नया भारत और बदलती सियासी समझ: देश का मिजाज अब संकीर्णता सहन नहीं करता, गुस्से के चलते ढहती दिखीं व्यवस्थाएं
राजनीति में अक्सर तबाही के बीच स्थिरता देखने को नहीं मिलती। ऐसा तब होता है, जब लोकतंत्र अपनी तमाम हिचकिचाहटों को त्यागकर जनभावनाओं के ज्वार की सभी बाधाओं को तोड़ने की अनुमति दे देता है। ऐसा तब होता है, जब सांस्कृतिक स्मृतियों को वे लोग सहेजते हैं, जो आने वाले कल की नब्ज को बेहतर ढंग से पहचानते हैं। यह विशेषाधिकार के दंभ में जकड़ी जड़ मानसिकता पर कल्पना की जीत है। हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों के बाद का भारत, भ्रमित लोगों के बिखराव को समेट रहा है; और देश का मिजाज अब राजनीति में किसी 'बुरे विचार' के बने रहने को बर्दाश्त नहीं करता। उप-राष्ट्रवादी दिखावे, मुक्तिदाता के रूप में कमजोर महिला का मिथक, और 'सर्वोच्च नेता' की पूजा के बुरे विचार। जब बदनाम लोगों का पतन होता है, तो इसकी संभावना कम ही होती है कि कोई उनके प्रतीकों को याद करेगा; क्योंकि कूड़े के ढेर से हमें जो संदेश मिलता है, उसे हम नजरअंदाज नहीं कर सकते—वह यह है कि सत्ता तब सजा बन जाती है, जब उसका इस्तेमाल भ्रम में जीने वाले छोटे-मोटे सत्ताधीशों द्वारा किया जाता है। कोलकाता से लेकर चेन्नई और तिरुवनंतपुरम तक, नए की उम्मीद और पुराने के प्रति गुस्से के चलते मौजूदा व्यवस्था ढह गई है। तमिलनाडु में एक नई चमक बिखरी है—एक ऐसी जगह, जहां गहरे चश्मे और रोएंदार टोपी वाले नायक (एमजीआर) की गाथा ने 'मुक्ति की राजनीति' को अपने चरम पर पहुंचा दिया था। तमिल राजनीति एक ऐसे मंच की तरह बनी रही, जहां आम इन्सानों का अस्तित्व ही मिट गया था; और एमजीआर के बाद भी यह सिलसिला जारी रहा। भावनात्मक अतिरेक से निर्मित यह मंच ऐसे नेताओं का घर था, जो अपने लोकतांत्रिक कद से कहीं अधिक विशाल थे, जिनकी छवि गैर-राजनीतिक जुड़ावों के कारण और भी बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई थी। यह नया रूप पुराने मिथक का एक पीढ़ीगत अपडेट है और युवाओं का आज के जमाने वाला अधीर स्वभाव, तमिल राजनीति की उस पुरानी खासियत में समकालीन रंग भर देता है। विजय, असल में, पुरानी प्रवृत्ति की ही नई अभिव्यक्ति हैं। ठीक बगल (केरल) में, पुराने को नकारना तय था। सत्ता में रहे भारतीय कम्युनिज्म के आखिरी नेता में सोवियत जमाने के उस उदास महासचिव की झलक थी; और, अपने कार्यकाल के आखिरी पलों में लोगों के सामने खुद को इन्सान दिखाने की उस बनावटी नौटंकी को छोड़कर, उन्होंने ज्यादातर एक कॉमिक-बुक के सम्राट जैसा बर्ताव किया—यह भूलकर कि उनका राज एक छोटे-से राज्य पर था, जिसका उस हर सत्ताधारी से बड़ा पंगा रहता था, जो उसकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने की हिम्मत करता था। और यह भूलते हुए कि वह एक अच्छे प्रशासक थे, जिनके लिए तीसरा कार्यकाल संभव था। चरित्र की एक कमी ने उनसे सत्ता छीन ली और भारतीय कम्युनिज्म से उसका आखिरी नारा भी। पिनाराई विजयन के उत्तराधिकारी 'नई व्यवस्था' के मालिक होने का दावा नहीं कर सकते; वे वहां इसलिए हैं, क्योंकि केरल में जो कुछ हुआ, वह कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन की जीत से कहीं ज्यादा विजयन की करारी हार थी, और इस गठबंधन में हर तरह के सांप्रदायिकतावादी तत्व शामिल हैं। अगर वामपंथ एक चिड़चिड़े बुजुर्ग के कारण कमजोर पड़ गया, तो उम्मीद है कि कांग्रेस अब लेन-देन और तुष्टीकरण की राजनीति शुरू करेगी। केरल में आए इस बदलाव में कुछ भी नया नहीं है। आज बंगाल भारतीय राजनीति की सबसे नई कहानी बयां कर रहा है। इसकी विशालता को पूरी तरह से तृणमूल के बिखराव से नहीं मापा जा सकता। ममता बनर्जी की विकास-गाथा इसका एक बेहतरीन अध्ययन है कि कैसे एक ऐसी कहानी, जिसकी शुरुआत ग्रामीण-इलाकों के एक रूमानी किस्से के तौर पर हुई थी, अंततः एक सर्वव्यापी आतंक में तब्दील हो सकती है। जब एक ऐतिहासिक दौर के बाद वामपंथियों ने बंगाल गंवा दिया, तो उस खाली जगह को भरने के लिए वह सबसे भरोसेमंद और असली योद्धा बनकर सामने आईं। उन्होंने सत्ता में रहते हुए एक दशक से भी ज्यादा समय में, बंगाल की 'मुक्तिदाता' के रूप में अपनी एक अलग ही पहचान गढ़ी। वह बंगाल, जो अपने पतन का शोक नहीं मनाता, एक थका-हारा राज्य है, जहां की संस्थाएं अत्यधिक राजनीतिकरण का शिकार हैं और जहां हिंसा एक आधिकारिक पहचान बन चुकी है। उसके साथ ही, वैकल्पिक राजनीति का एक और पाखंड भी समाप्त हो गया। सांस्कृतिक उथल-पुथल ने ममता के करिश्मे को तोड़कर रख दिया। उनकी रबर की चप्पलों के नीचे जमीन दरक रही थी। अंदरूनी बिखराव आसन्न था। सांप्रदायिक संरक्षण और वर्चस्व की खूनी रस्मों की पुरानी गतिशीलता अब एक नई लहर के आगे जगह छोड़ रही थी, जिसमें सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक प्रतिक्रिया के बीच एक संतुलन स्थापित हो रहा था। धर्म को बाधा मानने का पुराना धर्मनिरपेक्ष दिखावा ममता के तौर-तरीकों का एक अहम हिस्सा रहा है। बंगाल की स्वाभाविक राजनीतिक प्रवृत्ति में एक हिंदू तत्व निहित है। भाजपा जिस तरह से दबी हुई सांस्कृतिक स्मृति को राजनीतिक पूंजी में बदलने में सफल रही, उसका श्रेय उसके चुनाव प्रचार के स्वरूप को जाता है: बंगाल की हिंदू विरासत को पुनः स्थापित करना उसके लिए उतना ही जरूरी था, जितना कि ममता की तानाशाही को नकारना। जिस अभियान ने भाजपा को चुनाव जिताया, वह ममता पर हमले से कहीं अधिक, बंगाल की भावना के बारे में एक संवाद था। और इसीलिए बंगाल के साथ भाजपा का रिश्ता, उस रिश्ते से कहीं ज्यादा स्वाभाविक और टिकाऊ होगा, जो इस राज्य का वामपंथियों और ममता के साथ रहा है। बंगाल में जो कुछ भी नया है, वह उतना ही पुराना है, जितना कि 'हम कौन हैं' का साझा सवाल। ऐसे सवाल को चुनावी मैदान में उतारने के लिए बहुत ज्यादा राजनीतिक सूझ-बूझ की जरूरत होती है—किसी श्रेष्ठतावादी की संकीर्ण सोच के साथ नहीं, बल्कि सबको जोड़ने वाले की उदारता के साथ। नरेंद्र मोदी की कहानी इसलिए भी बेमिसाल होती जा रही है, क्योंकि किसी भी लोकतांत्रिक देश में कोई दूसरा नेता उनकी जैसी सहनशक्ति और कल्पनाशक्ति की बराबरी नहीं कर सकता। ऐसे समय में, जब बड़े पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों के नेताओं को जोड़ने वाली एकमात्र चीज उनकी 'बासीपन' या 'पुरानापन' है (चाहे वे ट्रंप हों या स्टार्मर) मोदी एक ऐसे नेता के तौर पर अकेले खड़े हैं, जिनके पास आज भी ऐसे तर्क मौजूद हैं, जिनके दम पर वे खुद का एक नया और बेहतर स्वरूप गढ़ते हैं।
- Source: www.amarujala.com
- Published: May 13, 2026, 02:29 IST
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