नेतन्याहू नहीं, यह इस्राइल की परीक्षा है: जहां चुनावी गणित से बड़ा है नैतिक संकट

बीते मंगलवार इस्राइल में हुए चुनाव में किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है। नेतन्याहू ने जहां एक राष्ट्रीय दक्षिणपंथी सरकार बनाने का आह्वान किया है, वहीं यहूदी विपक्षी गठबंधन के नेता गादी आइजेनकोट का कहना है कि इस्राइल की जनता ने नेतन्याहू के कार्यकाल को खत्म करने के लिए वोट दिया है। ऐसे में संभावना है कि इस्राइल के अरब अल्पसंख्यकों के नेतृत्व वाली पार्टियां किंगमेकर की भूमिका निभा सकती हैं। इस्राइल में कम से कम कानूनसम्मत ढंग से और एक तय समय पर चुनाव तो हो रहे हैं। क्या यही बात महमूद अब्बास के नेतृत्व वाले फलस्तीनी प्राधिकरण के बारे में कही जा सकती है; जिन्होंने 2005 में चार साल के कार्यकाल के लिए चुने जाने के बाद से चुनाव नहीं कराए हैं क्या यही बात हमास के बारे में भी कही जा सकती है, जिसने 2006 में फलस्तीनी विधायी चुनाव जीतने के बाद देश के राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया, और तब से वह शासन कर रहा है क्या यही बात मिस्र के बारे में भी कही जा सकती है, जहां के राष्ट्रपति 2013 के तख्तापलट के जरिये सत्ता में आए और लगभग 97 प्रतिशत वोट पाकर चुनाव जीत गए तुर्किये के राष्ट्रपति भी अपने राजनीतिक विरोधियों व स्वतंत्र पत्रकारों को जेल में डालकर सत्ता में बने हुए हैं। जॉर्डन में दमनकारी वंशवादी राजशाही है; और लेबनान के बारे में भी क्या यही बात कही जा सकती है, जहां की संसदीय सरकार हिज्बुल्ला व तेहरान में बैठे उसके आकाओं से अपनी बात नहीं मनवा पाती निश्चित रूप से इस्राइल एक ऐसा देश है, जिसमें कमियां हैं और जिसकी आलोचना की जा सकती है। लेकिन, इस्राइल के कट्टर आलोचकों की बातों को तब गंभीरता से लेना मुश्किल हो जाता है, जब वे आजाद फलस्तीन की मांग तो करते हैं, पर रामल्लाह और गाजा में हो रहे अत्याचारों पर आवाज नहीं उठाते; या फिर, जब वे आजादी और समानता के नाम पर पश्चिम एशिया के एकमात्र उदार लोकतंत्र को ही खत्म करना चाहते हैं। इस्राइल के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण माने जा रहे इस चुनाव से शायद ही कुछ बदलने वाला है, क्योंकि इस बार, सभी प्रमुख दावेदार राजनीतिक रूप से दक्षिणपंथी हैं। उनमें से कोई भी फलस्तीनी राज्य नहीं चाहता। उनमें से कोई भी वेस्ट बैंक से इस्राइलियों को नहीं हटाएगा और न ही बस्तियों के निर्माण पर पूर्णतः रोक लगाएगा। वे सभी हमास, हिज्बुल्ला और ईरान के प्रति एक सख्त सैन्य रुख अपनाना चाहते हैं। जैसा कि रुझानों से पता चलता है, यदि किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तो किसी के पास इतने वोट नहीं होंगे कि वे पिछली बार की तरह नीतियों में बड़े बदलाव ला सकें। यानी प्रधानमंत्री के तौर पर बेंजामिन नेतन्याहू का कोई भी व्यावहारिक विकल्प इतना बदलाव नहीं ला पाएगा कि दुनियाभर में उनके आलोचकों की बढ़ती सूची को शांत किया जा सके। लेकिन, इस्राइल को एक अलग तरह के बदलाव की सख्त जरूरत है। इस चुनाव में जो दांव पर लगा है, वह किसी नीति के बारे में नहीं है। यह भावना की बात है। सवाल यह है कि क्या यहूदी राष्ट्र उस मूल विचार-पूरा इस्राइल-और उस यहूदी सिद्धांत का सम्मान करेगा, जिसके अनुसार हर यहूदी दूसरे यहूदी के लिए जिम्मेदार है। सत्ता में लौटने के बाद से, नेतन्याहू ने बार-बार इन दोनों का उल्लंघन किया है। उन्होंने अपने निजी स्वार्थ के लिए एक ऐसा न्यायिक सुधार लागू किया, जिसने देश को दो हिस्सों में बांट दिया। भले ही इसके कुछ सैद्धांतिक फायदे बताए गए हों, लेकिन असल में यह देश में बहुसंख्यकवाद पर लगाम लगाने वाली एकमात्र वास्तविक संस्थागत व्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश जैसा था। इसके विरोध में लाखों इस्राइली सड़कों पर उतर आए। उन्होंने अपने सुरक्षा प्रमुखों की बार-बार दी गई चेतावनियों को भी नजरअंदाज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि राजनीतिक और सामाजिक बंटवारे से इस्राइल की सैन्य तैयारी कमजोर हो रही है और एक ऐसी कमजोर छवि बन रही है, जिसका फायदा इस्राइल के दुश्मन उठाएंगे। सात अक्तूबर के बाद से इस्राइली सेना की हर कामयाबी का श्रेय तो नेतन्याहू ने लिया, पर इस भीषण तबाही की अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी से वह लगातार और शर्मनाक ढंग से इन्कार करते रहे। जवाबदेही और सच्चाई सामने आने के डर से उन्होंने इसकी जांच के लिए किसी स्वतंत्र सरकारी आयोग के गठन का विरोध किया, जो इस्राइल की दशकों पुरानी परंपरा के बिल्कुल खिलाफ था। इसके अलावा, उन्होंने यहूदी आतंकवाद के नासूर को फैलने दिया। इसकी मुख्य वजह थी कि अपनी राजनीतिक जरूरतों के चलते उन्हें इतामार बेन-गवीर से उलझना मंजूर नहीं था। बेन-गवीर एक कट्टर दक्षिणपंथी राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री हैं, जो इस्राइल के कैबिनेट स्तर के पदों पर रहे लोगों में सबसे ज्यादा बदनाम हैं। इसके विपरीत, नेतन्याहू को इस्राइल की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने का श्रेय दिया जा सकता है, जो अब विकसित दुनिया की सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात और अन्य अरब देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी कायम की; हिज्बुल्ला को कमजोर किया, जिससे सीरिया में बशर अल-असद के शासन के पतन की प्रक्रिया तेज हुई; और अमेरिकी मदद से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को संभवतः कई वर्षों के लिए पीछे धकेल दिया। लेकिन, इन उपलब्धियों से इस्राइली समाज के टूटने, और उस बुनियादी नैतिक समझौते के उल्लंघन की भरपाई नहीं हो सकती, जो इस्राइलियों को एक-दूसरे से और उनके नेताओं से जोड़ता है। सात अक्तूबर के बाद से इस्राइल की नीतियों पर की गई कई तर्कहीन आलोचनाओं में से, यह सबसे कमजोर है कि इस्राइल को कुछ और उदारवादी सहानुभूति पाने के लिए अपनी सुरक्षा का सौदा कर लेना चाहिए था। इस्राइल का अस्तित्व इसलिए नहीं है कि वह यहूदियों के पीड़ित होने को दुनिया के सामने दिखाए; बल्कि इसलिए है, ताकि इस पीड़ा को खत्म किया जा सके। सवाल यह है कि क्या हमास के आतंक, ईरान की मिसाइलों, और लगातार बनी रहने वाली आपातकालीन स्थिति का बोझ उठाने वाले लोगों को, साथ ही दुनियाभर की उस निरंतर निंदा को झेलने वाले लोगों को एक ऐसी सरकार मिलनी चाहिए, जो उनके बलिदान, दृढ़ता और साहस के योग्य हो

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Oct 29, 2026, 03:21 IST
पूरी ख़बर पढ़ें »

Read More:
Opinion National Israel



नेतन्याहू नहीं, यह इस्राइल की परीक्षा है: जहां चुनावी गणित से बड़ा है नैतिक संकट #Opinion #National #Israel #SubahSamachar