अनुसंधान अब रफ्तार पकड़ेगा: निजी क्षेत्र पहली बार सरकारी से अधिक, पहिया घूमना शुरू हुआ है, अब और तेजी से...
पहली बार ऐसा हुआ है कि भारत में अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) पर होने वाले खर्च में निजी उद्योग का योगदान सरकार के लगभग बराबर पहुंच गया है। अब सबसे बड़ा सवाल है कि क्या यह पैसा वास्तव में उन संस्थानों और प्रयोगशालाओं तक पहुंच रहा है, जहां नई तकनीक विकसित होती है पिछले महीने जारी एक सरकारी रिपोर्ट का एक अहम आंकड़ा इस ओर ध्यान खींचता है। 2023-24 में भारत के कुल आरएंडडी खर्च में निजी उद्योग की हिस्सेदारी बढ़कर 45.2 प्रतिशत हो गई, जबकि तीन साल पहले यह केवल 32.2 फीसदी थी। वहीं, सरकार की हिस्सेदारी 54.5 से घटकर 48.2 प्रतिशत रह गई। आरएंडडी खर्च के इतिहास में यह पहली बार है, जब सरकारी योगदान आधे से भी कम हो गया है। चाहे परमाणु ऊर्जा हो या अंतरिक्ष कार्यक्रम, रक्षा अनुसंधान प्रयोगशालाएं या फिर कृषि अनुसंधान जैसे बड़े क्षेत्रों की जिम्मेदारी, जिस देश में अनुसंधान का बोझ आजादी के बाद से ही सरकार के जिम्मे रहा हो, वहां यह महज आंकड़ों का मामूली हेरफेर नहीं है। यह इस बात का बदलाव है कि भारतीय विज्ञान के क्षेत्र में सबसे ज्यादा निवेश आखिर कौन कर रहा है। भारत में आरएंडडी पर खर्च तेजी से बढ़ रहा है। एक दशक में यह तीन गुने से अधिक बढ़कर 2023-24 में 2.45 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी 2020-21 के 0.64 प्रतिशत से बढ़कर 0.84 फीसदी हो गई, जो अब तक का सर्वोच्च स्तर है। वहीं, खरीद क्षमता के आधार पर भारत का आरएंडडी खर्च तीन वर्षों में लगभग दोगुना होकर 120 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। भारत में वैज्ञानिक शोध-पत्रों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसी वजह से वैज्ञानिक प्रकाशनों के मामले में भारत अब चीन और अमेरिका के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश बन गया है। इसी तरह, 2024-25 में दायर 1.10 लाख से अधिक पेटेंट आवेदनों में 62 फीसदी भारतीयों के थे, जबकि स्वीकृत पेटेंट में उनकी हिस्सेदारी 2013-14 के 15 प्रतिशत से बढ़कर 32 प्रतिशत हो गई। देश में अब 5.07 लाख पूर्णकालिक शोधकर्ता हैं। तीन साल पहले यह संख्या 262 थी। इसमें महिलाओं की भागीदारी 18.6 प्रतिशत से बढ़कर 29 प्रतिशत हो गई है। यह बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इसके साथ कुछ अहम सवालों पर भी ध्यान देना जरूरी है। भारत आज भी अपनी जीडीपी का केवल 0.84 प्रतिशत आरएंडडी पर खर्च करता है। यह चीन, दक्षिण कोरिया, इस्राइल और अमेरिका की तुलना में एक-तिहाई से भी कम है। 2025-26 के लिए अनुमानित 0.90 प्रतिशत खर्च के बाद भी भारत ब्राजील से पीछे ही रहेगा, जबकि तकनीक के क्षेत्र में अग्रणी बनने की चाह रखने वाले देशों के लिए जीडीपी का कम से कम दो प्रतिशत आरएंडडी पर खर्च करना शुरुआती मानक माना जाता है। यह लक्ष्य केवल सरकारी बजट के भरोसे हासिल नहीं हो सकता। इसके लिए जरूरी है कि निजी क्षेत्र का निवेश भी तेजी से बढ़े। फिर भी, केवल यही पर्याप्त नहीं है। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि यह पैसा किन क्षेत्रों में लगाया जा रहा है। भारत में बिजनेस आरएंडडी पर होने वाले खर्च में अब 71.3 प्रतिशत हिस्सा बहुराष्ट्रीय कंपनियों (एमएनसी) का है। इस श्रेणी में 124 विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ 252 भारतीय निजी क्षेत्र की बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी शामिल हैं। इसलिए, इसे केवल विदेशी कंपनियों की बैक-ऑफिस रिसर्च तक सीमित नहीं माना जा सकता। फिर भी, निवेश का दायरा अभी सीमित है। भारत में सेमीकंडक्टर, क्वांटम तकनीक, एडवांस्ड मैटेरियल और फाउंडेशनल एआई जैसी भविष्य की रणनीतिक तकनीकों में निवेश अब भी सीमित है। भारत में पेटेंट तो बड़ी संख्या में दाखिल होते हैं, पर बहुत कम सफल उत्पाद बन पाते हैं। सबसे बड़ी चुनौती लैब से बाजार तक पहुंचने के बीच का चरण है, जहां निवेश और सहयोग की कमी है। कुल आरएंडडी खर्च का केवल 1.4 प्रतिशत बाहरी शोध परियोजनाओं पर खर्च होता है, इसलिए प्रयोगशाला और बाजार के बीच की खाई अब भी बनी हुई है। यही वजह है कि एक लाख करोड़ रुपये की रिसर्च, डेवलपमेंट और इनोवेशन (आरडीआई) योजना बेहद अहम मानी जा रही है। पहली बार, सरकारी पैसे को सिर्फ सरकारी प्रयोगशालाओं में लगाने के बजाय निजी क्षेत्र में लगाया जा रहा है। इस योजना में सरकार सीधे कंपनियों का चयन न करके सेबी से पंजीकृत वैकल्पिक निवेश कोष, विकास वित्त संस्थान और आईआईटी के रिसर्च पार्क जैसे दूसरे स्तर के फंड मैनेजरों को पूंजी देगी। यही संस्थाएं योग्य कंपनियों का चयन करेंगी। इसका मकसद दीर्घकालिक निवेश उपलब्ध कराना है। साथ ही, ऐसे विशेषज्ञों की भी जरूरत होगी, जो विज्ञान आधारित नवाचारों में सही निवेश का आकलन कर सकें। इसके अलावा दो और बातें भी महत्वपूर्ण हैं। पहली, स्टार्टअप के लिए आधुनिक रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर और हुनरमंद लोग उपलब्ध हों। दूसरी, भरोसेमंद खरीदार भी मौजूद हों। अगर रक्षा, अंतरिक्ष, स्वास्थ्य और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सरकार खरीद के दौरान देश में विकसित नए उत्पादों (प्रोटोटाइप) को प्राथमिकता दे, तो इससे डीप टेक कंपनियों को बड़ा लाभ मिल सकता है। इस दिशा में कुछ कदम पहले ही उठाए जा चुके हैं। अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन ने ऐसे कार्यक्रम शुरू किए हैं, जिनका लक्ष्य तय समय में उपयोगी और ठोस परिणाम हासिल करना है। वहीं, नेशनल क्वांटम मिशन के तहत चार विशेष केंद्र बनाए गए हैं, जो क्वांटम कंप्यूटिंग, संचार, सेंसिंग और नई सामग्री व उपकरणों पर काम कर रहे हैं। सरकार समर्थित एक कंसोर्टियम भी भारतीय भाषाओं और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप एक स्वदेशी लार्ज लैंग्वेज मॉडल विकसित कर रहा है। इसके पीछे की सोच यह है कि जो देश सबसे अधिक विदेशी एआई सिस्टम इस्तेमाल करता है और जिसके डाटा से वे प्रशिक्षित होते हैं, उसके पास अपना एआई सिस्टम भी होना चाहिए। भारत जैसे बड़े और ऊंचे लक्ष्य रखने वाले देश को अब व्यवस्थित नवाचार, मजबूत बौद्धिक संपदा और ऐसी तकनीकों पर ध्यान देना चाहिए, जिस पर उसका अपना मालिकाना हक हो, न कि वह उधार की हों। अब इस पूरी प्रक्रिया की उस उपलब्धि पर आते हैं, जिस पर सबसे कम चर्चा हुई है। इन आंकड़ों के लिए किए गए सर्वे में 8,000 से ज्यादा शोध संस्थान शामिल थे और इसे लगभग तीन साल के अंतराल के बाद फिर से शुरू किया गया था। इस तरह के आंकड़ों से नीति-निर्माताओं, निवेशकों और उद्योग को एक ही तस्वीर देखने, एक ही आधार पर बहस करने और सिस्टम को उन लक्ष्यों के लिए जवाबदेह ठहराने में मदद मिलती है, जिन्हें उसने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है। इसी तरह एक रिसर्च इकनॉमी सिर्फ उम्मीदों पर चलने के बजाय जवाबदेह बनती है। पहिया घूमना शुरू हो गया है। अब इसे काफी तेजी से घूमने की जरूरत है। -लेखक टेक, सोशल आंत्रप्रेन्योर और डब्ल्यूजीएफ के प्रोग्राम डायरेक्टर (पूर्वी भारत) हैं।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Aug 08, 2026, 05:24 IST
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