क्या बंगाल में खेल शुरू हो गया है? ममता बनर्जी बनाम भाजपा की नई जंग, एसआईआर विवाद से गरमाई सियासत
राजनीति में दिखना बहुत जरूरी है। पश्चिम बंगाल में लगातार चौथी बार अपनी सरकार बनाए रखने की बड़ी लड़ाई में मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में अचानक पेश होकर बड़ी कामयाबी हासिल की। उन्होंने आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले निर्वाचन आयोग के विवादित विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को चुनौती दी। 23 साल के अंतराल के बाद वकील की काली वर्दी पहनकर (वह एक योग्य वकील भी हैं), उन्होंने एक याचिकाकर्ता के तौर पर अपना केस खुद लड़ा और प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ को अपनी शानदार कानूनी दलीलों से प्रभावित किया। उन्होंने यह कहकर एक राजनीतिक संदेश भी दिया कि निर्वाचन आयोग भाजपा के कहने पर यह काम कर रहा है। पीठ ने उनकी बात सम्मान के साथ सुनी। शायद न्यायाधीश इस बात से हैरान थे कि एक मुख्यमंत्री अपना केस खुद लड़ने के लिए अदालत में पेश हुईं। ममता बनर्जी ऐसा करने वाली पहली मुख्यमंत्री हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को एसआईआर की प्रक्रिया पूरी करते समय सावधान रहने और यह सुनिश्चित करने की सलाह दी कि लोगों को बेवजह परेशान न किया जाए, लेकिन उसने ममता बनर्जी की इच्छा के मुताबिक इस पर रोक लगाने से मना कर दिया। असल में, कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि इस प्रक्रिया में कोई रुकावट नहीं आनी चाहिए। भले ही ममता ने कानूनी लड़ाई नहीं जीती हो, पर उन्होंने इस दिखावे की लड़ाई में इतनी प्रशंसा पा ली कि भाजपा कुछ देर के लिए चुप हो जाए। उनके मुख्य विरोधी को समझ नहीं आ रहा कि उस नेता को कैसे जवाब दें, जिसने विधानसभा चुनाव को बंगाल की खास पहचान को बाहरी दल, जैसा कि वह भाजपा को कहती हैं, के हमले से बचाने के अपने व्यक्तिगत अभियान के तौर पर दिखाकर माहौल बिगाड़ दिया है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने निजी तौर पर माना कि ममता बनर्जी की फाइटिंग स्पिरिट का मुकाबला करना मुश्किल है, जो 34 साल तक पश्चिम बंगाल पर राज करने वाले वाम मोर्चे की ताकत के खिलाफ वर्षों तक सड़क पर लड़ाई लड़कर और भी बेहतर हुई है। तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ने सुप्रीम कोर्ट में अपना केस खुद लड़कर अपने नाटकीय कदम से मतदाताओं को कई स्पष्ट संदेश दिए हैं। पहला, एसआईआर में गड़बड़ियां भरी हुई हैं, जिन्हें मतदाताओं को शामिल करने के बजाय हटाने के लिए बनाया गया है। दूसरा, पश्चिम बंगाल को गलत तरीके से निशाना बनाया जा रहा है, जबकि पड़ोसी भाजपा शासित असम, जहां उसी समय चुनाव होने हैं, को एसआईआर प्रक्रिया से बाहर रखा गया है। तीसरा, उनके लिए सबसे जरूरी बात यह है कि उन्होंने अपना साहस नहीं खोया है और अपने लोगों को न्याय दिलाने के लिए, चाहे सड़कों पर हो या देश की सबसे बड़ी अदालत में, अपने हर हथियार से लड़ेंगी, जिनके बारे में उनका दावा है कि एसआईआर की वजह से उन्हें बेवजह जुल्म और मानसिक तकलीफ हो रही है। यह ममता की उत्कृष्ट रणनीति है: भावनात्मक, अडिग, हमेशा सावधान रहने वाली, जो आम लोगों की तरफ से बड़े व ताकतवर लोगों से भिड़ने से भी नहीं हिचकिचाती। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह अपना केस नहीं जीतीं। सुप्रीम कोर्ट में अपने चालाकी भरे काम से वह जो संकेत देना चाहती थीं, उन्हें जमीन पर काम करने वाले लोगों ने समझ और पढ़ लिया है। जैसे कि भाजपा ममता बनर्जी के हाई-वोल्टेज भावनात्मक भाषण का जवाब देने के लिए फिर से तैयार हो रही है, एसआईआर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक उनके धमाकेदार अभियान को सिर्फ दिखावा नहीं समझना चाहिए, जिसके लिए वह मशहूर हैं। इसके पीछे तृणमूल में गहरी चिंता है कि मतदाता पुनरीक्षण की यह कवायद उसके वोट बैंक को नुकसान पहुंचा सकती है और भाजपा को फायदा पहुंचा सकती है। बताया जा रहा है कि अब तक करीब 58 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं और यह काम अभी खत्म नहीं हुआ है। इसके अलावा, नामों की वर्तनी और दूसरी जानकारियों में थोड़ी-सी गड़बड़ी की वजह से हजारों मतदाताओं के नाम निर्वाचन आयोग के मुताबिक तार्किक विसंगतियों की सूची में डाल दिए गए हैं। पश्चिम बंगाल अकेला ऐसा राज्य है, जहां ऐसी सूची बनाई गई है। तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि यह निर्वाचन आयोग द्वारा नियुक्त माइक्रो ऑब्जर्वर का काम है। तृणमूल नेताओं का दावा है कि माइक्रो ऑब्जर्वर का पद एसआईआर प्रक्रिया के बीच में लाया गया था, ताकि ब्लॉक स्तर के अधिकारियों को दरकिनार किया जा सके, जिन्हें निर्वाचन आयोग के अनुसार, राज्य सरकार के कहने पर धमकाया और काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। तृणमूल नेताओं का यह भी दावा है कि मुस्लिम इलाकों व महिला मतदाताओं को माइक्रोस्कोपिक जांच के लिए चुना जा रहा है, जिससे अक्सर उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए जाते हैं। ये दोनों समूह ममता बनर्जी के मुख्य समर्थक हैं और मतदाता सूची में उनकी संख्या में कोई भी कमी नतीजे पर असर डाल सकती है। ममता बनर्जी और उनकी पार्टी अच्छी तरह जानती हैं कि तीन कार्यकाल तक शासन में रहने के बाद, उनके खिलाफ एक मजबूत सत्ता विरोधी रूझान है। यह पांच साल पहले, 2021 में भी था। लेकिन भाजपा की बेवजह की गलतियों और एक रैली में पैर टूटने के बाद व्हीलचेयर पर ममता बनर्जी के भावनात्मक प्रचार ने तृणमूल कांग्रेस को बचा लिया। वह पहले से भी ज्यादा मजबूती से सत्ता में वापस आईं, 294 विधानसभा सीटों में से 213 सीटें जीतीं और 48 फीसदी का भारी वोट शेयर हासिल किया। एक तरफ ममता बनर्जी और दूसरी तरफ निर्वाचन आयोग व भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है, ऐसे में पश्चिम बंगाल की लड़ाई और भी तेज होती जा रही है। ममता बनर्जी दुश्मन से लड़ने की कला में माहिर हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ऐसे ही हैं, जिन्होंने पिछले नवंबर में पड़ोसी राज्य बिहार में राजग की शानदार जीत के बाद ममता बनर्जी को चुनौती दी थी। पर, जैसा कि पश्चिम बंगाल का हर मतदाता जानता है, विधानसभा चुनाव देश का प्रधानमंत्री चुनने के लिए नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री चुनने के लिए है। मतदाताओं के साथ ममता बनर्जी के मजबूत भावनात्मक रिश्ते को चुनौती देने के लिए एक मजबूत स्थानीय नेता की कमी भाजपा की कमजोरी साबित हो सकती है। जैसा कि ममता बनर्जी ने 2021 में अपने हाथों में फुटबॉल पकड़कर कहा था, खेला होबे। खेल पूरी तरह से शुरू हो गया है और यह दिखावे और जमीनी स्तर की रणनीति का एक दिलचस्प मुकाबला साबित हो रहा है।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Feb 12, 2026, 02:54 IST
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