दवा कंपनियों से 8,447 करोड़ की वसूली अटकी: ब्याज हुआ दोगुना, मरीजों से ज्यादा कीमत लेने का 40 साल पुराना केस
मरीजों से तय कीमत से ज्यादा पैसा वसूलने वाली दवा कंपनियों से हिसाब चुकता करने में सरकार को लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। सरकार के मार्च 2026 तक के आधिकारिक रिकॉर्ड से पता चलता है कि वर्ष 1979 से लेकर अब तक कई मामलों में दवा कंपनियों से करीब 8,447 करोड़ रुपये की वसूली लंबित है, क्योंकि ज्यादातर बड़े मामले अदालतों में विचाराधीन हैं। सरकार ने दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण के लिए डीपीसीओ कानून बना रखा है। इसके बावजूद कंपनियों की ओर से मरीजों से अधिक कीमत वसूलने के मामले वर्षों बाद भी पूरी तरह नहीं सुलझ पा रहे हैं। क्यों बढ़ी दवा कंपनियों की देनदारी राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) के आंकड़ों से पता चलता है कि ओवरचार्जिंग के मामलों में एबॉट, फाइजर, सैंडोज, बायर, जेबी केमिकल्स, वायथ, कैडिला, एलेम्बिक, इंटास, लायका लैब्स जैसी बड़ी कंपनियों के नाम दर्ज हैं। कई मामलों में मूल ओवरचार्ज की राशि से कई गुना अधिक ब्याज और पेनाल्टी जुड़ चुकी है, जिससे देनदारी लगातार बढ़ती गई। ब्याज ने कई मामलों में रकम कई गुना बढ़ाई रिकॉर्ड के अनुसार, कई मामलों में मूल ओवरचार्ज कुछ करोड़ रुपये था, लेकिन वर्षों तक मामला लंबित रहने से ब्याज और पेनाल्टी जुड़कर देनदारी कई गुना बढ़ गई। मेरिंड लि. पर 21.34 करोड़ के ओवरचार्ज का मामला बढ़कर करीब 88.44 करोड़ तक पहुंच गया, जिसमें अब भी लगभग 20.71 करोड़ की वसूली बाकी है। वायथ के एक मामले में कुल देनदारी करीब 48 करोड़ तक पहुंच गई। लायका लैब्स के एक मामले में कुल बकाया देनदारी 23 करोड़ से अधिक होनी है। बड़ी कंपनियां भी जांच के दायरे में डाटा में जिन प्रमुख कंपनियों के नाम दर्ज हैं, उनमें एबॉट लैबोरेटरीज, फाइजर, बेयर इंडिया, कैडिला, एलेम्बिक, जे.बी. केमिकल्स, सैंडोज इंडिया, इंटास फार्मास्यूटिकल्स, लाइका लैब्स, वायथ, निकोलस पिरामल (अब पिरामल फार्मा समूह का हिस्सा) शामिल हैं। इनमें अधिकांश मामलों की स्थिति कानूनी विवाद के अधीन दर्ज है, जबकि कुछ मामलों में वसूली की प्रक्रिया अभी भी अंडर प्रॉसेस है।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Jul 15, 2026, 03:54 IST
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