संस्कृति के पन्नों से: राजा कुवलाश्व का नाम क्यों पड़ा धुंधुमार

राजा पृथु के महान वंश में बृहदश्व नामक एक प्रसिद्ध और धर्मपरायण राजा हुए। उनके राज्य में सुख-शांति थी और प्रजा उन्हें पिता के समान मानती थी। वक्त आने पर अपने ज्येष्ठ पुत्र कुवलाश्व को राज्य सौंपकर उन्होंने खुद वन में जाकर तपस्या करने का निश्चय किया।जब राजा बृहदश्व वन जाने लगे, उसी समय उत्तंक मुनि उनके पास पहुंचे और बोले, राजन! आप कहां जा रहे हैं आपके बिना प्रजा का क्या होगा प्रजा की रक्षा करना ही आपका सबसे बड़ा धर्म है। जब तक आप इस कर्तव्य को नहीं निभाते, तब तक तपस्या भी सफल नहीं होगी। इसलिए, अभी वन जाना उचित नहीं है। यह कहने के उपरांत उत्तंक ने बृहदश्व को एक भयंकर संकट के विषय में बताया। वह बोले कि मेरे आश्रम के निकट एक विशाल मरुभूमि है, जहां उज्जानक नाम का बालू से भरा समुद्र है। वहां धुंधु नाम का एक बलशाली राक्षस रहता है। वह मधु दैत्य का पुत्र है और देवताओं के लिए उसे मार पाना अत्यंत कठिन कार्य है। धुंधु राक्षस, बालू के भीतर छिपकर तप करता है और ऐसी भयानक स्थितियां उत्पन्न करता रहता है, जिससे पृथ्वी कांप उठती है। धुंधु वर्ष में एक बार श्वास छोड़ता है, परंतु जब वह ऐसा करता है, तो भयंकर आंधी उठती है, उसकी धूल से सूर्य तक ढक जाता है, भूकंप आने लगता है और चारों ओर धुआं व अग्नि फैल जाती है। उत्तंक मुनि बताते हैं, इस कारण मैं अपने आश्रम में शांति से कोई भी कार्य नहीं कर पाता। राजन! यदि आप धुंधु का वध कर दें, तो मेरे साथ-साथ समस्त लोकों को शांति मिल जाएगी। यह सुनकर बृहदश्व कुछ देर विचार में डूबे, फिर बोले, मुनिवर! मैंने तो शस्त्र त्याग दिए हैं, परंतु मेरा पुत्र कुवलाश्व इस कार्य को अवश्य पूरा करेगा।फिर उन्होंनेे अपने पुत्र कुवलाश्व को बुलाकर कहा, वत्स! मुनि के साथ-साथ समस्त लोकों की शांति के लिए तुम्हें धुंधु का वध करना है। प्रजा व ऋषियों की रक्षा करना तुम्हारा धर्म है। यह कहकर बृहदश्व वन की ओर चले गए। अब कुवलाश्व अपने सौ वीर पुत्रों और ऋषि उत्तंक के साथ धुंधु का वध करने निकल पड़े। भगवान विष्णु ने लोक-हित के लिए अपना दिव्य तेज कुवलाश्व में प्रविष्ट करा दिया। उसी क्षण आकाशवाणी हुई कि यह राजा (कुवलाश्व) अवश्य ही धुंधु का वध करेगा। कुवलाश्व और उनके पुत्र वहां पहुंचे, जहां धुंधु छिपकर रहता था। उन्होंने बालू के विशाल समुद्र को खोदना प्रारंभ किया और धुंधु का पता लगा लिया। इसी बीच धुंधु उठ गया और जब उसने देखा कि कुवलाश्व के पुत्र बालू खोद रहे हैं, तो उसके मुख से अग्नि की ज्वालाएं निकलने लगीं और साथ ही भयंकर जल-प्रवाह उमड़ पड़ा। वह अग्नि इतनी प्रचंड थी कि उसने कुवलाश्व के सौ पुत्रों में से केवल तीन को छोड़कर शेष सबको जला दिया। अपने पुत्रों को इस प्रकार नष्ट होते देखकर भी कुवलाश्व बिना विचलित हुए आगे बढ़े और उन्होंने अपने योगबल से उस प्रचंड जल-प्रवाह को पी लिया तथा अग्नि को शांत कर दिया। इसके बाद उन्होंने उस महाबली राक्षस धुंधु का वध भी कर दिया। धुंधु के मरते ही समस्त लोकों में शांति व्याप्त हो गई और धुंधु के कारण फैला भय भी समाप्त हो गया। मृत धुंधु को देखकर ऋषि अत्यंत प्रसन्न हुए। इस प्रकार धुंधु को मारने के कारण कुवलाश्व धुंधुमार नाम से प्रसिद्ध हुए और लोग उनका यश युगों-युगों तक जगत में गाते रहे। उनका जीवन प्रेरणा देता है कि कर्तव्य का पालन सच्चा तप है और लोक-हित ही सर्वोच्च धर्म।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: May 10, 2026, 07:43 IST
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