राजस्थान: पत्नी की आरटीआई से जानकारी मांगना मानसिक क्रूरता, हाई कोर्ट का फैसला
राजस्थान उच्च न्यायालय ने पति द्वारा पत्नी की निजी जानकारी मांगने के लिए आरटीआई लगाने, सहकर्मियों के साथ अवैध संबंधों के झूठे आरोप लगाने और उसके वेतन खाते के एटीएम कार्ड से जबरन धनराशि निकालने को मानसिक क्रूरता माना है। न्यायमूर्ति इंद्रजीत सिंह और न्यायमूर्ति संगीता शर्मा की खंडपीठ ने पति की अपील खारिज करते हुए अलवर फैमिली कोर्ट-2 की ओर से जारी तलाक की डिक्री को सही ठहराया। अदालत ने कहा कि दोनों वर्ष 2018 से अलग रह रहे हैं और उनके बीच अब वैवाहिक संबंधों की पुनर्स्थापना की कोई संभावना नहीं बची है। आरटीआई और एटीएम का गलत इस्तेमाल मामले के अनुसार दोनों का विवाह 6 फरवरी, 2010 को हिंदू रीति-रिवाजों से हुआ था। वैवाहिक जीवन से उनकी दो बेटियां हैं, जो वर्तमान में अपनी मां के साथ रह रही हैं। पत्नी की ओर से अधिवक्ता शोवित झांझड़िया ने अदालत में पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि विवाह के बाद से ही महिला को पति और उसके परिजनों की ओर से प्रताड़ना, दहेज की मांग और मानसिक उत्पीड़न झेलना पड़ा। पति ने महिला के कार्यस्थल पर आरटीआई आवेदन देकर उसकी मेडिकल स्थिति, वेतन और अन्य व्यक्तिगत जानकारियां जुटाने का प्रयास किया, जिससे उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचे। इसके अलावा पति ने पत्नी का एटीएम कार्ड अपने पास रखकर जबरन वेतन की राशि निकाली। कार्यस्थल पर छवि खराब करने का प्रयास सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि गर्भावस्था के दौरान भी पति और उसके परिजनों ने महिला की उचित देखरेख नहीं की और उसे पर्याप्त भोजन तक नहीं दिया। पति ने 4 नवंबर, 2018 को महिला और उसकी दोनों बेटियों को घर से बाहर निकाल दिया। इसके बाद से ही दोनों के बीच कोई वैवाहिक संबंध नहीं रहे। उच्च न्यायालय ने फैमिली कोर्ट के उस निष्कर्ष को सही पाया कि पत्नी ने अपने बयानों और जिरह के दौरान इन सभी प्रताड़नाओं के पुख्ता साक्ष्य दिए थे, जबकि पति के लगाए गए आरोपों का पत्नी ने तथ्यों के साथ पूरी तरह खंडन किया था। पति की दलीलें और अदालत का रुख पति ने अदालत में स्वयं पैरवी करते हुए सभी आरोपों को निराधार बताया। उसने दलील दी कि फैमिली कोर्ट ने मानसिक क्रूरता को गलत तरीके से परिभाषित किया है। उसने कभी दहेज नहीं मांगा और न ही कोई धमकी दी। पति का कहना था कि उसने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना की अर्जी दायर की थी, जो मंजूर हो चुकी थी, इसलिए फैमिली कोर्ट-2 को तलाक की अर्जी पर सुनवाई का अधिकार नहीं था। हालांकि उच्च न्यायालय ने इन तर्कों को न मानते हुए फैमिली कोर्ट के तलाक के फैसले को पूरी तरह जायज ठहराया।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Nov 02, 2026, 05:15 IST
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