इस्लामाबाद में पकती नई खिचड़ी: इमरान खान को राहत ने बढ़ाई हलचल, बदलते सियासी समीकरण की आहट
पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट द्वारा जेल में बंद पूर्व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान को चिकित्सकीय जांच और परिवार से मुलाकात की अनुमति दिया जाना, पाकिस्तान की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत का संकेत देता है। यह मामला सिर्फ अस्पताल से जुड़ा नहीं है, बल्कि हो सकता है कि यह किसी बड़े सौदे का हिस्सा हो। हालांकि, अभी तक ऐसा कोई ठोस संकेत सामने नहीं आया है। यह कहना जल्दबाजी होगी कि क्या इतिहास खुद को दोहराएगा, जैसा कि अक्सर होता रहा है, चाहे किसी बड़े जन-आंदोलन के जरिये या फिर अंदरूनी कलह से मौजूदा सरकार के कमजोर पड़ने पर। शहबाज शरीफ सरकार की आर्थिक हालत खराब है और राजनीतिक स्थिति भी अच्छी नहीं है। गठबंधन से भुट्टो-जरदारी परिवार खुश नहीं है। राजनेताओं को लगता है कि सेना द्वारा देश को 300 यूनिट में बांटने की योजना से उनका प्रभाव कम हो जाएगा। अफगानिस्तान के साथ भी टकराव चल ही रहा है। और फिर, इमरान खान का मुद्दा भी है। पंजाब में उनकी लोकप्रियता अब भी कायम है, लेकिन इसकी असली परीक्षा अभी बाकी है। इस घटनाक्रम के बीच यह याद रखना जरूरी है कि पाकिस्तान की राजनीति को प्रभावित करने वाली दो प्रमुख ताकतें अब भी मौजूद हैं-पहली सेना, जो कभी इमरान खान का समर्थन करती थी, लेकिन अब प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के साथ है; और दूसरी ए यानी अमेरिका, जो इस क्षेत्र में अपने हितों के मुताबिक पाला बदलने के लिए मशहूर है। सेना के पास खान पर भरोसा करने की कोई खास वजह नहीं है। प्रधानमंत्री रहते हुए वर्षों तक खान कहते रहे कि वह और सेना एक ही सोच रखते हैं, लेकिन बाद में दोनों के रिश्ते बुरी तरह बिगड़ गए। अप्रैल 2022 में पद से हटाए जाने के बाद, उन्होंने आरोप लगाया कि सेना ने उनके संसदीय बहुमत को चुरा लिया है। उन्होंने अमेरिका पर भी आरोप लगाए। खान ने आसिम मुनीर को भी निशाना बनाया था। खान और सेना के बीच मतभेद पारंपरिक नागरिक-सैन्य टकराव से कहीं अधिक गहरे और गंभीर थे। यहीं नवाज शरीफ का मामला अलग नजर आता है। नवाज ने भी सेना से टकराव लिया था। तीन बार सत्ता से हटाए जाने और देश से बाहर किए जाने के बाद भी वह लौटे। उन्होंने वह बात समझ ली, जिसे बहुत कम पाकिस्तानी राजनेता समझ पाए हैं और वह यह कि राजनीति में टिके रहने के लिए सेना के साथ तालमेल जरूरी है। उनके छोटे भाई शहबाज इस मामले में कहीं ज्यादा माहिर साबित हुए हैं। इमरान का मामला अलग है। वह राजनीतिक दांवपेच खेलने वाले नेता कम और अपनी राजनीतिक सोच पर अडिग रहने वाले नेता ज्यादा हैं। उनकी साफगोई कई बार उनके लिए ही नुकसानदेह साबित होती है। उनकी लोकप्रियता की एक वजह यह भी है कि वह ऐसी बातें कहते हैं, जिन्हें कहने की हिम्मत दूसरे नेता नहीं जुटा पाते। सेना शायद अब हाशिये पर जा चुके नवाज के साथ काम कर सकती है। उनकी महत्वाकांक्षाएं चाहे जो भी हों, आखिरकार वह मौजूदा व्यवस्था के दायरे में रहकर ही शासन करना चाहते हैं। इसके उलट खान बार-बार कहते रहे हैं कि वह पूरी व्यवस्था को बदलना चाहते हैं। सेना मुख्यालय में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर खान को रिहा कर दिया जाता है और वह फिर सत्ता में लौटते हैं, तो पुराने टकराव की स्थिति दोबारा पैदा होने से कौन रोक पाएगा हो सकता है कि खान सचमुच सुलह चाहते हों। लेकिन, सेना को सिर्फ आज नहीं, भविष्य के बारे में भी सोचना है। और यहीं अमेरिका की भूमिका सामने आती है। खान ने एक बड़ी राजनीतिक गलती की। उन्होंने एक ही समय में सेना और अमेरिका, दोनों से टकराव मोल ले लिया। सत्ता से हटाए जाने के बाद खान का विदेशी साजिश वाला नैरेटिव, वाशिंगटन की तीखी आलोचना और सेना पर हमले ऐसे समय में हुए, जब पाकिस्तान दुनिया में अपनी जगह को नए सिरे से तय करने के लिए जूझ रहा था। आज हालात पूरी तरह अलग हैं। अमेरिका को पाकिस्तान में फिर एक उपयोगी साझेदार मिल गया है। मुनीर वाशिंगटन के लिए बातचीत का एक अहम माध्यम बन गए हैं। शहबाज शरीफ नागरिक सरकार का चेहरा हैं। पाकिस्तान ईरान के साथ उस तरह बातचीत कर सकता है, जैसा अमेरिका नहीं कर सकता। ट्रंप सार्वजनिक रूप से शहबाज और मुनीर, दोनों की तारीफ भी कर चुके हैं। वाशिंगटन के लिए यह ऐसा पाकिस्तान है, जो कुछ ठोस नतीजे दे सकता है। ऐसे में, ट्रंप प्रशासन इस व्यवस्था को क्यों बिगाड़ना चाहेगा शायद यही वजह है कि कोर्ट का यह आदेश इतना दिलचस्प है। खान को चिकित्सकीय सहायता मिल रही है। लेकिन, वह अब भी कैदी हैं। हालांकि, इसमें एक विरोधाभास भी है। हो सकता है कि सेना भी यह न चाहे कि खान हमेशा जेल में रहें, क्योंकि वह जितने लंबे समय तक जेल में रहेंगे, उनके समर्थकों के लिए उन्हें विरोध का प्रतीक बनाना उतना ही आसान होगा। नियंत्रित समझौता बेहतर विकल्प हो सकता है। अगर खान दोबारा प्रधानमंत्री बनते हैं, तो क्या होगा यही सवाल अमेरिका भी पूछेगा। ट्रंप के लिए सवाल यह नहीं है कि इमरान खान लोकतांत्रिक हैं या लोकतंत्र विरोधी, या वह पीड़ित हैं या अपराधी। ट्रंप की विदेश नीति लेनदेन पर आधारित है। उन्हें नतीजे चाहिए। मुनीर और शहबाज बेहतर स्थिति में हैं। वे ट्रंप के एहसानमंद भी हैं और चाहते हैं कि उन्हें नोबेल पुरस्कार मिले। फिलहाल, खान अनिश्चितता के प्रतीक हैं। पर, एक और संभावना भी है। हो सकता है कि वाशिंगटन चुपचाप खान की राजनीतिक वापसी का समर्थन करे, लेकिन अचानक रिहाई के बजाय किसी नियंत्रित समझौते के जरिये। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश सावधानी से नियंत्रित तनाव कम करने की शुरुआत हो सकता है। सेना शायद खान को थोड़ी राहत देने के लिए तैयार हो, लेकिन इतनी नहीं कि उन्हें पूरी राजनीतिक आजादी मिल जाए। शरीफ सरकार कोर्ट के आदेश का औपचारिक विरोध कर सकती है, लेकिन राजनीतिक तनाव कम करने के लिए खान को कुछ राहत दे सकती है। हालांकि, बहुत कुछ इमरान खान पर निर्भर करेगा। क्या वह सच में सेना के साथ समझौता करेंगे या फिर समझौते को सत्ता में वापसी की रणनीतिक सीढ़ी बनाकर बाद में पुरानी लड़ाई दोबारा शुरू कर देंगे मुनीर यही जानना चाहेंगे। शरीफ परिवार और शायद अमेरिका भी। शायद पाकिस्तान अब यह देखने का इंतजार कर रहा है कि क्या एक नया अध्याय शुरू हो सकता है-ऐसा अध्याय, जिसमें कोई भी पक्ष दूसरे को पूरी तरह राजनीति से बाहर न करे। और इस बार, इस क्षेत्र में अपनी गहरी दिलचस्पी को देखते हुए, अमेरिका की नजर शायद सिर्फ पन्ना पलटने पर नहीं, बल्कि इस बात पर भी होगी कि पाकिस्तान की पूरी किताब ही न बिखर जाए। edit@amarujala.com
- Source: www.amarujala.com
- Published: Aug 27, 2026, 04:19 IST
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