इस बार कम ठिठुराएगी सर्दी: फरवरी से ही दिखने लगेंगे गर्मी के तीखे तेवर; गेहूं-सरसों की फसल पर भी असर की आशंका
प्रशांत महासागर में बने अल नीनो के प्रभाव से इस बार सर्दियों में कड़ाके की ठंड के लिए लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। भले ही समय से पहले गुलाबी ठंड ने दस्तक दे दी है, लेकिन उत्तर और मध्य भारत में दिसंबर से फरवरी के दौरान तापमान सामान्य से एक से दो डिग्री अधिक रह सकता है। कड़ाके की ठंड के दिन कम हो सकते हैं, जबकि रात के तापमान में बढ़ोतरी दर्ज की जा सकती है। मौसम के मिजाज में इस बदलाव का रबी की फसलों पर भी सीधा असर देखने को मिल सकता है। यह महज पूर्वानुमान नहीं है, बल्कि पंजाब के मोहाली स्थित भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (आईसर) के पृथ्वी एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग के विशेषज्ञ डॉ. राजू अट्टादा की चेतावनी है। भारतीय मौसम विज्ञान सोसायटी (आईएमएस) की ओर से हिमपरिसर में आयोजित एक विशेष सम्मेलन में उन्होंने अल नीनो के कारण भारत के मौसम, जलवायु और कृषि चक्र पर पड़ने वाले गंभीर प्रभावों को लेकर आगाह किया। उन्होंने बताया कि सामान्य से अधिक तापमान रहने के कारण सर्दियों का अहसास सीमित हो सकता है। फरवरी-मार्च में समय से पहले गर्मी बढ़ने और आगामी गर्मी के मौसम में लू का खतरा भी बढ़ सकता है। सामान्य से अधिक तापमान के 70 फीसदी तक आसार डॉ. राजू अट्टादा की ओर से पेश मॉडल आकलन के अनुसार, दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 के दौरान उत्तर भारत के मैदानी इलाकों, विशेषकर पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में अधिकतम और न्यूनतम तापमान सामान्य से ऊपर रहने की 70% संभावना है। हालांकि, ऐसा नहीं है कि शीतलहर नहीं चलेगी, क्योंकि मौसम की वास्तविक स्थिति पश्चिमी विक्षोभ, स्थानीय परिस्थितियों और अन्य जलवायु कारकों पर भी निर्भर करेगी। खेती और फसलों पर पड़ेगा सीधा खतरा डॉ. राजू ने बताया कि सर्दियों में बोई जाने वाली रबी फसलों विशेष रूप से गेहूं, सरसों और दालों को बेहतर वृद्धि और उपज के लिए अनुकूल ठंडक तथा समय पर हल्की बारिश की दरकार होती है। तापमान में असामान्य बढ़ोतरी और वर्षा की कमी से फसलों का विकास बाधित हो सकता है, जिससे पैदावार घटने की आशंका बढ़ जाती है। केंद्रीय जल आयोग के सितंबर 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, देश के 178 प्रमुख जलाशयों में उपलब्ध पानी उनकी कुल क्षमता का करीब 70 प्रतिशत था, जो पिछले साल से 10 फीसदी कम है। क्या है अल नीनो अल नीनो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की सतह के पानी का सामान्य से अधिक गर्म होना है। यह वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण को प्रभावित करता है और भारत में मानसून तथा तापमान के पैटर्न पर असर डालता है। हालांकि, किसी खास क्षेत्र में बारिश या सर्दी कैसी रहेगी, यह केवल अल नीनो से तय नहीं होता।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Oct 22, 2026, 02:52 IST
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