हरियाणा में बढ़े कंक्रीट के जंगल: पक्षियों का व्यवहार बदला, भोजन ढूंढ़ने में आ रही परेशानी; गुम हुआ कलरव

हरियाणा में बढ़ते शहरीकरण और तेज होते यातायात का असर अब पक्षियों पर भी साफ दिखाई देने लगा है। हालिया शोध में सामने आया है कि शोर-शराबे वाले इलाकों में पक्षियों की भोजन तलाशने की क्षमता घट रही है। वे पहले की तुलना में अधिक बेचैन हो गए हैं। शोर के कारण उन्हें भोजन खोजने में ज्यादा कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। इतना ही नहीं शोर की वजह से उनकी आवाज बढ़ गई है, मगर उनके आपसी संवाद की प्रभावशीलता कम हो रही है। शोधकर्ताओं का मानना है कि ध्वनि प्रदूषण पक्षियों के सामान्य व्यवहार और उनके अस्तित्व के लिए भी चुनौती बनता जा रहा है। ऐसे में शहरों में क्वाइट जोन विकसित करने, हरित क्षेत्रों को बढ़ाने और वेटलैंड्स के संरक्षण की आवश्यकता बढ़ गई है। यह अध्ययन राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय रोहतक के जंतु विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डा. मंजू छिकारा ने किया है। उनका यह अध्ययन इंटरनेशनल जर्नल ऑफ फौना एंड बायोलॉजिकल स्टडीज में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन के दौरान उन्होंने रोहतक, गुरुग्राम और झज्जर के विभिन्न क्षेत्रों को शामिल किया गया। अधिक शोर वाले स्थानों में रोहतक की दिल्ली रोड, झज्जर रोड और बाजार क्षेत्र व गुरुग्राम की एमजी रोड और बस स्टैंड शामिल थे। इसके विपरीत अपेक्षाकृत शांत क्षेत्रों में भिंडावास वेटलैंड, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय परिसर और अन्य पार्कों को शामिल किया गया है। अध्ययन के अनुसार शहरी क्षेत्रों में शोर का स्तर 79 से 83 डेसिबल तक था, जबकि पार्क और वेटलैंड्स में यह 38 से 44 डेसिबल तक रहा। अध्ययन में गौरैया, मैना, कबूतर, बुलबुल और कौए जैसी सामान्य पक्षियों का 4 से 8 सप्ताह तक सुबह छह से नौ बजे और शाम चार से सात बजे तक अवलोकन किया गया। अध्ययन के दौरान फोकल एनिमल सैंपलिंग विधि से पक्षियों के व्यवहार को रिकॉर्ड किया गया है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jun 06, 2026, 09:04 IST
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