बंद दरवाजे के पीछे का भयावह सच: महिलाओं को अपनी सुरक्षा से पहले सब्र करना सिखाया जाता है

वे उन महिलाओं जैसी दिख रही थीं, जिनके होने पर भारत गर्व कर सकता है। पढ़ी-लिखी। शहरी। अंग्रेजी बोलने वाली। मध्यमवर्गीय। उनमें से एक ने फिल्मों में काम किया था और एमबीए कर रही थी। दूसरी ग्रेटर नोएडा के उस आकांक्षी इलाके से थी, जहां गेटेड सोसाइटी, कोचिंग सेंटर और आगे बढ़ने के अवसर ही सब कुछ हैं। ये ऐसी महिलाएं नहीं थीं, जो गांवों से हों या जिन्हें शिक्षा से वंचित रखा गया हो। वे रील्स, डेस्टिनेशन वेडिंग्स और स्टार्टअप की महत्वाकांक्षा वाले भारत से ताल्लुक रखती थीं। फिर भी, दोनों की मौत हो गई। भोपाल में, 31 वर्षीय ट्विशा शर्मा अपनी शादी के कुछ ही महीनों बाद ससुराल में मृत पाई गईं। उनके परिवार ने दहेज उत्पीड़न और मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगाया। इस मामले ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा, क्योंकि ट्विशा आधुनिक भारतीय नारी की छवि का प्रतिनिधित्व करती थीं-पढ़ी-लिखी, मुखर और आत्मनिर्भर। उन्होंने फिल्मों में काम किया था, ऑनलाइन कंटेंट बनाया था और कथित तौर पर अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती थीं। जांचकर्ता अब सीसीटीवी फुटेज, व्हाट्सएप संदेशों और ससुराल में लगातार की गई क्रूरता के आरोपों की जांच कर रहे हैं। लगभग उसी समय ग्रेटर नोएडा से एक और खबर आई। 24 साल की दीपिका नागर की शादी के महज 18 महीने बाद ही, कथित तौर पर अपने ससुराल की छत से गिरने से मौत हो गई। उसके मायके वालों का कहना है कि उसे दहेज की मांगों को लेकर परेशान किया जाता था। उसे पीटा गया और फिर छत से नीचे फेंक दिया गया, ताकि उसकी मौत एक हादसा लगे। अलग-अलग शहर। अलग-अलग परिवार। पर कहानी एक जैसी। शहरी भारत दहेज को लेकर इस तरह बात करता है, मानो यह किसी दूसरी सदी की बात हो और यह ऐसी सामाजिक बुराई है, जो केवल गांवों और अशिक्षित परिवारों तक ही सीमित है। पर, सच्चाई यह है कि ये शहरी परिवेश में भी उतने ही आम हैं। शिक्षा या आर्थिक प्रगति के बावजूद दहेज प्रथा खत्म नहीं हुई, बल्कि इसने अपना रूप आधुनिक बना लिया है। आजकल, मोल-भाव शायद ही भद्दा दिखता है। यह उम्मीदों, तोहफों, सहयोग या घर बसाने जैसे शब्दों के पीछे छिपा रहता है। हालांकि, लेन-देन वही रहता है। दूल्हे की एक बाजार कीमत तय हो जाती है। शादी ऐसी प्रतिष्ठा का सौदा बन जाती है, जो परंपरा के भेष में छिपी होती है। और महिलाएं शिक्षित होने एवं नौकरी करने के बावजूद, विवाह के जरिये दूसरे परिवार में शर्तों पर आधारित सदस्य के रूप में प्रवेश करती हैं। यही वह असहज करने वाला सच है, जिसका सामना करने से शहरी भारत अब भी इन्कार करता है। वास्तविकता यह है कि भारत में सशक्तीकरण अक्सर दिखावटी होता है। एक महिला भले ही किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करती हो, विदेश जाती हो और आत्मविश्वास से बोलती हो, फिर भी शादी के बंधन में वह अंदर से बेहद कमजोर बनी रहती है। परिवार आज भी बेटियों की परवरिश इस डर के साथ करते हैं कि शादी टूटना एक निजी विफलता है। माता-पिता आज भी दबी जुबान में कहते हैं, थोड़ा और समझौता कर लो। महिलाओं को अपनी सुरक्षा से पहले सब्र करना सिखाया जाता है। ट्विशा शर्मा मामले में जो बात विशेष रूप से विचलित करने वाली है, वह केवल दहेज उत्पीड़न का आरोप नहीं है, बल्कि उस व्यक्ति की छवि है, जो कथित तौर पर उस घर का केंद्र था। कोई अशिक्षित पितृसत्तात्मक व्यक्ति नहीं। एक पढ़ी-लिखी महिला-एक पूर्व न्यायाधीश। एक सास, जो ट्विशा की मौत के बाद दिए टीवी इंटरव्यू में, अपनी मृत बहू के बारे में बात करते हुए बेहद भावहीन नजर आई। यह बात उस मिथक को तोड़ देती है कि महिलाएं दूसरी महिलाओं को सशक्त बनाती हैं। वे अक्सर ऐसा नहीं करतीं। कई भारतीय घरों में, औरतें उसी भेदभावपूर्ण व्यवस्था की रखवाली करने वाली बन जाती हैं, जिसने कभी खुद उन्हें ही दबाया था। सास की भूमिका एक ऐसी संस्थागत पहचान का रूप ले सकती है, जिसकी जड़ें सत्ता, नियंत्रण और बेटे के घर-परिवार को बनाए रखने में गहरी जमी होती हैं। खुद के भोगे हुए कष्टों से, जरूरी नहीं कि हमेशा दूसरों के प्रति सहानुभूति ही पैदा हो। कभी-कभी तो यह उसी चक्र को फिर से दोहरा देती है। एक तरफ ट्विशा के शोकाकुल माता-पिता अपनी बेबसी और मानसिक पीड़ा बयां कर रहे थे, तो दूसरी तरफ उनकी सास (जो न्यायपालिका की पूर्व सदस्य थीं) इतनी शांत और संयमित नजर आ रही थीं कि उनका रवैया बिल्कुल ही बेरुखा लग रहा था। वे कानूनी तौर पर दोषी हैं या नहीं, यह तय करना अदालतों का काम है, लेकिन सामाजिक तौर पर, यह नजारा लोगों को खटका, क्योंकि भारत दकियानूसी पुरुषों से तो क्रूरता की उम्मीद करता है; मगर जब वह कामयाब महिलाओं में भावनात्मक कठोरता देखता है, तो विचलित हो जाता है। और शायद यह बेचैनी एक गहरी सच्चाई को उजागर करती है कि पितृसत्ता को केवल पुरुषों से ही बल नहीं मिलता। यह अक्सर उन महिलाओं के जरिये कायम रहती है, जो इसके नियमों को अपने भीतर उतार लेती हैं और उन्हें लागू करती हैं। जिन महिलाओं ने खुद मुश्किल शादियां झेली हैं, वे कभी-कभी पुल बनाने वाली बनने के बजाय पहरेदार बन जाती हैं। यही एक वजह है कि दहेज और घरेलू हिंसा पढ़े-लिखे घरों में भी कायम है। यह हिंसा हमेशा शारीरिक नहीं होती। कभी-कभी यह भावनात्मक, प्रशासनिक या मनोवैज्ञानिक होती है-हजारों छोटी-छोटी अपमानजनक बातें, जो संभ्रांत परिवारों के भीतर ही होती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े बताते हैं कि भारत में आज भी हर साल दहेज से जुड़ी लगभग 7,000 मौतें दर्ज की जाती हैं, यानी, हर दिन करीब 20 महिलाओं की मौत। ये वे ढांचागत विफलताएं हैं, जो बंद दरवाजों के पीछे छिपी हुई हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि शहरी क्षेत्र भी इससे अछूते नहीं हैं। भारत के सबसे महत्वाकांक्षी शहर लगातार ऐसे विवाहों को जन्म दे रहे हैं, जिनमें महिलाओं को सौदे की वस्तु के रूप में देखा जाता है। और इन सबके पीछे एक डरावनी सोच छिपी है कि अगर एक बहू फेल हो जाए, तो दूसरी मिल सकती है। ट्विशा शर्मा और दीपिका को आधुनिक भारत की सफलता की कहानी का प्रतिनिधित्व करना चाहिए था, लेकिन इसके बजाय, वे इसके पाखंड का प्रतीक बन गई हैं। दुखद केवल यह नहीं है कि इनकी मृत्यु हो गई। दुखद यह है कि आज भी, देश में बहुत-सी महिलाएं यह जानते हुए शादी के बंधन में बंधती हैं कि प्रेम एक वैकल्पिक चीज है, गरिमा से समझौता किया जा सकता है और सुरक्षा अनिश्चित है। edit@amarujala.com

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: May 21, 2026, 06:09 IST
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