराष्ट्रीय स्तर की समस्या बन चुकी है। पहले हमने पेड़ लगाना शुरू किया, लेकिन फिर सवाल उठा कि पत्तों और कचरे का क्या होगा। पत्ते जलाए जा रहे थे, जिससे हवा और जहरीली हो रही थी। यहीं से वेस्ट मैनेजमेंट पर काम शुरू किया, खाद बनानी शुरू की और फिर डिस्पोजेबल के बढ़ते इस्तेमाल पर ध्यान गया। उन्होंने बताया कि धार्मिक आयोजनों और सामाजिक कार्यक्रमों में डिस्पोजेबल का अत्यधिक उपयोग न केवल धरती बल्कि इंसानों की सेहत के लिए भी खतरनाक है। इसी सोच से देश का पहला बर्तन बैंक शुरू किया गया। आज इसकी शाखाएं हिसार में 5–6 स्थानों पर, फरीदाबाद, सूरतगढ़ और हाल ही में सोनीपत में भी खुल चुकी हैं। मेरा सपना है कि हिसार को कम से कम डिस्पोजेबल मुक्त बनाया जाए। अनु ने बताया कि संस्था बच्चों को पर्यावरण के प्रति जागरूक कर रही है। हम स्कूलों में बच्चों को सिखा रहे हैं कि कचरा कैसे कम करें, सेग्रीगेशन क्यों जरूरी है। स्कूल फंक्शंस में बर्तन बैंक से बर्तन इस्तेमाल कराए जा रहे हैं ताकि थर्माकोल और प्लास्टिक का उपयोग न हो। उन्होंने यह भी बताया कि संस्था पुराने कपड़ों का सेग्रीगेशन कर उन्हें गूंज संस्था दिल्ली भेजती है, जहां से वे जरूरतमंदों तक पहुंचते हैं। दीप्ति और सुषमा ने कहा कि बदलाव की शुरुआत खुद से करनी होगी। अगर हम खुद पर्यावरण के लिए समर्पित होंगे तो हमारी देखा-देखी लोग भी जागरूक होंगे। मैं अपने स्कूल में बच्चों को शुरुआत से ही सिखाती हूं कि कक्षा में कचरा न फैलाएं। छोटे-छोटे कदम ही बड़े बदलाव लाते हैं। अनु जुगलान ने ग्रामीण क्षेत्रों में किए जा रहे काम पर प्रकाश डाला। प्रदूषण सिर्फ शहरों की समस्या नहीं है। गांवों में भी बीमारियां बढ़ रही हैं। मैं महिलाओं को जैविक खेती के लिए जागरूक कर रही हूं, ताकि वे अपने खाने के लिए ज़हर-मुक्त फसल उगाएं। हाइब्रिड बीजों और रसायनों के कारण न केवल सेहत बल्कि पक्षी और प्रकृति भी प्रभावित हो रही है। उन्होंने यह भी कहा कि कचरा कम पैदा करना, कचरे के निस्तारण से भी ज्यादा जरूरी है। निधि सहगल ने कहा कि आज फॉग नहीं बल्कि स्मॉग हमारी सांसों में घुल चुका है। महिलाएं अक्सर कहती हैं कि उनके पास समय नहीं है, लेकिन घर बैठे भी बहुत कुछ किया जा सकता है। कपड़े के थैले इस्तेमाल करना, प्लास्टिक न जलाना, पौधे लगाना, ये छोटे काम आने वाली पीढ़ियों के लिए बड़ा उपहार हैं। रेशमा ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उनका शौक अब जुनून बन चुका है। मैंने 45 गमलों से शुरुआत की थी, आज मेरे घर में 200 से ज्यादा गमले हैं। मैं घर का सारा किचन वेस्ट खाद में बदल देती हूं। मेरे घर से कोई भी जैविक कचरा बाहर नहीं जाता। कनवलजीत ने बताया कि उनकी बिल्डिंग में पूरी तरह प्लास्टिक फ्री व्यवस्था है। हमने बर्तन बैंक बनाया है। किसी भी कीर्तन, शादी या कार्यक्रम में प्लास्टिक की अनुमति नहीं है। बच्चों को खाने की जगह किताबें और स्टेशनरी देते हैं और झुग्गी-झोपड़ी के बच्चों को पढ़ाने का काम भी शुरू किया है। हरी भरी वसुंधरा से जुड़ी ये महिलाएं यह संदेश दे रही हैं कि पर्यावरण संरक्षण किसी एक संस्था या सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है। छोटे-छोटे प्रयास मिलकर ही धरती को फिर से हरा-भरा बना सकते हैं।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Dec 14, 2025, 19:42 IST
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