विश्व परिदृश्य: अमेरिका-विरोध की सीमाएं और ट्रंप के खिलाफ यूरोप में दिखावटी एकता की पड़ताल
शुक्र है कि किसी भी फ्रांसीसी अखबार ने डोनाल्ड ट्रंप के अत्याचार से एकजुट दुनिया की सोच को 9/11 की अपनी उस मशहूर पंक्ति आज हम सब अमेरिकी हैं को आज हम सब अमेरिका-विरोधी हैं जैसी कोई सुर्खी बनाकर पेश नहीं किया। इसके बजाय, ट्रंप की नीतियों से प्रभावित देशों में से एक, कनाडा के प्रधानमंत्री ने अपनी नैतिकता और वाकपटुता से ट्रंप-पीड़ित उदारवादी विश्व की भावनाओं को हवा दी। उन्होंने न सिर्फ खुद को शक्तिहीनों का प्रतिनिधि बताया, बल्कि वाक्लाव हवेल (चेक रिपब्लिक के पहले नेता) की शैली में असहमति की शक्ति का प्रदर्शन भी किया। हालांकि, इतने बड़े सिंहनाद तथा वेनेजुएला, ग्रीनलैंड व नाटो जैसे शब्दों के भू-राजनीतिक हिंसा का पर्याय बनने के बावजूद, ट्रंप के बेलगाम फैसलों के खिलाफ अब तक कोई ठोस वैश्विक दीवार खड़ी नहीं हो पाई है। बेशक, यूरोपीय राजधानियों में हमेशा की तरह हंगामे के स्वर सुनाई दिए हों, और हमने एकजुट होकर मुकाबला करने के नए इरादों के बारे में भी पढ़ा, पर नतीजा वही ढाक के तीन पात ही रहा। चाहे जो भी हो, ट्रंप के खिलाफ गुस्से ने दुनिया भर में अमेरिका-विरोध की अब तक की सबसे बड़ी लहर तो पैदा कर ही दी है, जिसे कई वैश्विक नेताओं का समर्थन भी मिलता दिख रहा है। भारत भी इस लहर से अछूता नहीं था। ओबामा दौर के बाद जब डोनाल्ड ट्रंप की धूम मची, तो भारतीय दक्षिणपंथी, यह देखकर खुश थे कि एक और बाहरी व्यक्ति बड़ी-बड़ी व्यवस्थाओं से भिड़ रहा है, और यह भारतीय खेमा ट्रंप के वैश्विक प्रशंसकों की कतार में सबसे आगे था। ट्रंप ने भी भारत के दोस्त की भूमिका बहुत अच्छे से निभाई। ह्यूस्टन में मोदी के साथ उनकी साझा उपस्थिति इसका उदाहरण बनी। कुछ समय के लिए ही सही, ट्रंप भारत के स्वाभाविक सहयोगी भी बने। राष्ट्रीय रूढ़िवाद की बड़ी कहानी में, ट्रंप को हंगरी के विक्टर ओर्बन के साथ एक बेहद प्रभावशाली पात्र के रूप में देखा जा सकता था और भारतीय दक्षिणपंथियों में 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' (मागा) के कई जोशीले समर्थक भी थे। ऐसा लग रहा था, मानो ट्रंप ने प्रतीकों की तलाश में जुटी एक विचारधारा में राष्ट्रीय हित का एक और पहलू जोड़ दिया हो। उस समय हम सभी ट्रंपिस्ट बन चुके थे, जहां अमेरिका-विरोध की कोई जगह नहीं थी। उस दौर में ऐसा होना ही सच्चा रूढ़िवाद माना जाता था। हालांकि, यह सब कुछ तब बदल गया, जब ट्रंप ने टैरिफ हमले के साथ अमेरिका के राष्ट्रीय हित को फिर से परिभाषित किया। इस टैरिफ युद्ध को जीतने के लिए ट्रंप दृढ़संकल्पित भी थे, क्योंकि वह जानते थे कि एक सौदेबाज कोई भी युद्ध ऐसी दुनिया में ही जीत पाएगा, जो अंतरराष्ट्रीयता से ज्यादा लेन-देन को महत्व देती है। देखते ही देखते, तथाकथित भारतीय दक्षिणपंथी भी अचानक ट्रंप डिरेंजमेंट सिंड्रोम (ट्रंप विरोधी भावना) के शिकार हो गए और उन्होंने कुछ समय के लिए दबी हुई अमेरिका-विरोधी भावना को बाहर निकाल दिया। क्या यह उस तथाकथित बुद्धिजीवी समुदाय के अस्थिर वैचारिक मूल का मामला था, जिसने अपने विश्वास को उस सरकार की नीतिगत मजबूरियों पर निर्भर बना दिया, जिसका समर्थन करने के लिए वे मजबूर थे या फिर ऐसा था कि अमेरिकावाद और अमेरिका-विरोधी भावना ऐसे आसान लेबल थे, जिन्हें सत्ता के बदलते मूड के साथ जोड़ा जा सकता था जैसे ही सरकार ने ट्रंप के साथ व्यापारिक समझौते पर मुहर लगाई, ऐसा लगा, मानो अमेरिका-विरोध का सुर फीका पड़ गया। अमेरिकी राष्ट्रपति को रातों-रात उन्हीं लोगों ने बुरा कहना बंद कर दिया, जो सोवियत युग के तीसरी दुनिया वाले पुराने ढर्रे को पुनर्जीवित करने की पुरजोर कोशिश कर रहे थे। ऐसा नहीं था कि ट्रंप का अमेरिका तीखी आलोचना की आग से पूरी तरह बच गया, बल्कि सच यह है कि राजनीतिक मौसम बदलने के साथ अमेरिकावाद का उपसर्ग भले बदल गया हो, पर कुछ चीजें वैसी की वैसी ही रहीं। इस बदलते राजनीतिक घटनाक्रम में एक धुरी जो अडिग रही, वह थी मोदी सरकार। अपने कुछ दक्षिणपंथी बड़बोले समर्थकों के उलट, इसने कभी भी न तो खुद को अमेरिका-विरोधी भावना का समर्थक दिखाया और न ही बताया, यहां तक कि ट्रंप के टैरिफ हमले के बाद भी नहीं। प्रधानमंत्री मोदी के भारत ने ट्रंप की दादागीरी का सामना अपने राष्ट्रीय सम्मान को बनाए रखते हुए किया, वह भी दुनिया के लिए अमेरिकी खतरे पर एकजुट हुई अंतरराष्ट्रीय आवाज में शामिल हुए बिना और अंतरराष्ट्रीय कानून पर घिसी-पिटी बातें किए बगैर। मोदी और ट्रंप ऐसे दो राष्ट्रवादी लोग हैं, जो अपनी-अपनी शैली में खेल रहे हैं। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय हित को लेकर ऐसा नजरिया अपनाया कि अंतरराष्ट्रीयतावाद के पारंपरिक अमेरिकी आदर्श अचानक पुराने लगने लगे। उनके लिए, अमेरिका की ताकत को पूरी तरह समझने के लिए उनके जैसे राष्ट्रपति की जरूरत थी, जो अमेरिका को सबसे पहले और सबसे आगे रखता हो। वहीं दूसरी ओर, भारतीय प्रधानमंत्री मोदी हैं, जो उदार लोकतंत्र में निस्संदेह सबसे लोकप्रिय माने जाते हैं, धैर्यवान राष्ट्रवादी हैं, जो इतिहास की लंबी दिशा को ध्यान में रखकर खेल खेलते हैं, न कि सुर्खियों के लिए। मोदी, अपने ज्यादातर समर्थकों से अधिक समझदार निकले, और उन्होंने ट्रंप के कट्टर अमेरिकावाद को अमेरिका-विरोधी भावना से मिलाने से साफ इन्कार कर दिया। यूरोप में दूसरी जगहों पर, अपनी सांस्कृतिक जड़ों के बावजूद, ऐसे नेता अमेरिका-विरोधी भावना को बनाए हुए हैं, जिनके पैरों तले जमीन तेजी से खिसक रही है। ट्रंप की अव्यवस्था के खिलाफ यूरोप में मेहनत से बनाई गई इस दिखावटी एकता का कोई व्यावहारिक मतलब नहीं है, क्योंकि यह राजनीतिक हताशा से उपजे अमेरिका-विरोध के सिवा और कुछ नहीं है। भले ही ताकत ट्रंप का पसंदीदा नीति बन गई हो, पर अमेरिका-विरोधी सोच के यूरोपीय समर्थकों ने कमजोरी को ही संस्थागत रूप दे दिया है। यूरोप की एकजुटता, भले ही वह ट्रंप को एक उत्प्रेरक के रूप में दरकिनार कर दे, फिर भी वास्तविक शक्ति में तब्दील नहीं हो पाती और यह बात सिर्फ सैन्य शक्ति तक सीमित नहीं है। क्या यूरोपीय संघ सबसे ज्यादा विनियमित देशों के संघ का एक अच्छा उदाहरण नहीं है आज इसका सामना एक ऐसे अमेरिका से है, जो परंपरा को तोड़कर, एक राजशाही अहंकार वाले राष्ट्रपति के अधीन आजादी को विनियमित करने का साहस कर रहा है। यह एक असमान मुकाबला है, जहां यूरोप ज्यादा से ज्यादा एक वैचारिक बहस तो जीत सकता है, पर जमीन पर उसका कोई खास असर होने वाला नहीं है। शायद हम पुराने असहमति वाले माहौल में वापस लौट आए हैं, चाहे पूरब हो या पश्चिम, अमेरिका-विरोध की बातें तो की ही जा रही हैं। एक ऐसी विचारधारा, जिसे नागरिक समाजों और सांस्कृतिक विकल्प ने खारिज कर दिया है, के पास जीतने के लिए सिर्फ ट्रंप जैसा ही कोई अस्थायी मुद्दा बचा है।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Feb 21, 2026, 05:51 IST
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