Medical AI: क्या डॉक्टर्स से भी स्मार्ट है चीन का DeepRare, दुर्लभ बीमारियों की पहचान में बनाया वर्ल्ड रिकॉर्ड
चीन के शोधकर्ताओं ने डीपरेयर नाम का एक नया एआई टूल विकसित किया है, जो दुर्लभ और जटिल बीमारियों की पहचान तेजी से कर सकता है। नेचर में प्रकाशित स्टडी के अनुसार, 6,401 मामलों में यह टूल 79 प्रतिशत तक सटीक साबित हुआ और कई अनुभवी डॉक्टरों से बेहतर प्रदर्शन किया। डीपरेयर 40 से ज्यादा एआई एजेंट्स की मदद से मेडिकल नोट्स और जेनेटिक डेटा का विश्लेषण करता है। AI बना रेयर डिजीज डिटेक्टिव दुनिया भर में लाखों लोग ऐसी बीमारियों से जूझ रहे हैं, जिनकी पहचान करने में वर्षों लग जाते हैं। इन्हें रेयर डिजीज कहा जाता है। अक्सर मरीज एक डॉक्टर से दूसरे डॉक्टर के पास भटकते रहते हैं। इसी समस्या को हल करने के लिए डीपरेयर तैयार किया गया है। इसका मकसद है कि तेज, सटीक और प्रमाण-आधारित डायग्नोसिस। ये भी पढ़े:UPI Payments:बिना इंटरनेट के भी कर पाएंगे यूपीआई पेमेंट, जानें आसान स्टेप-बाय-स्टेप तरीका सफलता की दर: 6,401 मामलों की जांच में यह टूल 79% सटीक रहा, जबकि एक्सपर्ट्स केवल 66% तक ही पहुंच पाए। दुर्लभ बीमारियों का इलाज: दुनिया भर में 7,000 से ज्यादा दुर्लभ बीमारियां हैं, जो 30 करोड़ लोगों को प्रभावित करती हैं। डीपरेयर इनका पता लगाने में सबसे तेज है। 40 एआई एजेंट्स की शक्ति: इसमें एक साथ 40 से ज्यादा एआई एजेंट काम करते हैं, जो मरीज के लक्षणों और जेनेटिक कोड का विश्लेषण करते हैं। जेनेटिक मास्टर: 80 प्रतिशत दुर्लभ बीमारियां जेनेटिक होती हैं और डीपरेयर जेनेटिक डाटा को स्कैन करने में मौजूदा टूल्स (जैसे एक्सोमिसर) से कहीं आगे निकल गया है। डीपरेयर काम कैसे करता है डीपरेयर के कोर में एक बड़ा लैंग्वेज मॉडल काम करता है, जिसे मल्टी-एजेंट फ्रेमवर्क में जोड़ा गया है। इसके सिस्टम में 40 से ज्यादा AI एजेंट्स शामिल हैं, जो अलग-अलग काम करते हैं। जैसे: मेडिकल नोट्स से लक्षण निकालना। लक्षणों को संभावित बीमारियों से मैच करना। रिसर्च पेपर्स और मेडिकल लिटरेचर खोजना। जेनेटिक सीक्वेंसिंग डेटा का विश्लेषण। यह पूरी प्रक्रिया मिलकर संभावित डायग्नोसिस की रैंक की गई सूची तैयार करती है। ये भी पढ़े:UPI Payments:बिना इंटरनेट के भी कर पाएंगे यूपीआई पेमेंट, जानें आसान स्टेप-बाय-स्टेप तरीका मैनुअल रिव्यू की जरूरत कम डीपरेयर की खास बात यह है कि यह मेडिकल सोर्स से वेरिफाइड रेफरेंस के साथ परिणाम देता है। इससे डॉक्टरों को अलग से लंबे लिटरेचर रिव्यू की जरूरत कम पड़ती है। ये टूल 15 अन्य डायग्नोस्टिक सिस्टम से बेहतर प्रदर्शन करता पाया गया। एक स्टडी ग्रुप में इसने 69 प्रतिशत मरीजों में जेनेटिक कारणों की सही पहचान की और Exomiser जैसे लोकप्रिय टूल से आगे निकला। हेल्थकेयर में एआई का अगला कदम यह तकनीक डॉक्टरों की जगह लेने के लिए नहीं, बल्कि उनकी मदद करने के लिए बनाई गई है। जैसे अगर किसी मरीज की बीमारी जल्दी पहचान ली जाए, तो इलाज जल्दी शुरू हो सकता है, गलत उपचार से बचाव संभव है और मरीज व परिवार की मानसिक -आर्थिक परेशानी कम हो सकती है। आगे चलकर ऐसे टूल्स अस्पतालों के क्लिनिकल वर्कफ्लो का हिस्सा बन सकते हैं। टेक एक्सपर्ट्स का मानना है कि एआई-आधारित डायग्नोस्टिक टूल्स आने वाले वर्षों में मेडिकल साइंस को नई दिशा दे सकते हैं। हालांकि, अंतिम निर्णय अभी भी डॉक्टरर्स के हाथ में रहेगा। एआई केवल सपोर्ट सिस्टम की तरह काम करेगा।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Feb 21, 2026, 10:47 IST
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