बर्लिन से हेग तक... 31 अक्तूबर को अग्निपरीक्षा: यूरोप में दहशत का माहौल, फ्रांस से बेल्जियम तक एक जैसे मंजर

यूरोप में हैलोवीन की रात के लिए आतिशबाजी के डिब्बे खरीदे जा रहे हैं, पार्टियों की तैयारियां हो रही हैं, बाजार कद्दुओं और डरावने मुखौटों से सजे हैं। लेकिन जश्न की रात से पहले यूरोप सचमुच कांप रहा है, और उसे डर भूत प्रेत से नहीं, अपने ही नाराज युवाओं से है। फ्रांस के स्कूलों से उठी आग इटली, बेल्जियम और स्पेन तक पहुंच चुकी है और अब जर्मनी उसका इंतजार कर रहा है। बर्लिन की हम्बोल्ट यूनिवर्सिटी से एम्सटर्डम की नहरों और फिर हेग की अदालत तक, इस सफर के हर पड़ाव पर एक ही सवाल सुनाई दिया: खुशहाल यूरोप का युवा आखिर इतना बेचैन क्यों है इस लहर की शुरुआत फ्रांस से हुई। 21 सितंबर को पेरिस के पास क्रेतेई के एक स्कूल से घेराव का आंदोलन शुरू हुआ और एक हफ्ते में 410 स्कूलों तक फैल गया। उधर, इटली में छात्र मेलनी सरकार के खिलाफ नारा लगा रहे हैं कि पैसा स्कूलों को दो, हथियारों को नहीं। अब सबकी नजर जर्मनी पर है। बर्लिन में उबाल उंटर डेन लिंडेन पर हम्बोल्ट यूनिवर्सिटी की वह इमारत खड़ी है जहां कभी मार्क्स पढ़े और आइंस्टीन ने पढ़ाया। उसके आसपास के युवाओं से बात करने पर साफ लगता है कि फ्रांस की चिंगारी यहां तक पहुंच चुकी है। जेन जी उठ खड़ी हुई है और जेन जी रेगेल्ट दास यानी जेन जी इसे संभालेगी, नाम के अभियानों ने शनिवार 31 अक्तूबर को दोपहर 2 बजे से देशव्यापी प्रदर्शन की काॅल दी है। 21 शहरों में प्रदर्शन तय हैं। सोशल मीडिया पर नारे घूम रहे हैं कि प्रतिरोध का वक्त आ गया है और फ्रांस के युवाओं की तरह हड़ताल करो। अभियान चलाने वाले एक चैनल ने कहा है कि लोगों या संपत्ति के खिलाफ हिंसा उनके हर सिद्धांत के विरुद्ध है। गुस्से की सबसे गहरी जड़ सेना का सवाल है। रूस यूक्रेन युद्ध के बाद जर्मनी अपनी फौज बढ़ा रहा है। बुंडेस्टाग ने पिछले दिसंबर नया सैन्य सेवा कानून पास किया। सेवा अभी स्वैच्छिक है, लेकिन 2008 या उसके बाद पैदा हुए हर युवक को बुंडेसवेयर का प्रश्नपत्र भरना अनिवार्य है। युवाओं को यही आखिरी शर्त डरा रही है। एक सर्वे के मुताबिक 18 से 28 साल के सिर्फ 14 फीसदी युवा ही फौज में जाने को तैयार हैं। पुलिस के लिए 31 अक्तूबर दोहरी चुनौती है। पिछले साल हैलोवीन की रात युवाओं ने बैरिकेड जलाए और पुलिस पर पटाखे दागे थे, जिसके बाद बर्लिन में 132 लोग गिरफ्तार हुए। इस बार उसी रात सड़कों पर प्रदर्शनकारी भी होंगे। बर्लिन पुलिस के प्रवक्ता फ्लोरियान नाथ ने कहा है कि पुलिस परखेगी कि ये असली छात्र प्रदर्शन हैं या कोई हैलोवीन की आड़ में अपना एजेंडा चला रहा है। एम्सटर्डम : नहरों के शहर में गाजा की गूंज जर्मनी की सीमा पार कर नीदरलैंड पहुंचते ही मुद्दा बदल गया, लेकिन बेचैनी वैसी ही रही। यहां हर तरफ फलस्तीन का सवाल था। एम्सटर्डम के ओल्ड टाउन में एक फलस्तीनी व्यक्ति गाजा बचाओ की तख्ती लेकर बैठा मिला। वह नारे नहीं लगाता, बस बैठा रहता है। सैलानी रुकते हैं, कुछ तस्वीर खींचते हैं, कुछ नजरें फेरकर निकल जाते हैं। यह अकेला विरोध उस बड़ी तस्वीर का हिस्सा है जो यह शहर पिछले एक साल से देख रहा है। पिछले साल अक्तूबर में करीब 2.5 लाख लोग लाल कपड़े पहनकर एम्सटर्डम की सड़कों पर उतरे थे और मांग की थी कि डच सरकार इस्राइल पर सख्त रुख अपनाए। नफरत भरी टिप्पणियांयहूदियों पर उतारा इस्राइल का गुस्सा गुस्से का एक स्याह पहलू यह भी दिखा कि ओल्ड टाउन की एक गली में कुछ युवक एक यहूदी लड़के पर हिकारत भरी टिप्पणियां कर रहे थे। लड़का चुपचाप आगे बढ़ गया। यह बताता है कि इस्राइल सरकार की नीतियों के खिलाफ गुस्सा आम यहूदी पर उतर रहा है। यही यूरोप की उलझन है। गाजा के लिए इंसाफ मांगने वाली आवाजें और यहूदियों पर बढ़ते हमले, दोनों एक ही शहर की सड़कों पर साथ साथ दिख रहे हैं। हेग : इंसाफ के शहर में इंतजार एम्सटर्डम से होते हुए सफर हेग पहुंचा। इसी शहर में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय बैठता है और यहीं गाजा का सबसे बड़ा कानूनी सवाल लंबित है। दक्षिण अफ्रीका ने दिसंबर 2023 में यहां इस्राइल के खिलाफ नरसंहार का मामला दायर किया था। इस्राइल ने इस साल मार्च में अपना जवाब दाखिल किया और अदालत के अधिकार क्षेत्र पर ही आपत्ति उठा दी। अदालत की तय समय सारणी के मुताबिक दक्षिण अफ्रीका को 22 नवंबर 2027 तक और इस्राइल को 22 मई 2029 तक अपना पक्ष रखना है। फैसला अभी कई साल दूर है। तब तक 2024 के अंतरिम आदेश लागू हैं, जिनमें अदालत ने नरसंहार जैसी कार्रवाई रोकने और राहत सामग्री पहुंचने देने को कहा था। इस्राइल नरसंहार के आरोप को सिरे से खारिज करता है और कहता है कि उसकी कार्रवाई हमास के खिलाफ है, फलस्तीनी नागरिकों के खिलाफ नहीं। सड़क और अदालत के बीच की यह दूरी यूरोप के युवाओं की खीझ समझाती है। भारत में भी नाराजगी लेकिन तस्वीर अलग पूरे सफर में एक बात बार-बार मन में आती रही। भारत में भी युवा नाराज हैं। अग्निपथ योजना पर 2022 का गुस्सा, परीक्षाओं में पेपर लीक और नौकरी की अनिश्चितता इसके उदाहरण हैं। लेकिन मेरे अनुभव में वहां यह असंतोष छात्रों के एक छोटे हिस्से तक दिखता है और अक्सर किसी खास मुद्दे पर उठकर थम जाता है। यूरोप में तस्वीर अलग है। यहां बेचैनी कई परतों में है-युद्ध का साया, फौज में भर्ती का डर, महंगाई, जर्जर स्कूल और दूर के युद्ध से उपजा ध्रुवीकरण जो सड़कों पर साफ नजर आता है। फ्रांस में सरकार इसे दंगा कहती है, जबकि छात्र अपनी बात सुनाने का आखिरी रास्ता। मामला सिर्फ कानून व्यवस्था का नहीं, भरोसा टूटने का भी है। बर्लिन की यूनिवर्सिटी से हेग की अदालत तक संदेश एक ही है-यूरोप की चमक के नीचे एक पीढ़ी अपने भविष्य को लेकर डरी हुई है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Oct 26, 2026, 03:01 IST
पूरी ख़बर पढ़ें »

Read More:
World International



बर्लिन से हेग तक... 31 अक्तूबर को अग्निपरीक्षा: यूरोप में दहशत का माहौल, फ्रांस से बेल्जियम तक एक जैसे मंजर #World #International #SubahSamachar