एक और चेतावनी: हिमालय में बढ़ते आपदा जोखिम का इशारा है नेपाल की बाढ़ त्रासदी

नेपाल के पहाड़ी जिले रसुवा में तिब्बत सीमा के निकट भोटे कोशी नदी में आई भीषण बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी और आपदा-प्रबंधन की सीमाओं को एक बार फिर सामने ला दिया है। अचानक आई इस बाढ़ से भारी मानवीय क्षति के साथ मकानों, सड़कों, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं को हुए नुकसान ने जहां नेपाल के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है, वहीं बिहार और उत्तर प्रदेश के सीमांत जिलों में भी हाई अलर्ट जारी किया गया है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि बाढ़ की भयावहता के मद्देनजर उसके कारण को लेकर अभी स्पष्टता नहीं है। रसुवा जिले में उस समय ऐसी बारिश नहीं हुई थी, जो ऐसी प्रलयकारी बाढ़ को ला दे। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल के अनुसार, रसुवा में आपदा की स्थिति भूकंप के साथ आए हिमस्खलन के कारण हुई, हालांकि इसकी पुष्टि की जा रही है। कारण चाहे जो हो, इस आपदा ने हिमालय के बदलते चरित्र को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि, ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना और चरम मौसमी घटनाओं में वृद्धि ने हिमालय के अत्यंत संवेदनशील तंत्र में जोखिम को बढ़ा दिया है। गौरतलब है कि नेपाल, भारत और चीन की सीमाओं से जुड़ा हिमालयी क्षेत्र भौगोलिक रूप से परस्पर निर्भर है। ऐसे में, ऊपरी क्षेत्र में आई कोई आपदा कुछ ही समय में निचले क्षेत्रों की आबादी के लिए संकट बन सकती है। नेपाल टूरिज्म बोर्ड के अनुसार, भोटे कोशी नदी में आई बाढ़ के बाद सैकड़ों पर्यटक लापता हैं, जिनमें कम से कम 105 भारतीय शामिल बताए गए हैं। नेपाली सेना, आर्म्ड पुलिस फोर्स और नेपाल पुलिस को खोज और बचाव अभियान के लिए तैनात किया गया है। लेकिन, अचानक उमड़े पानी और मलबे की तेज धार ने गांवों और बाजारों में जिस तरह तबाही मचाई, उसे देखते हुए यह काम आसान नहीं होगा। चूंकि, नेपाल न केवल भारत का निकट पड़ोसी है, बल्कि उसके साथ रोटी-बेटी का संबंध भी है। नेपाल ने भारत से तत्काल मदद की अपील की है और बदले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बालेन शाह से बात करके न सिर्फ इस तबाही से हुई जान-माल की क्षति पर शोक व्यक्त किया, बल्कि हरसंभव मानवीय व राहत सहायता देने का भी आश्वासन दिया। रसुवा की त्रासदी केवल नेपाल के लिए नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए एक चेतावनी है कि प्रकृति की शक्ति के सामने मनुष्य की तैयारियां अब भी अपर्याप्त हैं। हिमालय को साझा विरासत मानते हुए संबंधित देश अगर आपदा पूर्व चेतावनी, वैज्ञानिक अध्ययन और त्वरित राहत का साझा ढांचा तैयार करते हैं, तभी ऐसी त्रासदियों में जान-माल की क्षति को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Aug 27, 2026, 05:05 IST
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