ग्राउंड जीरो: पंजाब में पाकिस्तान सीमा पर खेती भी जंग, चुनौतियों से जूझ रहे किसान; काम को मिलते हैं चंद घंटे

भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे पंजाब के किसानों के लिए अपनी ही जमीन पर खेती करना बड़ी चुनौती बन गया है। सीमा पर लगी कंटीली तारबंदी के पार स्थित खेतों तक पहुंचने के लिए किसानों को रोजाना सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ता है। बीएसएफ की निगरानी में निर्धारित समय के दौरान ही खेतों में काम करने की अनुमति मिलती है। सुबह पहचान पत्रों की जांच और कृषि उपकरणों की तलाशी में समय निकल जाता है, जबकि शाम को गेट बंद होने से पहले लौटना जरूरी होता है। ऐसे में किसानों को दिन में मुश्किल से 5-6 घंटे ही खेती के लिए मिल पाते हैं। पंजाब के छह सीमावर्ती जिलों में करीब 21,500 एकड़ कृषि भूमि तारबंदी और अंतरराष्ट्रीय सीमा के बीच स्थित है। करीब 220 गांवों के किसानों की खेती इस जमीन पर निर्भर है। सीमित समय के अलावा फसल चयन, सिंचाई, मजदूरों की उपलब्धता और जंगली जानवरों से फसल बचाने की समस्याएं भी उनकी मुश्किलें बढ़ा रही हैं। सीमावर्ती केंद्रों से सामने आई तस्वीर बताती हंै कि खेती करना किसानों के लिए कठिन हो रहा है। रात में सिंचाई करना हो जाता है मुश्किल कई बार बिजली की उपलब्धता रात में होती है या ट्यूबवेल चलाने के लिए अधिक समय चाहिए होता है। लेकिन रात में आवाजाही की अनुमति नहीं होने से किसान सिंचाई नहीं कर पाते। दिन में पानी नहीं लगा तो अगली उपलब्धता का इंतजार करना पड़ता है। अमृतसर : मजदूरों से मशीनरी तक हर कृषि कार्य पर समय की बंदिश सीमावर्ती खेतों में गर्मियों में आमतौर पर सुबह 9 से शाम 5 बजे तक और सर्दियों में सुबह 10 से शाम 4 बजे तक काम करने का समय निर्धारित रहता है। हालांकि, अलग-अलग बीएसएफ बटालियन और क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुसार इसमें बदलाव हो सकता है। गेट पर पहचान पत्र दिखाने, सुरक्षा जांच और उपकरणों की तलाशी के बाद ही खेतों में जाने दिया जाता है। वापसी पर भी जांच होती है। कई बार सुबह की औपचारिकताओं में एक-दो घंटे निकल जाते हैं। तीन फीट से ऊंची फसलों पर आपत्ति कुछ क्षेत्रों में सुरक्षा एजेंसियां दृश्यता बनाए रखने के उद्देश्य से तीन फीट से अधिक ऊंचाई वाली फसलें उगाने पर आपत्ति करती रही हैं। इससे गन्ना, मक्का, ज्वार, बाजरा और सूरजमुखी की बिजाई प्रभावित होती है। पठानकोट : अपनी जमीन पर मनचाही फसल भी नहीं उगा पा रहे किसान पठानकोट जिले के सीमावर्ती किसानों के लिए तारबंदी पार खेती करना मुश्किल होता जा रहा है। सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि होने के बावजूद वे अपनी मर्जी से फसल नहीं उगा पा रहे। किसान रविंद्र सिंह के मुताबिक, गन्ना, मक्का, ज्वार, बाजरा और सूरजमुखी जैसी लंबी ऊंचाई वाली फसलों की बिजाई को लेकर सुरक्षा एजेंसियों की आपत्तियों के कारण खेती के विकल्प सीमित हो गए हैं। ऐसे में गेहूं, धान और कम ऊंचाई वाली सब्जियों पर निर्भरता बढ़ रही है। इससे फसल विविधीकरण प्रभावित होने के साथ प्रति एकड़ आमदनी पर भी असर पड़ता है। फिरोजपुर : फसलें उजड़ने के डर से बंद की बिजाई, खेत बने जंगल हुसैनीवाला बॉर्डर के आसपास तारबंदी पार कई इलाकों में जंगली सूअर और नीलगाय किसानों की फसलें तबाह कर रहे हैं। लगातार नुकसान के कारण कुछ किसानों ने धान, गेहूं और सब्जियों की बिजाई तक बंद कर दी है। कभी लहलहाती फसलों से भरी रहने वाली जमीन पर अब सरकंडों का जंगल उग आया है। किसान बलवीर सिंह ने बताया कि पाकिस्तान के गांव भिखी पिंड के आसपास उनकी जमीन है। देसी बम के इस्तेमाल पर पाबंदी किसानों के मुताबिक, पहले कुछ लोग जंगली जानवरों को मारने के लिए पोटाश और आटे से बने देसी बम खेतों में रखते थे। अब इन पर पाबंदी है, जिससे दिक्कतें बढ़ी हैं।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Nov 02, 2026, 04:47 IST
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