सहकारी संघवाद में एक नया अध्याय: तीन दशक का गतिरोध खत्म, यमुना समझौते से खुले नए अवसर

तीन दशकों तक राजस्थान और हरियाणा के बीच यमुना के पानी के बंटवारे का प्रस्ताव राजनीतिक मतभेदों के कारण अटका रहा। लेकिन, हाल ही में हुए ऐतिहासिक समझौते ने यह गतिरोध खत्म कर दिया। राज्यों के बीच नदी विवादों के दौर में यह समझौता सहकारी संघवाद और ठोस नीतिगत कार्रवाई का महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर उभरा। राजस्थान के लिए यह समझौता रणनीतिक रूप से बहुत अहम है। राज्य का लगभग दो-तिहाई हिस्सा सूखे और अर्ध-सूखे इलाकों में आता है, जहां बारिश बहुत अनियमित होती है। कई जिलों में जमीन के नीचे से पानी निकालने का काम खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है, जबकि बार-बार पड़ने वाले सूखे से खेती और ग्रामीण लोगों की आजीविका पर बुरा असर पड़ता है। यमुना का पानी कई इलाकों में पीने के पानी की उपलब्धता को बढ़ा सकता है और भूजल भंडार पर निर्भरता को कम कर सकता है। बेहतर सिंचाई से ज्यादा मूल्य वाली फसलों, बागवानी और डेयरी विकास को बढ़ावा मिल सकता है और किसानों की आमदनी भी बढ़ सकती है। इसके अलावा, पानी की कमी वाले जिलों में औद्योगिक निवेश को भी बढ़ावा मिल सकता है। शहरी इलाकों में पानी की सुरक्षा बेहतर हो सकती है, जिससे आर्थिक विस्तार में मदद मिलेगी। पानी की बेहतर उपलब्धता से पर्यटन को भी फायदा मिल सकता है। यह समझौता मौजूदा व्यवस्थाओं के तहत आवंटित जल वितरण में एक प्रमुख ऊपरी तटीय राज्य के रूप में हरियाणा की भूमिका को भी सुदृढ़ करता है। परियोजना से जुड़े अवसंरचना विकास से हरियाणा के भीतर नहर नेटवर्क को मजबूती मिलने की संभावना है। साथ ही निर्माण के दौरान रोजगार भी सृजित होगा। लंबे समय से लंबित नहर कार्यों के पूरा होने से जल प्रबंधन दक्षता में सुधार हो सकता है, संचरण हानि कम हो सकती है और सिंचाई प्रणालियों का आधुनिकीकरण हो सकता है। जल वितरण के बेहतर नियमन से कई जिलों में कृषि उत्पादकता में वृद्धि हो सकती है। राजस्थान का भौगोलिक क्षेत्रफल लगभग 3.4 करोड़ हेक्टेयर है, फिर भी इसके बहुत कम हिस्से में ही भरोसेमंद सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है। राज्य की आबादी का एक बड़ा हिस्सा खेती पर ही निर्भर है। अतिरिक्त पानी मिलने से ड्रिप और स्प्रिंकलर सिस्टम जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकों में निवेश को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे पानी की बर्बादी कम होगी और उत्पादकता बढ़ेगी। पानी की बेहतर उपलब्धता से पशुपालन तथा राज्य के कुछ हिस्सों में प्रस्तावित औद्योगिक कॉरिडोर को भी फायदा होगा, जिससे भविष्य में निवेश करना और अधिक फायदेमंद हो सकेगा। हालांकि, इस समझौते में कई चुनौतियां अब भी मौजूद हैं। आवश्यक नहर अवसंरचना के निर्माण के लिए पर्याप्त वित्तीय निवेश की आवश्यकता होगी। भूमि अधिग्रहण से मुआवजे संबंधी विवाद उत्पन्न होने पर स्थानीय विरोध उत्पन्न हो सकता है। पर्यावरण संबंधी स्वीकृतियों से परियोजना के कुछ हिस्सों में देरी हो सकती है। नहर संरेखण और जल परिवहन से संबंधित इंजीनियरिंग चुनौतियों के लिए सावधानीपूर्वक योजना की आवश्यकता है। नदी प्रवाह में परिवर्तनशीलता भविष्य में जल उपलब्धता को प्रभावित कर सकती है, जिसके लिए कठोर आवंटन सूत्रों के बजाय अनुकूल प्रबंधन की आवश्यकता है। इसलिए, प्रभावी निगरानी तंत्र अनिवार्य हो जाएंगे। निर्माण का पारदर्शी कार्यक्रम, नियमित प्रगति समीक्षा और अंतर-राज्यीय समन्वय समितियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि क्रियान्वयन एक बार फिर नौकरशाही विलंब का शिकार न हो। यह समझौता दिखाता है कि राजनीतिक सहमति, प्रशासनिक तालमेल और केंद्र की मदद से लंबी कानूनी लड़ाई के बिना बातचीत के जरिये समाधान निकाला जा सकता है। ऐसे उदाहरण भारत के संघीय ढांचे में भरोसा बढ़ाते हैं। अगर निर्माण कार्य तय समय पर पूरा होता है, वित्तीय वादे पूरे किए जाते हैं और इसे लागू करते समय पर्यावरण की सुरक्षा का ध्यान रखा जाता है, तो यह प्रोजेक्ट लाखों लोगों के लिए पानी सुरक्षा को बेहतर बना सकता है। साथ ही, इससे खेती का उत्पादन, औद्योगिक विकास और ग्रामीण इलाकों में खुशहाली भी बढ़ सकती है। पर देरी, लागत का बढ़ना या प्रशासनिक लापरवाही पुरानी निराशाओं को फिर से जगा सकती है। इतिहास इस समझौते को उस पानी से परखेगा, जो आखिरकार उन खेतों और घरों तक पहुंचेगा, जिनके लिए यह वादा किया गया है। edit@amarujala.com

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jul 09, 2026, 03:21 IST
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