एक नए दौर की शुरुआत: स्वदेशी आसमानी निगरानी क्षमता से आत्मनिर्भरता की ओर, विशेषज्ञता भी बढ़ी
हाल ही में, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने भारतीय वायुसेना को स्वदेशी नेत्र एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (एईडब्ल्यू एंड सी) प्रणाली का फाइनल ऑपरेशनल क्लीयरेंस (एफओसी) सौंप दिया। यह भारत के सबसे लंबे और कठिनतम एयरोस्पेस कार्यक्रमों में से एक की अंतिम परिणति है। नेत्र प्रणाली ने सभी विकासात्मक, उपयोगी और परिचालन संबंधी परीक्षण पूरे कर लिए हैं और अब वह युद्धक अभियानों के लिए पूरी तरह तैयार है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, आधुनिक हवाई युद्ध अब सबसे तेज लड़ाकू विमान रखने भर की बात नहीं रही। जीत इस पर निर्भर करती है कि दुश्मन को पहले कौन देखता है। एईडब्ल्यू एंड सी विमान असल में एक उड़ता हुआ रडार स्टेशन है। यह युद्धक्षेत्र के ऊपर ऊंचाई पर मंडराते हुए विशाल हवाई क्षेत्र को स्कैन करता है, दुश्मन के विमानों, क्रूज मिसाइलों और ड्रोनों को जमीनी रडार से तेजी से पकड़ सकता है और यह जानकारी तुरंत लड़ाकू विमानों तथा कमान केंद्रों तक पहुंचा देता है। इसके विपरीत, किसी पहाड़ या जमीनी स्टेशन पर लगा रडार पृथ्वी की वक्रता से बंधा होता है, जबकि तीस हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ता यह विमान रडार की पहुंच को कई सौ किलोमीटर आगे बढ़ा देता है। निगरानी के अलावा, यह विमान कई लड़ाकू दस्तों के बीच तालमेल बिठाने, लक्ष्यों को प्राथमिकता देने, अंतर्रोधी मिशनों का मार्गदर्शन करने और जटिल अभियानों के दौरान एक उड़ता हुआ कमान केंद्र बनने जैसे युद्ध-प्रबंधन का काम भी करता है। 1999 के कारगिल संघर्ष ने भारत की निगरानी क्षमता की सीमाओं को उजागर किया था। इस लड़ाई के दौरान सैन्य रणनीतिकारों को अच्छी तरह समझ में आ गया था कि तकनीकी रूप से सक्षम दुश्मन के साथ आगामी लड़ाइयों में निरंतर हवाई निगरानी और एकीकृत कमान नियंत्रण बहुत जरूरी है। भारत को अपना स्वदेशी हल चाहिए था। यह रडार एक साथ कई हवाई लक्ष्यों का पता लगा सकता है और उन्हें ट्रैक कर सकता है। साथ ही, मित्र और शत्रु विमानों में फर्क भी कर सकता है। उन्नत ऑनबोर्ड कंप्यूटर कई सेंसरों से मिली जानकारी को मिलाकर मिशन ऑपरेटरों के सामने एक संपूर्ण सामरिक तस्वीर पेश करते हैं। यह तस्वीर फिर सुरक्षित रूप से जमीनी स्टेशनों और लड़ाकू विमानों तक भेजी जाती है। इससे सैन्य अभियानों के दौरान स्थितिजन्य जागरूकता काफी बेहतर हो जाती है। अंतिम परिचालन मंजूरी (एफओसी) मिलने से पूर्व ही भारतीय वायुसेना कई वर्षों से तीन नेत्र विमानों को उड़ा रही थी। रक्षा अधिकारियों के अनुसार, 2019 के बालाकोट अभियान के दौरान नेत्र विमानों ने हवाई निगरानी बनाए रखने और कमान-नियंत्रण कार्यों में सहायता देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। रक्षा अधिग्रहण में एफओसी महज एक रस्मी पड़ाव नहीं है, बल्कि यह प्रमाणित करता है कि प्लेटफॉर्म ने विकासात्मक परीक्षण, उपयोगकर्ता मूल्यांकन, भरोसेमंद जांच और परिचालन परीक्षण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है और यह वास्तविक परिचालन परिस्थितियों में लगातार बेहतर प्रदर्शन कर सकता है। वायुसेना के लिए इसका मतलब है कि अब नेत्र को बेझिझक कहीं भी तैनात कर युद्धकालीन योजना में पूरी तरह शामिल किया जा सकता है। यह उन स्वदेशी तकनीकों की परिपक्वता पर भरोसे को भी दर्शाता है, जिन पर मुट्ठी भर देशों ने ही महारत हासिल की है। यह गर्व की बात है कि अब भारत भी उनमें से एक है। हालांकि, कई तकनीकी विवरण अब भी गोपनीय हैं, लेकिन यह निर्विवाद है कि नेत्र कई सौ किलोमीटर के दायरे में एक साथ कई हवाई लक्ष्यों का पता लगाकर उन्हें ट्रैक कर सकता है। यह निगरानी, पहचान, इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस और युद्ध-प्रबंधन के साथ मिलकर काम करता है। इस पर सवार मिशन ऑपरेटर लड़ाकू विमानों के साथ तालमेल बिठा सकते हैं, दुश्मन की हवाई गतिविधि पर नजर रख सकते हैं, लक्ष्य तय कर सकते हैं और कमांडरों को वास्तविक समय में सामरिक जानकारी भेज सकते हैं। जमीनी रडार के विपरीत यह आसमानी प्लेटफॉर्म उन कम ऊंचाई पर उड़ने वाले विमानों को भी पकड़ सकता है, जो जमीनी आकृतियों के पीछे छिपकर पकड़ में आने से बचने की कोशिश करते हैं। इसकी गतिशीलता इसे अलग-अलग जरूरतों के अनुसार अलग-अलग क्षेत्रों में तेजी से तैनात करने की सुविधा भी देती है। नेत्र मार्क-1 का प्रमाणीकरण एक बड़ी उपलब्धि है। सरकार ने नेत्र मार्क-2 के विकास को मंजूरी दे दी है, जो एयरबस ए-321 विमान पर आधारित एक बड़ा एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम (एवैक्स) होगा। इससे लगभग 360 डिग्री रडार कवरेज मिलने की उम्मीद है, जबकि मौजूदा नेत्र सीमित दिशाओं में ही कवरेज देता है। ऐसे छह विमानों के विकास को मंजूरी दी गई है, जिससे भारत की आसमानी निगरानी क्षमता काफी मजबूत होगी। आज भारत के सामने दो परमाणु-संपन्न पड़ोसी हैं, जिनकी वायुसेनाएं तेजी से आधुनिक हो रही हैं। चीन के पास कई स्वदेशी केजे-श्रेणी के आसमानी चेतावनी विमान हैं, जबकि पाकिस्तान स्वीडिश साब एरीआई और चीनी जेडडीके-03 प्रणालियां इस्तेमाल करता है। इसके मद्देनजर स्वदेशी आसमानी निगरानी क्षमता रणनीतिक रूप से जरूरी है। इतनी संवेदनशील प्रणालियों के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर होना परिचालन, आर्थिक और भू-राजनीतिक जोखिम का कारण है। इस निर्भरता को कम करने के साथ ही नेत्र ने रडार इंजीनियरिंग, मिशन प्रणालियों और आसमानी इलेक्ट्रॉनिक्स में भारत की विशेषज्ञता भी बढ़ाई है। नेत्र का प्रमाणीकरण भारत की हवाई निगरानी क्षमता में एक नए युग की शुरुआत है। जैसे-जैसे नेत्र मार्क-2 परियोजना आगे बढ़ेगी और स्वदेशी रडार तकनीक अधिक परिपक्व होगी, भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो जाएगा, जो बिना बाहरी निर्भरता के उन्नत हवाई चेतावनी प्रणालियों का डिजाइन, विकास और संचालन करने में सक्षम हैं। आधुनिक युद्ध में सूचना अक्सर आग्नेय शक्ति से भी अधिक निर्णायक होती है। जो पक्ष युद्धक्षेत्र को पहले देखता, समझता और ट्रैक करता है, वही लड़ाई की दिशा तय करता है। नेत्र के अब पूरी तरह परिचालन में आने के साथ ही भारत ने अपनी हवाई निगरानी और सूचना-तंत्र को और मजबूत कर लिया है। दशकों के धैर्य के बाद देश की स्वदेशी आसमानी आंख अंततः परिपक्व हो गई है। -edit@amarujala.com
- Source: www.amarujala.com
- Published: Jul 01, 2026, 06:08 IST
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