क्या नेपाल त्रासदी को रोका जा सकता था?: तबाही में छिपा जलवायु संकट का संदेश, तीन देशों के सहयोग की जरूरत
हाल ही में, नेपाल-तिब्बत के हिमालयी इलाके में आई भीषण बाढ़ कोई सामान्य प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह त्रासदी एक गंभीर संदेश लेकर आई है कि हम भले ही अलग-अलग देशों में रहते हों, लेकिन प्रकृति में होने वाले बदलाव का असर हम सभी पर पड़ता है। वैज्ञानिक अभी यह पता लगाने में जुटे हैं कि आखिर इस आपदा की असली वजह क्या थी। हालांकि, हाल के दिनों में बढ़ा तापमान और ग्लेशियर की तेजी से पिघलती बर्फ इसकी एक संभावित वजह हो सकती है। नेपाल पिछले तीन दशकों में अपने ग्लेशियरों की करीब एक-तिहाई बर्फ गंवा चुका है। यहां एक दिलचस्प विरोधाभास है। दुनिया की कार्बन समस्या के लिए नेपाल का योगदान न के बराबर है। 2024 में, जीवाश्म ईंधन और उद्योगों से होने वाले वैश्विक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में नेपाल की हिस्सेदारी मात्र 0.05 फीसदी थी। यानी बेहद कम कार्बन उत्सर्जन करने वाला यह देश गर्म होती धरती के दुष्परिणामों का भयानक शिकार बना। इसका सबसे बड़ा सबक यही है कि हमारा पारिस्थितिकी तंत्र एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा है। ग्लेशियर, जंगल, महासागर, बारिश और हवाएं पृथ्वी का ही हिस्सा हैं। हम दुनिया के किसी एक हिस्से में जो करते हैं, उसका असर हजारों किलोमीटर दूर रहने वाले लोगों तक पहुंच सकता है। धरती का अपना एक क्रम और संतुलन है, जिसका हमें सम्मान करना चाहिए। हमारी जिम्मेदारी सिर्फ प्रकृति से फायदा उठाना ही नहीं है, बल्कि ऐसे कामों से बचना भी है, जो उसके संतुलन को बिगाड़ते या नुकसान पहुंचाते हैं। हम प्रकृति से आखिर कितना ले सकते हैं कितना उत्पादन कर सकते हैं कितना उपभोग कर सकते हैं और सबसे अहम, प्रकृति कितना कुछ झेल सकती है नेपाल की इस त्रासदी ने इन सवालों को फिर से चर्चा में ला दिया है। पिघलते ग्लेशियर नदियों के प्रवाह और उनके स्वरूप को बदल सकते हैं। पिघलता हुआ ग्लेशियर नदियों पर असर डाल सकता है। बर्बाद जंगल पानी और मिट्टी को प्रभावित कर सकते हैं। महासागरों में होने वाले बदलाव हजारों किलोमीटर दूर के मौसम पर असर डाल सकते हैं। आखिर नेपाल-तिब्बत सीमा पर हुआ क्या था दरअसल, वहां भूकंप की शुरुआती खबरों के बाद लोगों को लगा कि भूकंप के झटकों से जमीन खिसकी होगी और भूस्खलन के कारण ही यह भीषण बाढ़ आई। बाद में साफ हुआ कि आपदा की शुरुआत बर्फ व चट्टानों के बड़े पैमाने पर खिसकने से हुई थी। इससे अचानक तेज बाढ़ आई और भारी मात्रा में मलबा नीचे की ओर बह निकला। वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि बर्फ, चट्टान और तलछट का यह बड़ा हिस्सा समुद्र तल से करीब 5,000 मीटर की ऊंचाई से 1.2 किलोमीटर नीचे गिरा। इससे नीचे बह रही नदी कुछ समय के लिए बंध गई और वहां एक झील बन गई। जब ग्लेशियर से आया पानी इस झील में भरा, तो अस्थायी बांध टूट गया और पानी का तेज बहाव सीमा के दोनों ओर बसे गांवों तक पहुंच गया। इस दौरान शुरुआती चेतावनी प्रणाली भी विफल रही। निगरानी कैमरों ने तिब्बत में स्थानीय समयानुसार सुबह 8:32 बजे पानी के शुरुआती बहाव को रिकॉर्ड कर लिया था। लेकिन, चीन की ओर से नेपाली अधिकारियों को इसकी सूचना 26 मिनट बाद मिली। बाढ़ जैसे-जैसे नीचे की ओर बढ़ी, कई अहम निगरानी केंद्र या तो नष्ट हो गए या फिर डाटा भेजने में नाकाम रहे। सुबह 9:13 बजे लोगों के मोबाइल फोन पर चेतावनी संदेश भेजे गए, लेकिन तब तक निचले इलाकों में रहने वाले कई लोगों के लिए बहुत देर हो चुकी थी। एक प्रधानाध्यापक ने फोन पर मिली सूचना के बाद महज 10 मिनट में 900 से अधिक छात्रों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। यह घटना बताती है कि समय पर मिली छोटी-सी चेतावनी भी कितनी जिंदगियां बचा सकती है। नेपाल अब आपदा की निगरानी और शुरुआती चेतावनी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए चीन के साथ बेहतर सहयोग मांग रहा है। इस त्रासदी ने दुर्गम हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों, ग्लेशियल झीलों, भूस्खलन और नदियों की स्थिति से जुड़ी सूचनाओं के दोनों देशों के बीच सीमित आदान-प्रदान की पुरानी चिंता को फिर से उजागर किया है। इस आपदा से करीब तीन महीने पहले नेपाली और चीनी अधिकारियों ने काठमांडो में मुलाकात की थी। बैठक में बाढ़, मौसम और ग्लेशियर से जुड़े खतरों पर सहयोग, ग्लेशियल झीलों की सूची तैयार करने, खतरे वाले क्षेत्रों की मैपिंग करने और संयुक्त रूप से जोखिम कम करने जैसे उपायों पर चर्चा हुई। हालांकि, नेपाली अधिकारियों का कहना है कि बैठक के बाद उन्हें उम्मीद के मुताबिक जानकारी नहीं मिली, खासकर ग्लेशियरों में शुरुआती बदलाव और जलस्तर में हो रहे परिवर्तन से जुड़ी सूचनाएं। चीन का कहना है कि उसने आपदा से पहले ही नेपाल को चेतावनी दे दी थी। इस भीषण आपदा से 12 दिन पहले चीन के विश्व मौसम विज्ञान केंद्र ने नेपाली अधिकारियों को बताया था कि मानसून कमजोर रहने का असर इलाके पर पड़ सकता है। उसने भारी बारिश के साथ भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी संभावित आपदाओं को लेकर भी चेतावनी दी थी। हालांकि, नेपाली अधिकारियों का कहना है कि यह चेतावनी मुख्य रूप से बारिश के पूर्वानुमान तक सीमित थी। इसमें ग्लेशियर, हिमस्खलन, जलस्तर बढ़ने या अचानक पैदा होने वाले दूसरे खतरों की रियल-टाइम निगरानी से जुड़ी जानकारी नहीं थी। भारतीय राज्यों में भी बाढ़ का खतरा बेहद गंभीर रहा है। हालांकि, कुछ इलाकों में तत्काल पैदा हुआ खतरा शायद अब टल गया है। बाढ़ का पानी बिहार की गंडक, कोसी और गंगा नदियों तक पहुंच गया, जिसके बाद अधिकारियों को हाई अलर्ट पर रहना पड़ा। खतरनाक तरीके से बढ़ते जलस्तर पर नजर रखने के लिए बड़ी संख्या में टीमें तैनात की गईं, खासकर वाल्मीकि नगर बैराज और संवेदनशील तटबंधों के आसपास। नदी किनारे रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया। उत्तर प्रदेश में भी अधिकारी सतर्क रहे। राज्य के राहत आयुक्त ने हालात पर रियल-टाइम नजर रखी, क्योंकि नेपाल से निकलने वाली उफनती नदियां स्वाभाविक रूप से भारतीय इलाकों में प्रवेश करती हैं। पूरी तस्वीर बताती है कि इस विनाशकारी घटना का असर नेपाल, भारत और चीन, तीनों देशों तक पहुंचा है। ऐसे में, सबसे बड़ा सवाल यही है कि भू-राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर तीनों देशों के बीच बेहतर सहयोग और तालमेल के लिए एक व्यावहारिक ढांचा कैसे तैयार किया जाए।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Sep 03, 2026, 05:20 IST
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