यूरोप में रिकॉर्डतोड़ हीटवेव: तेजी से बदल रही महाद्वीप की जलवायु, बदले मौसम पर वैज्ञानिकों ने क्या कहा?

यूरोप इस वर्ष दूसरी बार अभूतपूर्व हीटवेव की चपेट में है। लंदन, पेरिस, बर्लिन और फ्रांस सहित कई देशों में तापमान ने नए रिकॉर्ड बनाए हैं। प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका नेचर की रिपोर्ट के अनुसार, वैज्ञानिकों का कहना है कि यह केवल एक असामान्य मौसमीय घटना नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के गहराते प्रभावों का संकेत है। हालांकि इस बात पर मतभेद है कि यूरोप की जलवायु कब और किस हद तक बदली, लेकिन अधिकांश विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन नहीं घटा तो भविष्य में ऐसी भीषण गर्मी और अधिक सामान्य होती जाएगी। यूरोप में इस साल की दूसरी भीषण हीटवेव ने कई देशों में दशकों पुराने तापमान रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। फ्रांस के पिसोस शहर में तापमान 44.3 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो देश के इतिहास के सबसे गर्म दिनों में शामिल है। भीषण गर्मी और उससे राहत पाने के प्रयासों के दौरान डूबने जैसी घटनाओं सहित कम से कम 54 लोगों की मौत हो चुकी है। ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी की जलवायु वैज्ञानिक सारा पर्किन्स- किर्कपैट्रिक कहती हैं कि लंदन जैसे शहरों का 40 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंचना असाधारण घटना है, लेकिन भविष्य में ऐसी घटनाएं और अधिक देखने को मिल सकती हैं। वहीं, चेक गणराज्य, लिथुआनिया और लक्जमबर्ग के सभी अध्ययन किए गए शहरों में अभूतपूर्व गर्मी दर्ज की गई। जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई हीटवेव की तीव्रता: इंपीरियल कॉलेज लंदन की शोधकर्ता क्लेयर बार्न्स के अनुसार, वैश्विक ताप वृद्धि के कारण यूरोप की मिट्टी पहले से अधिक सूखी हो चुकी है। इससे वाष्पीकरण द्वारा होने वाली प्राकृतिक ठंडक कम हो जाती है और तापमान तेजी से बढ़ता है। इसके अलावा, वातावरण में एरोसोल घटे हैं। एरोसोल बादलों के निर्माण में सहायक होते हैं। बादल कम बनने से सूर्य की अधिक ऊर्जा सीधे धरती तक पहुंच रही है, जिससे गर्मी और बढ़ रही है। आखिर इतनी भीषण गर्मी क्यों पड़ रही है वैज्ञानिकों के अनुसार, वर्तमान हीटवेव के पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। सबसे पहला कारण वायुमंडलीय परिसंचरण (एयर सर्कुलेशन) का वह पैटर्न है, जो अफ्रीका और सहारा मरुस्थल की गर्म हवा को यूरोप तक पहुंचाता है। मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर मेटियोरोलॉजी की जलवायु मॉडलर लारा वालबर्ग के अनुसार यही प्रक्रिया पहले भी कई बड़ी हीटवेव का कारण रही है। पोट्सडैम विवि के जलवायु वैज्ञानिक स्टीफन राह्मस्टोर्फ का कहना है कि उत्तर अटलांटिक महासागर की सतह का तापमान कम होने पर सहारा से आने वाली गर्म हवा कुछ समय के लिए यूरोप के ऊपर फंस सकती है, जिससे अत्यधिक गर्मी पैदा होती है। इस महीने लगभग आधे शहरों में हीट स्ट्रेस के सर्वकालिक रिकॉर्ड टूट चुके हैं।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jun 28, 2026, 05:05 IST
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