World Weather Day: मौसम के बदलाव से कश्मीर में सिकुड़ रहे ग्लेशियर, खेती, पानी व पनबिजली पर असर

मौसम में आ रहे बदलावों का असर कश्मीर के ग्लेशियरों पर भी पड़ा है। वे सिकुड़ रहे हैं। झेलम बेसिन ग्लेशियरों पर लंबे समय तक चला अध्ययन बताता है कि इसका असर कश्मीर में खेतीबाड़ी, पानी की सप्लाई, पनबिजली आदि सभी क्षेत्रों पर देखने को मिल सकता है। पीर पंजाल क्षेत्र के भी इससे प्रभावित होने की आशंका है। कश्मीर में पानी का स्रोत ग्लेशियर ही हैं। जलवायु परिवर्तन की वजह से ये लगातार पिघल रहे हैं। इसकी वजह से इनसे मिलने वाले पानी में कमी आई है। मल्टी-टेम्पोरल सैटेलाइट डेटा, फील्ड सर्वे और जियोस्पेशियल विश्लेषण से कोलाहोई, शेषराम, चिरसर -1 और 2, प्राणमार्ग और होकसर जैसे प्रमुख ग्लेशियरों के सिकुड़ने की बात साबित हुई है। इनके पीछे हटने की दर 6-20 मीटर प्रति वर्ष आंकी गई है। इनके क्षेत्रफल में भी उल्लेखनीय कमी आई है। वैज्ञानिकों ने ग्लेशियरों का वर्ष 1971 से 2024 तक विश्लेषण किया है जिससे पता चला कि ग्लेशियरों की लंबाई और सतह के क्षेत्रफल में भी लगातार कमी आई है जो जलवायु परिवर्तन के प्रति प्रतिक्रिया का परिणाम है। भू-विज्ञानी जाहिद मजीद शाह के अनुसार झेलम बेसिन का सबसे बड़ा ग्लेशियर कोलाहोई सबसे ज्यादा पीछे हटा है। करीब 50 वर्ष में यह 784 मीटर सिकुड़ा है। इसके अतिरिक्त पूर्वी लिद्दर में स्थित शेषराम ग्लेशियर 1979 से 2023 तक 627 मीटर पीछे हटा है। लंबाई में हुई इस कमी के साथ-साथ ग्लेशियरों के सतह क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कमी आई है। यह रिसर्च बीते सितंबर में ग्लेशियर रिट्रीट, मैपिंग एंड लैंडफॉर्म इवॉल्यूशन इन झेलम बेसिन, कश्मीर नाम से प्रतिष्ठित रिसर्च गेट जर्नल में प्रकाशित हुई है। इनमें शाह के साथ ही राकेश मिश्र, मुनीर मुख्तार, रम्या नंबूदरी शामिल रहे हैं। ये ग्लेशियर पीछे हटे

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Mar 23, 2026, 15:37 IST
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