West Asia and Trump Politics: ईरान के मामले में क्या राष्ट्रपति ट्रंप सफल हो पाएंगे, अमेरिका को डर क्या है?
ईरान और अमेरिका के बीच तनाव जारी है। दोनों पक्षों के लिए चुनौती मुश्किल है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई खामेनेई को अमेरिका के साथ भिड़ने का अंजाम पता है। इसी तरह अमेरिका के लिए भी यह राह आसान नहीं है। उसे लगता है कि कहीं अफगानिस्तान की तरह फंसे तो क्या होगा पहले बात ईरान की ईरान लंबे समय तक इराक से युद्ध लड़ने के बाद अपनी बड़ी ताकत खो चुका है। उसके पास घातक हापरसोनिक मिसाइलों के जखीरे, उन्नत ड्रोन, प्रतिबद्ध आईआरजीसी को छोड़कर कोई सशक्त वायुसेना, बहुत काबिल टैंक, जमीनी लड़ाई में सक्षम तकनीकी हथियारों के जखीरे और नौसेना की चौकाने वाली ताकत नहीं है। लेकिन सर्वोच्च नेता खामेनेई के साथ ईरान की बड़ी आबादी एकजुटता के साथ खड़ी है। दुनिया की शिया इस्लामिक मिलिशिया ईरान और खामेनेई के इस्लामिक दर्शन के कारण साथ है। मुस्लिम मिलिशियाचाहती है कि ईरान बर्बाद न हो। हालांकि तेहरान के मुहाने पर अमेरिका बर्बादी का साजो-सामान लिए खड़ा है। हर रोज नई और पहले से मजबूत चेतावनी के साथ धमका रहा है। भारतीय सामरिक और रणनीतिक मामले के विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान ऐसे कठिन समय में अपने भविष्य को ध्यान में रखकर ठोस कार्ययोजना बना रहा है। वायुसेना के पूर्व एयर वाइस मार्शल एन बी सिंह कहते हैं कि ईरान की तैयारी अमेरिका और इस्राइल को लंबे समय के युद्ध में उलझाने की हो सकती है। ईरान के सबसे घातक, मारक हथियार में सटीकता से मार करने वाली ध्वनि से 13-15 गुणा तेज गति वाली फतह-1, फतह दो हाइपरसोनिक मिसाइले हैं। दोनों परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम, रडार और निगरानी प्रणाली को चकमा देने, दागे जाने के बाद आसमान में रास्ता बदलकर टारगेट को ध्वस्त करने में सक्षम हैं। पश्चिम एशिया में अमेरिका के 20 साल पश्चिम एशिया में अमेरिका के सैन्य अड्डों का जाल है। पिछले 20 साल में अमेरिका ने इस क्षेत्र में बादशाहत के लिए बहुत बड़ा सैन्य कवच बनाया है। बहरीन (अमेरिका के पांचवें नौसैनिक बेड़े का मुख्यालय), कुवैत (कैंप आरिफजान,अली अल सलेम), कतर (अल उदैद), इराक (कुर्दिस्तान क्षेत्र), सीरिया (अल-तन्फ, अल-शदादी, कासरक अड्डा), संयुक्त अरब अमीरात(जेबेल अली पोर्ट), जार्डन(मुवाफ्फाक अल-साल्ती), सऊदी अरब(प्रिंस सुल्तान) में उसके सैन्य अड्डे हैं। अरब सागर में नौसैनिक फ्लीट है। उसके दो सबसे बड़े घातक और चलते फिरते युद्ध के मैदान यूएसएस अब्राहम लिंकन, यूएसएस जेराल्ड आर.फोर्र्ड दुनिया के किसी भी देश के सामरिक संतुलन और नक्शे को बिगाड़ने की क्षमता रखते हैं। इसके अलावा पनडुब्बियां, पानी, हवा, जमीन पर मार करने वाले घातक हथियार, आसमान से लेकर जमीन, जल की सुरक्षा, निगरानी, चेतावनी देने वाली प्रणालियां सब करीब-करीब तैनात हैं। अंतरिक्ष की आंख लगातार ईरान का एक्स-रे, स्कैन सब कर रही हैं। इसके सामने ईरान कहीं नहीं ठहरता है। इसी के बूते राष्ट्रपति ट्रंप खामेनेई के देश को दुनिया सुपर कब्रिस्तान बनाने की धमकी देते हैं। लेकिन खामेनेई की छोटी ताकत के आगे डरता है अमेरिका कभी-कभी समय बलवान होता है। रूस और चीन जैसे देश चाहते हैं अमेरिका पश्चिम एशिया में उलझे, फंसे। अमेरिका ने अपनी ताकत के बल पर अब तक इस इलाके का नक्शा बदला है। देशों के शासन बदले हैं। खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के बल पर वेनेजुएला के तत्कालीन राष्ट्रपति मादुरो को उनके सरकारी आवास से उठा लाया। इराक, सीरिया, लीबिया समेत तमाम देशों में सत्ता परिवर्तन किए। लेकिन ईरान को धमका पाने में उसके छक्के छूट रहे हैं। माना जा रहा है कि इसका कारण पिछले साल इस्राइल की कार्रवाई के बाद ईरान की उस पर जवाबी कार्रवाई के परिणाम रहे। एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह कहते हैं कि ईरान के मिसाइल जखीरों से अमेरिका के माथे पर शिकन है। ईरान के टारगेट पर अमेरिका का यूएसएस अब्राहम लिंकन और यूएसएस जेराल्ड आर फोर्ड रहेगा। इसे ईरानी मिसाइलों से बचा पाने की वाशिंगटन की ताकत सेना और तकनीक के पास कोई गांरटी नहीं है। इनमें से एक के टारगेट होने पर सुपर पॉवर की दुनिया के फायर पॉवर वर्ल्ड में किरकिरी होना भी स्वाभाविक है। माना जा रहा है कि ईरान के सर्वोच्च नेता को भरोसा दे रहे सहयोगी देश भी चाहते हैं कि अमेरिका और इस्राइल की दादागिरी की हवा निकले। मल्टी आर्डर वर्ल्ड बने। सबसे बड़ा डर लंबे युद्ध का अमेरिका के रणनीतिकारों को लंबे समय का युद्ध डरा रहा है। लंबे समय का युद्ध न केवल बहुत खर्चीला होता है, बल्कि सैन्य बलों के लिए भी बड़ी कठिनाई लेकर आता है। इससे दुनिया में कायम दबदबे में कमी आने का खतरा रहता है। इसका ताजा उदाहरण रूस-यूक्रेन के बीच में चल रहा युद्ध है। अमेरिका भी इसे भुगत चुका है। अफगानिस्तान में 20 साल तक सैन्य आपरेशन चलाने के बाद उसे तालिबान के हाथ में सत्ता सौंपकर हटना पड़ा। इसे लेकर अमेरिका की जग हंसाई हुई। राष्ट्रपति ट्रंप ने भी अपने पूर्ववर्ती जो बाइडेन को इसके लिए खूब चिढ़ाया। ईरान के सर्वोच्च नेता इसे बखूबी समझते हैं। स्टेट ऑफ हार्मुज को ब्लाक कर सकते हैं। लाल सागर में खतरे के कारण अंतरराष्ट्रीय नौवहन रुक सकता है। इस तरह से कैस्पियन सागर से अरब सागर तक पैदा हुई स्थिति दुनिया के अंतरराष्ट्रीय मार्ग को उलझा सकती है। .तो क्या चाहता है अमेरिका अमेरिका चाहता है कि उसके दबाव में ईरान बात मान ले। बिना युद्ध के बात बन जाए। अमेरिका को परमाणु हथियार वाला ईरान पश्चिम एशिया में अपने अस्तित्व के लिए खतरा दिखाई दे रहा है। उसकी मंशा है कि ईरान यूरेनियम संवर्धन के कार्यक्रम को या तो स्थगित कर दे या फिर नागरिक उपयोग के लिए निर्धारित अंतरराष्ट्रीय मानक की सीमा, निगरानी का पालन करे। यानी परमाणु हथियार विहीन ईरान। घातक हाइपरसोनिक मिसाइल कार्यक्रम से पीछे हटे। हालांकि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई का प्रशासन इस अमेरिकी शर्त पर बहुत संवेदनशील है। उसका स्पष्ट मानना है,जिसकी लाठी, उसकी भैंस। खामेनेई प्रशासन अपने इस सपने को साकार करने के लिए पूरी प्रतिबद्धता दिखा रहा है। ईरान और इस्लामिक मिलिशिया के लिए भी संदेश दे रहा है कि बने रहना है तो ताकत चाहिए।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Feb 21, 2026, 19:57 IST
West Asia and Trump Politics: ईरान के मामले में क्या राष्ट्रपति ट्रंप सफल हो पाएंगे, अमेरिका को डर क्या है? #World #International #SubahSamachar
