घर की हवा में छिपे माइक्रोप्लास्टिक कण: हर सांस के साथ बढ़ रहा जोखिम; एक घन मीटर हवा में कितनी होगी संख्या?

घर के अंदर की हवा अदृश्य माइक्रोप्लास्टिक कणों से भरी हो सकती है और लोग हर साल लाखों कणों को सांस के जरिये शरीर में ले रहे हैं। एक अध्ययन के मुताबिक, यह संख्या सालाना 2.2 करोड़ (22 मिलियन) तक पहुंच सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि माइक्रोप्लास्टिक का सबसे बड़ा स्रोत बाहरी वातावरण नहीं, बल्कि घर के अंदर की हवा है। विकसित और विकासशील देशों में लोग लगभग 50 से 90% समय घर के भीतर बिताते हैं, जिससे इन कणों के संपर्क की संभावना बढ़ जाती है। 2021 के एक अध्ययन के अनुसार, इनडोर हवा में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा बाहर की तुलना में करीब 8 गुना ज्यादा पाई गई। यह भी पढ़ें - स्वास्थ्य: सुस्त जीवनशैली लिवर के लिए खतरनाक, 33 साल में 143% बढ़े रोगी; जानें 2050 तक कितने लोग होंगे बीमार 'माइक्रोप्लास्टिक से पूरी तरह बचना संभव नहीं' एमोरी यूनिवर्सिटी की एक्सपोजर साइंस विशेषज्ञ डाना बार के अनुसार, माइक्रोप्लास्टिक हर जगह हैं, उनसे पूरी तरह बचना संभव नहीं है, लेकिन व्यवहार में बदलाव से इनके संपर्क को काफी हद तक कम किया जा सकता है। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार घर के अंदर मौजूद माइक्रोप्लास्टिक का सबसे बड़ा स्रोत सिंथेटिक कपड़े और घरेलू वस्त्र हैं। पॉलिएस्टर, नायलॉन जैसे कपड़े पहनने, धोने या सुखाने के दौरान बेहद महीन फाइबर हवा में फैलते रहते हैं। इम्पीरियल कॉलेज लंदन की शोधकर्ता स्टेफनी राइट के मुताबिक सोफा, पर्दे, बिस्तर, कालीन और कपड़े इन सभी में रोजमर्रा के इस्तेमाल से घर्षण होता है, जो माइक्रोप्लास्टिक पैदा करता है। ड्रायर और वॉशिंग मशीन भी इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं। ड्रायर गर्मी और घर्षण से सीधे हवा में कण छोड़ता है, जबकि वॉशिंग मशीन से ये कण पानी के जरिये बाहर निकलकर पर्यावरण को प्रभावित करते हैं। धूल बनकर फिर हवा में लौटते हैं कण। ये माइक्रोप्लास्टिक कण हवा से गिरकर घर की धूल में जमा हो जाते हैं, लेकिन हल्की सी हलचल जैसे चलना या सफाई करना उन्हें दोबारा हवा में उड़ा देती है। फ्रांस के नेशनल सेंटर फॉर साइंटिफिक रिसर्च के वैज्ञानिक जेरोन सोनके के अनुसार घर के अंदर एक घन मीटर हवा में औसतन 500 से ज्यादा माइक्रोप्लास्टिक कण मौजूद हो सकते हैं, जबकि कार के अंदर यह संख्या 2200 तक पहुंच सकती है। खाने से ज्यादा सांस के जरिये प्रवेश पहले माना जाता था कि माइक्रोप्लास्टिक मुख्य रूप से भोजन और पानी से शरीर में प्रवेश करते हैं, लेकिन अब कई वैज्ञानिकों का मानना है कि सांस लेना इससे भी बड़ा माध्यम हो सकता है। बीबीसी के अनुसार एक अध्ययन में पाया गया कि शेलफिश खाने से जहां सालाना करीब 4,620 कण शरीर में जाते हैं, वहीं खाना बनाने के दौरान हवा के जरिये इससे 3 से 15 गुना ज्यादा कण शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। ऐसे कम करें जोखिम माइक्रोप्लास्टिक से पूरी तरह बचना संभव नहीं है, लेकिन कुछ व्यवहारिक बदलाव जोखिम को काफी कम कर सकते हैं। प्राकृतिक फाइबर जैसे कॉटन, ऊन या लिनन के कपड़ों का उपयोग माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क को घटा सकता है, क्योंकि ये शरीर में टूट जाते हैं। कपड़ों को जरूरत पड़ने पर ही धोना और संभव हो तो बाहर सुखाना भी फायदेमंद है। वॉशिंग मशीन में विशेष फिल्टर लगाने से माइक्रोफाइबर का उत्सर्जन 90% तक कम किया जा सकता है। सफाई करते समय पहले गीले कपड़े से सतह पोंछना और फिर वैक्यूम करना बेहतर माना जाता है, ताकि कण हवा में कम उड़ें। यह भी पढ़ें -चिंताजनक: हर चार में एक डायबिटिज रोगी को लिवर की बीमारी का भी खतरा; लगभग 70% मरीजों में मिले फैटी लिवर हेपा (एचईपीए) यानी हाई-एफिशिएंसी पार्टिकुलेट एयर फिल्टर ऐसे उपकरण होते हैं जो बेहद छोटे कणों को भी पकड़ सकते हैं। ऐसे एयर प्यूरीफायर और वैक्यूम क्लीनर माइक्रोप्लास्टिक को कम करने में मददगार हो सकते हैं, हालांकि ये पूरी तरह समाधान नहीं हैं।सफाई के दौरान खिड़कियां खोलना या वेंटिलेशन बनाए रखना भी जरूरी है, ताकि हवा में मौजूद कण बाहर निकल सकें।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Apr 15, 2026, 02:55 IST
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