यूपीआई पर एमडीआर शुल्क: सुप्रीम कोर्ट में बोली सरकार- हमेशा मुफ्त सेवा का नहीं दिया भरोसा; मामले में आगे क्या?

केंद्र सरकार ने यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) के जरिये होने वाले 2,000 रुपये से अधिक के लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) शुल्क लगाने के प्रस्ताव का सुप्रीम कोर्ट में बचाव किया है। सरकार ने बृहस्पतिवार को अदालत में कहा कि व्यापारियों को कभी यह आश्वासन नहीं दिया गया था कि यूपीआई भुगतान की सुविधा हमेशा के लिए बिना किसी शुल्क के उपलब्ध रहेगी। सरकार का कहना है कि यह व्यवस्था अनुच्छेद 14 के तहत समानता की सांविधानिक कसौटी पर खरी उतरती है। सरकार के मुताबिक, एमडीआर का यह ढांचा वित्तीय समावेशन, किफायती डिजिटल भुगतान और देश के डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाबी हलफनामे में कहा कि संशोधित एमडीआर व्यवस्था पर काफी पहले से विचार किया जा रहा था। इसे विभिन्न हितधारकों के साथ परामर्श के बाद अंतिम रूप दिया गया है। सरकार ने अपने हलफनामे में स्पष्ट किया कि व्यापारियों को शून्य एमडीआर व्यवस्था हमेशा जारी रहने का कोई विशेष आश्वासन नहीं दिया गया था। साथ ही, सरकार की ओर से दी जाने वाली सब्सिडी अनिवार्य नहीं, बल्कि उसके विवेक पर निर्भर थी। केंद्र का यह जवाब वकील अंजन दत्ता की ओर से दायर जनहित याचिका के जवाब में आया है। याचिका में संशोधित एमडीआर व्यवस्था को चुनौती देते हुए आरोप लगाया गया है कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Nov 06, 2026, 01:57 IST
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