डिजिटल भारत और लूट: आर्थिक सुरक्षा पर गहरे सवाल, वित्तीय प्रणाली में तत्काल सुधार की आवश्यकता
सर्वोच्च न्यायालय ने डिजिटल धोखाधड़ी के माध्यम से की गई 54 हजार करोड़ रुपये से अधिक की हेराफेरी को सरासर लूट बताकर देश में साइबर सुरक्षा की भयावह स्थिति को ही सामने रखा है। शीर्ष अदालत ने जनता के धन के संरक्षक के रूप में अपनी जिम्मेदारी भूलने के लिए उचित ही बैंकों को कड़ी फटकार लगाई है, क्योंकि उनकी सिर्फ औपचारिकताएं निभाकर पल्ला झाड़ लेने की प्रवृत्ति से भरोसे की नींव कमजोर होती है। डिजिटल युग में जहां एक क्लिक से करोड़ों रुपये का लेन-देन हो जाता है, वहीं धोखाधड़ी के मामले भी उसी रफ्तार से बढ़ रहे हैं। देश के 86 फीसदी से अधिक परिवारों का इंटरनेट से जुड़ना डिजिटल इंडिया पहल के तहत हुई उल्लेखनीय प्रगति को दिखाता है, लेकिन डिजिटल हेराफेरी का परिमाण, जैसा शीर्ष अदालत ने भी कहा है, कई छोटे राज्यों के बजट से भी अधिक हो जाना वाकई एक बड़ी चुनौती है। समस्या यह है कि यह धोखाधड़ी कई रूपों में सामने आ रही है, जो अक्सर लोगों के व्यवहारों के अनुरूप बदलती रहती है। यही नहीं, कई मामलों में साइबर अपराधियों की वैश्विक पहुंच और संगठित गिरोह की संलिप्तता भी उजागर होती है। यह स्थिति देश की आर्थिक सुरक्षा पर गहरे सवाल तो खड़े करती ही है, वित्तीय प्रणाली में सुधार की तत्काल आवश्यकता को भी रेखांकित करती है। अक्सर देखा गया है कि धोखाधड़ी का शिकार बैंक, टेलीकॉम ऑपरेटर और पुलिस के चक्कर काटता रहता है और इस बिखरी हुई जवाबदेही का सीधा फायदा अपराधियों को मिलता है। ऐसे में, शीर्ष अदालत का केंद्र सरकार को दिया गया निर्देश कि वह केंद्रीय बैंक, बैंकों और दूरसंचार विभाग के साथ मिलकर एक मानक संचालन प्रक्रिया बनाए, इस बिखराव को खत्म करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। डिजिटल धोखाधड़ी की समस्या का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि इसका एक बड़ा शिकार ग्रामीण और बुजुर्ग आबादी बनती है, जो तकनीक को पूरी तरह से समझे बगैर ही उस पर भरोसा करती है। इसमें आर्थिक नुकसान तो होता ही है, कई बार पीड़ित अवसाद में चले जाते हैं, खासकर जब वे अपनी सारी बचत खो देते हैं। सरकार और बैंकों द्वारा चलाए जा रहे डिजिटल साक्षरता के विज्ञापनों और पोस्टरों से आगे बढ़कर जमीनी स्तर पर प्रशिक्षण और चेतावनी संदेशों की जरूरत है। बेहतर हो कि स्कूलों में साइबर सुरक्षा पाठ्यक्रम का हिस्सा भी बने, ताकि कम उम्र से ही बच्चों में समझ विकसित हो सके। शीर्ष अदालत ने जो आईना दिखाया है, वह त्वरित, समन्वित और सख्त कार्रवाई की मांग करता है, क्योंकि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो यह नागरिकों का भरोसा टूटने जैसी बात होगी, जो पूरी डिजिटल क्रांति के लिए झटका होगा।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Feb 11, 2026, 07:45 IST
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