CAG Report: सरकार की कमाई ज्यादा मगर कर्ज का बोझ बरकरार, हजारों करोड़ का हिसाब अधूरा; योजनाओं का पैसा अटका

प्रदेश सरकार की कमाई खर्च से ज्यादा हुई लेकिन कर्ज का बोझ कम नहीं हुआ। हालात ऐसे हैं कि नया कर्ज लेकर पुराना कर्ज चुकाया जा रहा है और हजारों करोड़ रुपये के खर्च का पूरा हिसाब भी साफ नहीं है। जम्मू-कश्मीर की वित्तीय स्थिति की यही तस्वीर शनिवार को विधानसभा में पेश भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की वर्ष 2022-23 की रिपोर्ट में सामने आई। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने यह रिपोर्ट सदन में रखी। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2022-23 में सरकार को करीब 68,975 करोड़ रुपये की आय हुई जबकि कुल खर्च 73,832 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। प्रदेश की अर्थव्यवस्था बढ़कर लगभग 2.27 लाख करोड़ रुपये पहुंची और विकास दर करीब 14 प्रतिशत रही। हालांकि पूरी तस्वीर कुछ अलग है। साफ है कि कमाई के मुकाबले खर्च ज्यादा रहा और संतुलन नहीं बन पाया और करीब 4,855 करोड़ रुपये का राजकोषीय घाटा बना रहा। सरकार की देनदारी बढ़कर करीब 23,240 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। सबसे चिंता की बात यह है कि लिए गए उधार का करीब 87 प्रतिशत हिस्सा पुराने कर्ज चुकाने में ही खर्च हो गया। इसका मतलब है कि सरकार उधार लेकर विकास नहीं बल्कि पुराने बोझ को ही ढो रही है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि कर्ज की स्थिति स्थिर नहीं है और आगे दबाव बढ़ सकता है। बजट के बाहर भी 23 हजार करोड़ से ज्यादा कर्ज, गारंटी का अलग बोझ रिपोर्ट में सामने आया कि सरकार ने करीब 23,911 करोड़ रुपये का कर्ज बजट के बाहर लिया। इस तरह की उधारी सीधे बजट में नहीं दिखती लेकिन इसका बोझ सरकार पर ही आता है। इसके अलावा करीब 24,867 करोड़ रुपये की सरकारी गारंटी भी दी गई है जो आगे चलकर दबाव बढ़ा सकती है। सरकार को अपनी कुल आय का करीब 74 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार से मिला। अपनी आय में बढ़ोतरी भी सीमित रही। इससे साफ है कि जम्मू-कश्मीर अभी भी अपनी कमाई के मामले में पूरी तरह मजबूत नहीं हो पाया है। हजारों करोड़ का पूरा हिसाब, योजनाओं के पैसे अटके कैग ने साफ कहा कि करीब 14,698 करोड़ रुपये के उपयोग प्रमाण पत्र अब तक जमा नहीं किए गए हैं। इसके अलावा 3,733 उपयोग प्रमाण पत्र और 3,466 बिल लंबित हैं। यानी सरकार यह नहीं बता पाई कि पैसा कहां और कैसे खर्च हुआ। सरकारी योजनाओं के लिए जारी करीब 3,600 करोड़ रुपये एजेंसियों के खातों में बिना खर्च पड़े हैं। इतना ही नहीं, इन खर्चों से जुड़े पूरे दस्तावेज भी कैग को नहीं मिले। इससे पारदर्शिता पर सवाल उठे हैं। 219 करोड़ गलत मद में, 772 करोड़ खाते से बाहर रिपोर्ट में पाया गया कि करीब 219 करोड़ रुपये का खर्च गलत मद में दिखाया गया। वहीं करीब 772 करोड़ रुपये विभिन्न फंड के रूप में सरकारी खाते से बाहर रखे गए जिससे निगरानी व्यवस्था कमजोर हुई। कैग ने बजट प्रबंधन पर भी सवाल उठाए हैं। कई मामलों में बिना मंजूरी के फंड इधर-उधर किए गए। कुछ जगह जरूरत से ज्यादा बजट लिया गया लेकिन खर्च नहीं हुआ। वहीं कुछ विभागों में कम प्रावधान के कारण अतिरिक्त खर्च करना पड़ा। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वित्तीय अनुशासन के लिए स्पष्ट लक्ष्य तय नहीं किए गए। 75 फीसदी पैसा तय खर्च में, विकास पर सिर्फ 14 फीसदी सरकार का बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन और ब्याज जैसे तय खर्चों में ही चला जाता है जो करीब 75 प्रतिशत है। कुल खर्च का 83 से 85 प्रतिशत हिस्सा रोजमर्रा के कामों में गया जबकि विकास से जुड़े कार्यों पर केवल करीब 14 प्रतिशत ही खर्च हुआ। यानी ज्यादातर पैसा चलाने में खर्च हो रहा है बनाने में नहीं। वहीं प्रदेश में कुल 42 सरकारी कंपनियां हैं जिनमें से केवल चार ने ही समय पर अपने खाते जमा किए। इससे उनकी असली वित्तीय स्थिति साफ नहीं हो पा रही।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Mar 29, 2026, 00:32 IST
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