जंग और वोट: खर्चा बढ़ता जाता है, शव लौटाए जाते हैं; राष्ट्रपति कहते हैं, बस कुछ हफ्ते और...
आठ अक्तूबर, 2026 ट्रुथ सोशल। ट्रंप ने लिखा, हम तीन नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले ईरान पर हमला नहीं करेंगे। बस एक पोस्ट। जंग रुक गई-बम से नहीं, वोट से। ईरान की जंग को आठ महीने हो चुके हैं। 37 अरब डॉलर खर्च। होर्मुज बंद है। गोला-बारूद खत्म हो रहा है। मगर, ट्रंप को अभी सबसे बड़ा खतरा तेहरान से नहीं, वाशिंगटन से है। एपी नॉर्क का सर्वे आया। ट्रंप की लोकप्रियता 31 प्रतिशत। कुक पॉलिटिकल रिपोर्ट कहती है-डेमोक्रेट्स हाउस में पांच से 15 सीटें छीन सकते हैं। निर्दलीय मतदाता (57 बनाम 32) डेमोक्रेट्स की तरफ। राष्ट्रपति ट्रंप ने जंग को पॉज कर दिया। जैसे किसी ने नेटफ्लिक्स का शो रोक दिया हो। एक और तमाशा हुआ। ट्रंप ने पुतिन से सौदा किया रूसी डीजल खरीदने के लिए। प्रतिबंध अप्रैल, 2027 तक स्थगित। यही ट्रंप हैं, जिन्होंने भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया, क्योंकि भारत रूसी तेल खरीद रहा था। पीटर नवारो ने भारत को क्रेमलिन की लॉन्ड्री कहा था। अब खुद वही कपड़े धो रहे हैं। काटो इंस्टीट्यूट के स्कॉट लिंसिकम ने पूछा, क्या अमेरिका, अमेरिका पर ही टैरिफ लगाएगा टाइम मशीन में विराजिए। जंग और चुनाव का रिश्ता बहुत पुराना है हर नेता सोचता है कि जंग वोट दिलाती है, मगर बीता हुआ वक्त कहता है कि जंग वोट छीनती है। और, जो नेता जंग को चुनाव के हिसाब से चलाते हैं, उनका हश्र क्या होता है, इसे देखने के लिए हम उड़ चले हैं। आइए,19वीं सदी के छठे दशक की ओर। 1862। अमेरिका। गृहयुद्ध। अब्राहम लिंकन। अमेरिका दो टुकड़ों में बंटा है। गृहयुद्ध डेढ़ साल पुराना हो गया है। संघीय सेना हार रही है। शव बोरियों में भरकर लौट रहे हैं। मध्यावधि चुनाव आ रहे हैं। लिंकन के सलाहकारों ने कहा, जंग धीमी करो। लोग थक गए हैं। वोट बचाओ। जंग से ज्यादा जरूरी है चुनाव जीतना। लिंकन ने क्या किया जंग नहीं रोकी। चुनाव से दो महीने पहले (सितंबर 1862) दासता-मुक्ति की घोषणा जारी की। गुलामी खत्म। यह अमेरिका के इतिहास का सबसे क्रांतिकारी फैसला था, जो ठीक चुनाव से पहले हुआ। जंग के असर से रिपब्लिकन ने सीटें गंवाईं हां। मगर, लिंकन ने जंग को चुनाव के लिए नहीं रोका। उन्होंने कहा कि अगर मेरा नाम इतिहास में आएगा, तो इसी काम से। दो साल बाद, लिंकन फिर जीते और गुलामी हमेशा के लिए खत्म हुई। जो नेता सही काम करते हैं, इतिहास उनके प्रति निर्मम नहीं होता। लिंकन जंग न रोककर भी इतिहास की किताबों में महान हो गए। अब चलिए 1945 की तरफ। ब्रिटेन। विंस्टन चर्चिल। दुनिया का सबसे मशहूर चेहरा। हिटलर को हराया। ब्रिटेन को बचाया। मई 1945। जर्मनी ने समर्पण किया। चर्चिल विजेता हैं। दुनिया उनके कदमों में है। जुलाई 1945-चुनाव। चर्चिल हारे। बुरी तरह। क्लेमेंट एटली को 145 सीटों का बहुमत। एटली, जिनका नाम कोई नहीं जानता था, ने दूसरे विश्वयुद्ध के हीरो को धूल चटा दी। चर्चिल ने कहा कि मतदाताओं ने मुझे ऑर्डर ऑफ द बूट दिया। क्यों हारे क्योंकि जनता ने कहा, जंग जीतना एक बात है, लोगों की जिंदगी बेहतर करना दूसरी बात। हमें घर चाहिए, नौकरी चाहिए, अस्पताल चाहिए। चर्चिल जंग के नेता थे, शांति के नहीं। सबक-सिर्फ जंग जीतना काफी नहीं। अगर लोग भूखे हैं, बेरोजगार हैं, थके हैं, तो विजेता को भी हरा देते हैं। अब टाइम मशीन उड़ चली है 1966 की ओर। हम अमेरिका में हैं। सामने दिख रहे हैं लिंडन बी जॉनसन। 1964 में जबर्दस्त जीत मिली। सिविल राइट्स, मेडिकेयर, गरीबी के खिलाफ जंग। जॉनसन ने ग्रेट सोसाइटी को अमेरिका का सपना बनाया। फिर, वियतनाम उनकी सियासत को निगल गया। 1966 तक पांच लाख अमेरिकी सैनिक वियतनाम में। हर हफ्ते शव लौटते। टीवी पर जंग दिखती और लोग पूछते किसलिए मध्यावधि चुनाव 1966 में डेमोक्रेट्स ने हाउस में 47 सीटें गंवाईं। तीन सीनेट सीटें गईं। उस चुनाव में कौन-कौन जीता था रोनाल्ड रीगन-कैलिफोर्निया के गवर्नर बने। जॉर्ज बुश सीनियर-कांग्रेसमैन बने। स्पाइरो एग्न्यू-मेरीलैंड के गवर्नर बने, बाद में निक्सन के उपराष्ट्रपति। वियतनाम की जंग ने रिपब्लिकन नेताओं की एक पूरी पीढ़ी पैदा की, जो डेमोक्रेट्स की चुनावी हार की राख से उठे थे। अब चलते हैं पेरिस। साल है 1972। यहां आप एक ऐसे घटनाक्रम के गवाह होंगे, जो ट्रंप की ईरान युद्ध वाली चुनावी घोषणा से सबसे ज्यादा मिलती-जुलती है। निक्सन राष्ट्रपति हैं। चुनाव सात नवंबर को। वियतनाम अभी जल रहा है। और, 26 अक्तूबर को, चुनाव से ठीक 12 दिन पहले हेनरी किसिंजर प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोले-शांति करीब है। अमेरिका ने राहत की सांस ली। निक्सन की जबर्दस्त जीत। रिपब्लिक ने 49 राज्य जीते। इतिहास की सबसे बड़ी जीतों में से एक। मगर किसिंजर ने जिस शांति के करीब आने की बात की थी, उसमें तीन साल और लगे। दिसंबर 1972 में निक्सन ने हनोई पर बमबारी की-ऑपरेशन लाइनबैकर टू। 20,000 टन बम। फिर जनवरी, 1973 में पेरिस समझौता हुआ, जो असल में हार की शर्तें थीं, शांति के कपड़ों में। किसिंजर का शांति करीब है चुनावी जुमला था। जंग और तीन साल चली। 20,000 और अमेरिकी सैनिक मरे। जब नेता जंग को चुनाव के हिसाब से चलाते हैं, सैनिक मरते हैं, वोट बचता है। अब 2006 को देखिए। आपके सामने हैं जॉर्ज बुश। मिशन अकम्प्लिश्ड-2003 में विमानवाहक पोत पर बैनर लगा। दावा हुआ, जंग जीत ली। मगर, जंग खत्म नहीं हुई। 2006 तक इराक गृहयुद्ध में जल रहा था। अमेरिकी सैनिक मर रहे थे-किसलिए, कोई नहीं बता पा रहा था। सामूहिक विनाश के हथियार कभी नहीं मिले। फिर, 2006 का मध्यावधि चुनाव आया। रिपब्लिकन ने चुनाव में दोनों सदन गंवाए। नैन्सी पेलोसी स्पीकर बनीं-पहली महिला। बुश ने डोनाल्ड रम्सफेल्ड को अगले दिन बर्खास्त कर दिया। राजनीतिक विश्लेषक कह रहे हैं, 2026 में भी 2006 जैसा हो सकता है। वही पैटर्न। जंग खत्म नहीं होती। खर्चा बढ़ता जाता है। शव लौटते हैं और राष्ट्रपति कहते हैं, बस कुछ हफ्ते और। टाइम मशीन वापस लौट रही है। ट्रंप ने जंग पॉज कर दी, मध्यावधि चुनाव तक। वही काम, जो किसिंजर ने 1972 में किया-शांति करीब है कहकर वोट बटोरे। मगर किसिंजर की शांति तीन साल दूर थी। अस्सी साल का इतिहास कहता है-ट्रंप की पार्टी ने 39 में से 36 मिडटर्म में सीटें गंवाई हैं। जंग के वक्त और भी बुरा हाल रहा। सवाल वही है, क्या जंग वोट के लिए रुकती है, या वोट जंग रोकता है लिंकन का जवाब था-जंग सही हो तो रुकती नहीं, चाहे वोट जाएं। ट्रंप का जवाब है-सब कुछ रुकता है। पहले वोट। इतिहास बताएगा कि कौन सही था। फिर मिलते हैं अगले सफर पर
- Source: www.amarujala.com
- Published: Nov 01, 2026, 05:28 IST
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