सैम ऑल्टमैन को भारत का जवाब!: क्या सर्वम बनेगा AI की दुनिया का UPI, इस रेस में क्या है सबसे बड़ा रोड़ा?

एक भारतीय वैज्ञानिक ने हाल ही में कहा था, "मच्छर मारने के लिए रिवॉल्वर का इस्तेमाल नहीं करते।" यह सीधा कटाक्ष था उन पश्चिमी एआई मॉडल्स पर जो बहुत भारी हैं। महंगे हैं। भारत की जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं। आज दुनिया में एआई की होड़ मची है। एक तरफ गूगल और चैट-जीपीटी जैसे ग्लोबल प्लेयर्स हैं, तो दूसरी तरफ भारत के 'सर्वम' और 'भारत जीपीटी' जैसे नाम। भारत मंडपम में भी इसकी खासी चर्चा रही, लेकिन क्या ये सिर्फ एक नई टेक्नोलॉजी है या फिर ये 21वीं सदी का नया 'स्वतंत्रता संग्राम' है आइए इसे डिकोड करते हैं AI सिर्फ चैटबॉट नहीं, संप्रभुता का हथियार आम तौर पर लोग समझते हैं कि एआई मतलब एक डिब्बा, जिसमें सवाल डालो और जवाब मिल जाए। ठीक वैसे, जैसे एटीएम कार्ड डाला और नोट बाहर.. नहीं! एआई आज की नई परम शक्ति है। अमेरिका ने इसे अपनी कॉर्पोरेट ताकत बनाया है। चीन ने इसे अपना रणनीतिक औजार बनाया है। लेकिन भारत के लिए यह 'Sovereign AI' मतलब संप्रभु एआई का मामला है। सोचिए, यदि हमारे देश का डेटा, हमारी न्यायिक प्रक्रिया, हमारी रक्षा रणनीति विदेशी सर्वर पर चल रही हो, तो क्या हम वाकई स्वतंत्र हैं 1947 में हमने राजनीतिक आजादी पाई थी, लेकिन 21वीं सदी में आजादी का मतलब है- आपका डेटा आपके देश में। आपका मॉडल आपके नियंत्रण में और आपका एल्गोरिद्म आपके मूल्यों के अनुरूप। हकीकत - पश्चिमी बनाम भारतीय मॉडल अब सवाल उठता है कि ये पश्चिमी मॉडल हमारे लिए पर्याप्त क्यों नहीं हैं इसे समझने के लिए हमें इनके बुनियादी फर्क को देखना होगा। सबसे पहले बात पश्चिमी मॉडल की। जैसे- ChatGPT या Google Gemini। ये मुख्य रूप से अंग्रेजी भाषा पर आधारित हैं। इन्हें चलाने के लिए हर वक्त हाई-स्पीड इंटरनेट चाहिए। इनका डेटा विदेशी सर्वर पर प्रोसेस होता है, जिससे आपकी कोई गोपनीयता तो नहीं रहती। और सबसे बड़ी बात, इनका पूरा ढांचा पश्चिमी सोच और उनकी संस्कृति के हिसाब से बना है। अब इसके मुकाबले भारतीय मॉडल 'सर्वम' को देखिए। यह हिंग्लिश और हमारी अपनी 22 क्षेत्रीय भाषाओं को गहराई से समझता है। इसकी सबसे बड़ी खूबी है 'ऑफलाइन मोड' यानी बिना इंटरनेट के भी यह आपके डिवाइस पर काम कर सकता है। यह सस्ता है और भारत की सीमाओं के भीतर आपके डेटा को सुरक्षित रखता है। यह हमारी विविधताओं, हमारे लहजे और हमारी मिश्रित भाषा को पहचानने में सक्षम है। 'सर्वम' की असली ताकत यही है कि यह 'लो-रिसोर्स' यानी कम संसाधनों में भी भारत के गांवों तक पहुंचने का दम रखता है। GPU की कमी और निवेश का असली सच अब आते हैं एक कड़वी हकीकत पर। एआई की इस रेस में सबसे बड़ा रोड़ा है GPU (Graphics Processing Unit)। ये चिप्स एआई का 'कच्चा तेल' हैं। दुनिया में इनका एक ही राजा है- एनवीडिया (Nvidia)। हकीकत ये है कि भारत के पास फिलहाल इन चिप्स की भारी कमी है। एनवीडिया यानी वो कंपनी, जिसने पूरी दुनिया के डेटा सेंटर्स पर कब्जा कर रखा है। इनके बनाए GPU वो 'सुपर-इंजन' हैं, जिनके बिना बड़े से बड़ा एआई मॉडल एक कदम नहीं चल सकता। सीधा गणित ये है कि जिसके पास एनवीडिया की चिप है, वही एआई की इस रेस का असली सारथी है। हकीकत ये है कि भारत के पास फिलहाल इन चिप्स की भारी कमी है, लेकिन क्या हमें अमेरिका की तरह अरबों डॉलर इस पर फूंकने चाहिए ओपन एआई के सैम ऑल्टमैन 7 लाख करोड़ डॉलर के निवेश की बात करते हैं। बड़ा सवाल सावधान रहिए! भारत के लिए यह न तो संभव है और न ही समझदारी। क्यों क्योंकि हमारी प्राथमिकताएं अलग हैं। हमें स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च करना है। हमें अमेरिका की तरह 'ब्रूट फोर्स' यानी सिर्फ पैसे की ताकत नहीं चाहिए, हमें 'मितव्ययी नवाचार' (Frugal Innovation) चाहिए। जैसे हमने मंगल मिशन को दुनिया में सबसे सस्ता बनाया, वैसे ही हमें एआई का 'इसरो मॉडल' विकसित करना होगा। स्वावलंबन का मतलब नकल करना नहीं, अपनी जरूरतों के हिसाब से रास्ता बनाना है। चुनौतियांः डेमो से डिप्लॉयमेंट तक का सफर हकीकत यह है कि डेमो वीडियो में सब चमकता हुआ दिखता है, लेकिन असली परीक्षा भारत की पेचीदगियों में होती है। हमारी चुनौतियां क्या हैं पहली चुनौती है मेसी (Messy) दस्तावेज। हमारे सरकारी दफ्तरों में लाखों फाइलें धुंधली हैं, हाथ से लिखी हैं। पश्चिमी एआई यहां फेल हो जाते हैं। 'सर्वम' का काम इसी अव्यवस्थित डेटा को व्यवस्थित करना है। दूसरी चुनौती है भाषाई विविधता और शोरगुल। हम भारतीय एक वाक्य में तीन भाषाएं भी मिला देते हैं। हिंदी के साथ इंग्लिश और संस्कृत या तमिल के साथ कन्नड़ और अंग्रेजी, मराठी के साथ बंगाली या असमिया। भारत की विविधातावादी संस्कृति और बहुलता वाली भाषा में ये बहुत आम है। पीछे से ट्रैफिक का शोर होता है। क्या एआई इसे समझ पाएगा तो 'सर्वम' यहां दावा करता है कि वह कॉल सेंटरों और ग्राउंड रिपोर्टर्स की खराब रिकॉर्डिंग को भी सटीक समझ सकता है। यह दावा कई मोर्चों पर हकीकत बनकर भी उभरा है। तीसरी बड़ी चुनौती है प्रतिभा पलायन। हमारे बेहतरीन इंजीनियर आज सिलिकॉन वैली में बैठे हैं। उन्हें भारत में रोकने के लिए हमें सिर्फ जज्बात नहीं, बल्कि एक मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर देना होगा। डिजिटल स्वराज का संकल्प अंत में बात वही आती है कि क्या हम सिर्फ एक बाजार बने रहेंगे भारत एक चौराहे पर खड़ा है। हमारे पास दुनिया का सबसे बड़ा डेटा है और यूपीआई (UPI) जैसा डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर। 'सर्वम' सिर्फ एक कंपनी नहीं, एक संकेत है कि भारत अब सिर्फ 'डाउनलोड' करने वाला देश नहीं रहना चाहता। जो देश अपना एल्गोरिद्म खुद नहीं लिखता, उसकी प्राथमिकताएं कोई और तय करता है। हम दोबारा वही ऐतिहासिक गलती नहीं कर सकते जहां बाजार हमारा हो और नियंत्रण किसी और का। 'सर्वम' पूरी तरह सफल होगा या नहीं, यह तो वक्त बताएगा। लेकिन एक बात साफ है कि भारत अब रेस के ट्रैक पर उतर चुका है। यह डिजिटल युग का नया अध्याय है और याद रखिए, जो मशीन भारत को समझ गई, वो पूरी दुनिया को समझ सकती है। क्योंकि मशीनों के लिए भारत समझना बहुत जटिल है। अब अंत में कुछ सवाल 1. संप्रभुता पर सवाल: क्या आपको लगता है कि भारत को अपनी हर संवेदनशील जानकारी और डेटा के लिए पश्चिमी एआई (AI) मॉडल्स पर निर्भर रहना चाहिए क्या यह हमारी डिजिटल आजादी के लिए खतरा नहीं है 2. निवेश बनाम जरूरत: सैम ऑल्टमैन एआई में खरबों डॉलर के निवेश की बात करते हैं, लेकिन क्या भारत जैसे देश को 'अंधाधुंध पैसा' बहाना चाहिए या फिर हमें अपनी कमियों के बीच 'जुगाड़' और 'किफायती तकनीक' (जैसे 'सर्वम') पर ही भरोसा करना चाहिए 3. असली आत्मनिर्भरता: क्या भारत वाकई अपना 'सॉवरेन एआई' बना पाएगा या हम फिर से वही गलती करेंगे, जहां डेटा हमारा होगा। बाजार हमारा होगा, लेकिन कंट्रोल किसी विदेशी कंपनी का

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Feb 20, 2026, 17:29 IST
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