जीना इसी का नाम है: साहस, सेवा और संवेदना जैसे मूल्य अब सिर्फ गांवों की परिधि में घूम रहे
चलिए लेख की शुरुआत उन दो घटनाओं से करें, जहां एक घटना ने भारतीय मध्यवर्ग के शहर में खिसकते और सिकुड़ते सामाजिक व्यवहार की छवि से पूरे देश को झकझोर डाला, वहीं दूसरी घटना ने भारत के गांवों में बसे जनमानस की सेवा और साहस के मूल्यों से हमें रूबरू कराया। ऐसा लगा, मानो साहस, सेवा और संवेदना जैसे मूल्य शहर की सीमाओं को छोड़ अब सिर्फ गांवों की परिधि में घूम रहे हैं। उस ग्रामीण जीवन में, जहां न्यूटन के ऑर्डरली कॉस्मोस के केंद्र में अब भी मनुष्य और उसकी जान की नैतिक उपस्थिति बनी हुई है और सारे मानवीय मूल्य एक खास परिधि में उसके ही इर्द-गिर्द घूम रहे हैं। दोनों घटनाओं में इन्सानों की जान सांसत में रही। दो पायलट अपने जहाज को लिए बहुत बड़े जलकुंभी में क्रैश कर जाते हैं, जो गहरा व फैला हुआ था और बहुत ठंडा भी। दोनों पायलट उस जहाज के अंदर कैद थे और शीशा भी बंद। तभी कुछ ग्रामीणों की नजर उन पर पड़ती है। उनको बचाने के लिए, मनुष्य की जान की कीमत को सबसे ऊपर मानकर, गांव के दो व्यक्ति, पानी की शीतलता नहीं नापते, बल्कि बिना झिझके उस जलकुंभी में कूद पड़ते हैं। उनको तो उस समय बस एक ही बात समझ में आ रही थी कि कहीं वे पायलट हवाई जहाज संग डूब कर मर न जाएं और यह गांव की नजरों के सामने भला कैसे संभव हो पाता उन्हें यह मालूम था कि किसी की जान बचाने के लिए शिक्षा और अशिक्षा की दीवारें कभी बाधा नहीं बनतीं और न ही जन्म व मृत्यु का दर्शन उनकी बेड़ियां बन सकता है। उन्हें यह इल्म था कि वे, जो दूसरों को बचाना चाहते हैं, स्वतंत्र मुल्क के आजाद नागरिक हैं। उन्हें यह ज्ञान था कि अपनी जान बचाने से ज्यादा दूसरों की जान बचाना ही जीवन का दर्शन है। वे ईंट से शीशे को तोड़ते हैं और दोनों पायलट को सुरक्षित निकाल लेते हैं। हालांकि, उनमें से एक की तबीयत भी ठीक नहीं थी, पर उन्हें तो सिर्फ और सिर्फ जीवन और मृत्यु से लड़ते पायलट डूबते दिख रहे थे। और वे दोनों यह ठान बैठे थे कि वे उन्हें मरने नहीं देंगे, क्योंकि इन्सान की जान अब भी उनकी नजरों में सबसे कीमती थी। और जान बचाना सबसे बड़ा साहस। वे शहर की निष्ठुरता व चुप्पी से अपने गांव को डुबोना नहीं चाहते थे। वहीं दूसरी ओर, इंटरनेशनल एयरपोर्ट की चकाचौंध में डूबे एनसीआर का शहरी जीवन उस लड़के को नहीं बचा सका, जो करीब दो घंटे तक मानव निर्मित दानवीय गड्ढे रूपी तालाब में अपनी कार संग डूबता रहा। उस स्थान से कुछेक सौ मीटर दूर टूटी पुलिया पर शहर की भीड़ जमा थी, मानो कोई शूटिंग चल रही हो और हर आदमी यह तय कर बैठा था कि पानी में किसी और के लिए भला वह क्यों कूदे। उधर डूबते पुत्र का पिता बार-बार मिन्नतें कर रहा था, पर शायद उन्हें उस धुंध में यह नहीं नजर आ रहा था कि जो भीड़ खड़ी है, वह उभरते शहर की थी, जो वीडियो तो बना सकती है, अफरा-तफरी तो दिखा सकती है, जमीन तो खरीद सकती है, पर वह पानी की शीतलता जानती है और यह भी कि औरों की जान सस्ती होती है। दो घंटे तक यह मानवीय क्रूरता की कहानी चलती रही। वह पिता असहाय दौड़ता रहा और शहर की निष्ठुर भीड़ जिसके लिए उसकी पत्नी और बच्चा ही जय हिंद हैं, बिना किसी हिचक के यह फैसला कर चुकी थी कि वह पानी में नहीं उतरेगी, और न ही उतरेगा उनकी निष्ठुरता का वह आवरण, जो शहर के उस सामाजिक व्यवहार की क्रूरता और उन चेहरों को बचा के रख जाता है, जिनके लिए सिर्फ अपनी जान की कीमत होती है, बाकी कुछ नहीं। वह लड़का अपनी कार संग डूब गया और डूब गई मानवीयता भी। डूब गया वह सब कुछ, जो शहर के स्कूलों और कॉलेजों की किताबों में संवेदना, साहस और देखभाल जैसे मूल्यों के तौर पर भी छपा था। जो बचा, वह सिर्फ वीडियो था, वह निष्ठुरता थी, उस पिता की सूखी आंखें थीं, जो ठंडे तापमान के बिना भी जमना सीख चुकी थीं। इसी सर्द रात उस डूबते शहर को बचाने, वह कम पढ़ा-लिखा एक गिग वर्कर भी आया, पागलों की तरह शहर को आवाज देता रहा, और पानी में उतरने के लिए निकल पड़ा। पर किसी ने साथ नहीं दिया, आखिर किसी गांव और शहर के बीच एक सामाजिक व्यवहार की दूरी तो होती ही है। और वह अकेला उस लड़के को ढूंढता रहा, पर तब तक निस्तेज शहर के ठंडेपन से हारकर वह लड़का जल समाधि ले चुका था। वह कार और फोन, जो शहर के अभिन्न साथी हैं, उसके संग ही थे, क्योंकि उन्हें पता था कि वे फिर से ठीक हो सकते हैं। आदमी नहीं बचा, बाकी तमाशबीन भीड़ बच गई। किसी के लिए जीना और मरना किसी पाठ्यक्रम का विषय नहीं होता। पर सभी को मालूम था कि तैरना एक कौशल है तथा तमाशबीन बनकर नंगी आंखों से झांकना और खुद को बचाना भी एक सामाजिक कौशल है। अंत में जिक्र उस घटना से जुड़े उन कर्मचारियों का भी, जिनके पास अपनी जान बचाने की तमाम संभावनाएं थीं और शायद समय व इतिहास उन व्यक्तियों को गलत नहीं ठहराता। लेकिन वे नहीं भागे। तमाम निकासी होने के बावजूद सारे कर्मचारी अपने अतिथियों को बचाने में लगे रहे। ग्राहक ही भगवान है, मानो उस दिन चरितार्थ हो रहा था। वे किसी शहर के प्रतिनिधि नहीं थे, बल्कि रतन टाटा के उन मूल्यों के सिपाही थे, जो टाटा और होटल ताज की दीवारों और मुंबई के शहरी जीवन से ज्यादा ऊंचा और मजबूत था। और बाद में 26/11 के आतंकी हमलों के दौरान मुंबई के मशहूर ताज होटल के कर्मचारियों की बहादुरी भरी प्रतिक्रिया हार्वर्ड बिजनेस स्कूल में एक केस स्टडी बन गई है, जिसे हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के प्रोफेसर रोहित देशपांडे की मल्टीमीडिया केस स्टडी टेरर एट द ताज बॉम्बे: कस्टमर-सेंट्रिक लीडरशिप में डॉक्यूमेंट किया गया है। उस अध्ययन से यह भी बात सामने आई कि उनमें से तमाम कर्मचारी उन छोटे शहरों या गांवों से आते थे, जहां अब भी मनुष्य के होने का बोध बचा था। शायद कुछ दिनों बाद यह शहरी जीवन सब कुछ आसानी से भुला दे, लेकिन गुरुत्व पर स्थिर शहर से बार-बार समय यह पूछेगा कि अगर पानी ठंडा नहीं होता, भीड़ को अगर तैरना आता, तो उस गिग वर्कर के साथ कोई और भी पानी में कूदता क्या उस पिता को कोई हौसला देता क्या पता नहीं क्या होता लेकिन कोई वस्तु मरती नहीं, मरते इन्सान और जानवर हैं; इसलिए कार तो बच गई, लेकिन वह लड़का डूब गया। मरता मनुष्य है और शायद शहर को इस दंश से कुछ मुक्त करने और डूबने से बचाने लिए दूर गांव में उन दो पायलटों की जान बचाकर उन ग्रामीणों ने यह बताया कि किसी की जान बचाना कोई कौशल या तापमान का विषय नहीं, बल्कि जीवन में अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज कराना है और जीना इसी का नाम है।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Feb 04, 2026, 04:38 IST
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