जंग की चौतरफा मार: इंसानों के साथ घुट रहा पर्यावरण का दम, 14 दिनों में फैला पूरे आइसलैंड से ज्यादा प्रदूषण!
पश्चिम एशिया समेत दुनिया के विभिन्न संघर्ष क्षेत्रों में जारी युद्धों का असर केवल मानव जीवन और बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं है। इन संघर्षों ने पर्यावरण पर पड़ने वाले गंभीर प्रभाव भी उजागर किए हंै। तेल प्रतिष्ठानों में लगी आग, व्यापक बमबारी, रासायनिक पदार्थों के इस्तेमाल के आरोप और बढ़ते कार्बन उत्सर्जन ने मिट्टी, जल स्रोतों, वायु गुणवत्ता और जैव विविधता पर दीर्घकालिक खतरे पैदा किए हैं। डाउन टू अर्थ की रितुपर्णा सेनगुप्ता के विश्लेषण के अनुसार मौजूदा संघर्षों ने यह सवाल फिर खड़ा किया है कि युद्ध के दौरान पर्यावरण क्षति को कैसे मापें और जवाबदेही कैसे तय की जाए। ब्रिटेन स्थित संस्था कॉन्फ्लिक्ट एंड एनवायरनमेंट ऑब्जर्वेटरी के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी संघर्षों के दौरान पर्यावरणीय क्षति से जुड़ी कम से कम 120 घटनाओं की पहचान की गई है। इनमें कृषि भूमि, वन क्षेत्रों, जल स्रोतों और शहरी इलाकों पर पड़े प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभाव शामिल हैं। संस्था और विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दक्षिणी लेबनान में व्हाइट फॉस्फोरस के इस्तेमाल की घटनाओं तथा कृषि क्षेत्रों में रासायनिक पदार्थों के छिड़काव को लेकर भारी चिंताएं जताई गई हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे पदार्थ मिट्टी की गुणवत्ता, भूजल और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को लंबे समय तक प्रभावित कर सकते हैं। हाइड्रोकार्बन और अन्य प्रदूषक तत्व फैले अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार हालिया संघर्ष के दौरान ईरान में तेल डिपो और रिफाइनरियों को निशाना बनाए जाने के बाद कई स्थानों पर भीषण आग लगी। इन घटनाओं से वातावरण में बड़ी मात्रा में कालिख, हाइड्रोकार्बन और अन्य प्रदूषक तत्व फैले। विशेषज्ञों के अनुसार तेल भंडारण सुविधाओं में लगने वाली आग केवल स्थानीय वायु गुणवत्ता को प्रभावित नहीं करती, बल्कि सल्फर और नाइट्रोजन यौगिकों के कारण अम्लीय वर्षा जैसी परिस्थितियां भी पैदा करती है। इससे कृषि भूमि, जल स्रोतों और स्थानीय जैव विविधता पर नकारात्मक असर पड़ता है। तेहरान और आसपास के क्षेत्र में इसके व्यापक दुष्प्रभाव दिखाई दे रहे हैं। ये प्रदूषक मिट्टी और जल स्रोतों में जमा होकर कृषि उत्पादन, जैव विविधता, वन्यजीवों और मानव स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। युद्धों का बढ़ता कार्बन फुटप्रिंट अमेरिका स्थित थिंक टैंक क्लाइमेट एंड कम्युनिटी इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं के अनुमान के अनुसार पश्चिम एशिया में सैन्य संघर्ष के शुरुआती 14 दिनों में ही लगभग 50 लाख टन कार्बन उत्सर्जन हुआ। यह मात्रा आइसलैंड के एक वर्ष के कुल कार्बन उत्सर्जन से अधिक है। युद्ध से होने वाले उत्सर्जन में केवल विस्फोट और बमबारी ही नहीं बल्कि सैन्य विमानों की उड़ानें, नौसैनिक तैनाती, हथियारों का उत्पादन, रसद आपूर्ति और युद्धग्रस्त क्षेत्रों के पुनर्निर्माण से जुड़ी गतिविधियां भी योगदान देती हैं। दशकों तक रह सकता है असर पर्यावरण वैज्ञानिकों के अनुसार युद्ध खत्म होने के बाद भी उसके दुष्प्रभाव वर्षों या कई मामलों में दशकों तक बने रह सकते हैं। प्रदूषित मिट्टी, क्षतिग्रस्त वन क्षेत्र, दूषित जल स्रोत और प्रभावित वन्यजीव आबादी को सामान्य स्थिति में लौटने में लंबा समय लग सकता है।
- Source: www.amarujala.com
- Published: May 30, 2026, 02:41 IST
जंग की चौतरफा मार: इंसानों के साथ घुट रहा पर्यावरण का दम, 14 दिनों में फैला पूरे आइसलैंड से ज्यादा प्रदूषण! #IndiaNews #National #WarEnvironmentalImpact #WestAsiaConflict #CarbonFootprintMilitary #SubahSamachar
