UGC Regulations: अदालत की रोक और राजनीति की परीक्षा, समता का अर्थ केवल एक वर्ग का संरक्षण नहीं

भारतीय न्यायपालिका व कार्यपालिका के बीच वैचारिक मतभेद का इतिहास नया नहीं है। कई मसलों पर सरकार के फैसलों को सुप्रीम कोर्ट पलटता रहता है। कई बार न्यायपालिका और व्यवस्थापिका आमने-सामने भी नजर आते हैं, पर कभी-कभी सुप्रीम कोर्ट का एक आदेश सिर्फ किसी नियम को नहीं रोकता, बल्कि सत्ता के आत्मविश्वास पर भी ब्रेक लगा देता है। 29 जनवरी को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के समता विनियम-2026 पर शीर्ष अदालत ने पूर्ण रोक लगा दी। अदालत ने इन नियमों को पहली नजर में अस्पष्ट व दुरुपयोग योग्य माना है। साथ ही, इन्हें सामाजिक विभाजन को बढ़ावा देने वाला भी बताया। यह फैसला महज एक विभागीय अधिसूचना नहीं है। यह केंद्र की सत्ताधारी भाजपा की उस राष्ट्रीय राजनीति के लिए बड़ी चेतावनी है, जिसने पिछले एक दशक में जातिगत संतुलन को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया है। इस विवाद की जड़ें भारत के उस लंबे और जटिल जातिगत संघर्ष में हैं, जो 1882 के हंटर आयोग से शुरू हुआ था। यह संघर्ष मंडल आयोग, कमंडल की राजनीति और हालिया ईडब्ल्यूएस आरक्षण तक पहुंचा है। हर दौर में बुनियादी सवाल एक ही रहा कि बिना नया सामाजिक असंतुलन पैदा किए समानता कैसे लाई जाए। सुप्रीम कोर्ट ने दशकों से यही सांविधानिक रेखा खींची है। अदालत का मानना है कि आरक्षण नीति का एक औजार है, कोई मौलिक अधिकार नहीं। यदि यह औजार बेलगाम हो जाए, तो न्याय के बजाय सामाजिक टकराव पैदा करता है। यूजीसी के नए नियमों के साथ भी यही आशंका सामने आई। कागजों पर ये नियम समता और समान अवसर की बात करते थे। इनमें समितियों का गठन और 15 दिन में फैसले जैसे प्रावधान थे। पर इस नीति की भाषा ने एक गहरा सांविधानिक संकट खड़ा कर दिया। यूजीसी की इस नई नियमावली में सबसे बड़ा विवाद भेदभाव की परिभाषा पर है। इसमें भेदभाव की व्याख्या को लगभग पूरी तरह आरक्षित वर्गों-अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग तक सीमित रखा गया। सामान्य श्रेणी के छात्रों के लिए किसी स्पष्ट सुरक्षा का कोई उल्लेख नहीं था। झूठी शिकायतों पर कार्रवाई का प्रावधान न होना और यूजीसी को विश्वविद्यालयों की फंडिंग रोकने जैसे अधिकार देना विवाद की वजह बना। इन प्रावधानों ने विपरीत भेदभाव के डर को जन्म दिया। अदालत ने इसी बिंदु पर तीखी प्रतिक्रिया दी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पूछा कि क्या हम एक जातिविहीन समाज की ओर बढ़ने के बजाय पीछे जा रहे हैं यह सवाल वास्तव में सरकार और सत्तारूढ़ दल के लिए एक आईना है। सामाजिक न्याय का रास्ता डाटा और संतुलन के सहारे ही आगे बढ़ सकता है, नए विभाजन पैदा करके नहीं। इस विवाद का एक अत्यंत गंभीर पहलू वह डिजिटल मोर्चा है, जिसने पिछले एक दशक में मोदी सरकार को अजेय बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है। सोशल मीडिया अब तक भाजपा की सबसे बड़ी ताकत रहा है। इस मुद्दे पर पहली बार यह सरकार के लिए आत्मघाती साबित होता दिखा। यूजीसी नियमावली के विरोध में सवर्ण समाज के युवाओं और बुद्धिजीवियों ने जिस तरह से डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर मोर्चा खोला, उसने सरकार के रणनीतिकारों को सकते में डाल दिया। यह विरोध केवल सतही टिप्पणियों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने सवर्ण वोट बैंक के भीतर उस संस्थागत उपेक्षा के डर को हवा दी, जिसे भाजपा अब तक ईडब्ल्यूएस आरक्षण के जरिये शांत रखने में सफल रही थी। सवर्णों के इस खुले विद्रोह और सरकार विरोधी डिजिटल अभियान ने पार्टी की उस छवि को भी चोट पहुंचाई है, जिसमें वह सभी वर्गों के हितों की संरक्षक मानी जाती थी। हालांकि, भाजपा की असली चिंता अब सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद होने वाली प्रतिक्रिया को लेकर है। जिस पिछड़े वर्ग को मोदी सरकार पिछले दस वर्षों से निरंतर आकर्षित करती रही है, उसके भीतर अब एक अलग तरह का असंतोष पनपने की आशंका है। यदि सवर्णों के दबाव में सरकार इन नियमों को वापस लेती है या इनमें बड़े बदलाव करती है, तो सोशल मीडिया पर पिछड़ा वर्ग बनाम सरकार का एक नया विस्फोटक नैरेटिव खड़ा हो सकता है। यह डिजिटल विस्फोट भाजपा की उस सबका साथ वाली सोशल इंजीनियरिंग को गहरा जख्म दे सकता है, जिसका लाभ उसे चुनावों में मिलता रहा है। पार्टी के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती इस दोतरफा डिजिटल युद्ध को संभालना है, जहां एक तरफ सवर्णों की नाराजगी का गड्ढा है और दूसरी तरफ पिछड़े वर्गों के विश्वास टूटने की खाई। जाहिर है कि इस फैसले का राजनीतिक असर भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग पर पड़ना तय है। भाजपा ने पिछले एक दशक में ओबीसी, एससी और गरीब वर्गों को जोड़ते हुए सवर्ण वोट बैंक को भी साथ रखा। यूजीसी के इन नियमों ने पहली बार भाजपा के कोर वोट बैंक के भीतर बेचैनी पैदा कर दी। यह वर्ग पार्टी की संगठनात्मक और वैचारिक रीढ़ माना जाता है। यह बेचैनी केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों में भी इसके स्वर सुनाई दे रहे हैं। विश्वविद्यालयों से उठा यह विरोध अब सामाजिक संगठनों तक पहुंच चुका है। इससे विपक्ष को वह मुद्दा मिल गया है, जिससे वह भाजपा को विभाजनकारी ढांचे में घेरने में जुट गया है। राष्ट्रीय स्तर पर देखें, तो यही दुविधा भाजपा को उन राज्यों में भी घेरेगी, जहां ओबीसी राजनीति मजबूत है। बिहार से लेकर मध्य भारत तक, भाजपा ने अब तक जातिगत संतुलन को अपनी अजेय शक्ति बनाया है। यूजीसी के इन अस्पष्ट नियमों ने उसी शक्ति पर सवाल खड़ा कर दिया है। यदि यह मुद्दा लंबा खिंचता है, तो पार्टी पुराने चुनावी जाल में फंस सकती है। विपक्ष ओबीसी-एससी असंतोष को अलग स्वर देगा और सवर्ण असंतोष को अलग हवा। 1990 का मंडल दौर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आज फर्क सिर्फ इतना है कि यह आग सड़कों के बजाय नीतिगत दस्तावेजों और विश्वविद्यालयों के परिसरों से उठ रही है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस विवाद का दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं किया है। सरकार को अपनी गलतियां सुधारने का एक मौका दिया गया है। केंद्र सरकार के पास अब 19 मार्च तक का समय है। इस दौरान वह यूजीसी नियमों की भाषा बदल सकती है। शिकायत निवारण तंत्र में संतुलन लाना अब अनिवार्य है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि समता का अर्थ केवल एक वर्ग का संरक्षण नहीं है। इसमें पूरे शैक्षणिक समुदाय की सुरक्षा शामिल होनी चाहिए। यदि सरकार नियमों को सर्व-समावेशी बनाने में सफल रहती है, तो वह राजनीतिक नुकसान को टाल सकती है। अगर सरकार इस विषय को अपने पक्ष में मोड़ सकती है, तो ठीक, अन्यथा विपक्ष को इसे चुनावी रण बनाने का मौका मिल सकता है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jan 30, 2026, 04:20 IST
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