अटलांटिक के कोल्ड ब्लॉब का भारत पर असर: उत्तर-पश्चिम में बढ़ेगी बारिश, मैदानी इलाकों में सूखे का खतरा
भारतीय मानसून में पिछले दो दशकों से दिखाई दे रहे बदलावों के पीछे केवल स्थानीय या क्षेत्रीय कारण ही जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि हजारों किलोमीटर दूर उत्तरी अटलांटिक महासागर में मौजूद ठंडे पानी का एक विशाल क्षेत्र भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। नए वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, ग्रीनलैंड के दक्षिण में स्थित यह ठंडा समुद्री क्षेत्र, जिसे वैज्ञानिक कोल्ड ब्लॉब कहते हैं, वायुमंडलीय परिसंचरण और जेट स्ट्रीम को प्रभावित कर भारतीय मानसून की दिशा तथा वर्षा के वितरण में बदलाव ला रहा है। इसके प्रभाव से उत्तर-पश्चिम भारत में वर्षा बढ़ने की प्रवृत्ति देखी जा रही है, जबकि गंगा के मैदानी इलाकों सहित कुछ अन्य क्षेत्रों में वर्षा घटने और सूखे का जोखिम बढ़ सकता है। यह अध्ययन वैज्ञानिक पत्रिका एजीयू एडवांसेज में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं के अनुसार पिछले लगभग 25 वर्षों में भारतीय मानसून के स्वरूप में उल्लेखनीय परिवर्तन दर्ज किए गए हैं। उत्तर-पश्चिम भारत के कई हिस्सों में सामान्य से अधिक वर्षा होने लगी है, जबकि कुछ पारंपरिक वर्षा-समृद्ध क्षेत्रों में बारिश कम होने के संकेत मिले हैं। शोध में कहा गया है कि इसकी एक बड़ी वजह यह हो सकती है कि मौजूदा मॉडल उत्तरी अटलांटिक महासागर के तापमान में हो रहे परिवर्तनों और उनके दूरस्थ क्षेत्रों पर पड़ने वाले प्रभावों को पर्याप्त सटीकता से शामिल नहीं कर पाते। कोल्ड ब्लॉब उत्तरी अटलांटिक महासागर में ग्रीनलैंड के दक्षिण स्थित अपेक्षाकृत ठंडे पानी का एक बड़ा क्षेत्र है। पिछले वर्षों में यह क्षेत्र जलवायु वैज्ञानिकों के लिए विशेष रुचि का विषय रहा है क्योंकि इसका संबंध महासागरीय धाराओं और वैश्विक जलवायु प्रणाली से माना जाता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि जब जलवायु मॉडलों में इस कोल्ड ब्लॉब के प्रभाव को शामिल किया गया, तो भारतीय मानसून के बारे में प्राप्त परिणाम वास्तविक अवलोकनों के कहीं अधिक करीब दिखाई दिए। इससे संकेत मिलता है कि अटलांटिक महासागर में होने वाले बदलाव भारतीय उपमहाद्वीप के मौसम पर भी असर डाल सकते हैं। जेट स्ट्रीम के जरिये मानसून पर पड़ता है गहरा प्रभाव अध्ययन के अनुसार कोल्ड ब्लॉब का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव जेट स्ट्रीम पर पड़ता है। जेट स्ट्रीम वातावरण की ऊपरी परतों में बहने वाली अत्यंत तेज गति की वायु धाराएं होती हैं, जो मौसम प्रणालियों की दिशा और तीव्रता तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि अटलांटिक के इस ठंडे क्षेत्र के कारण जेट स्ट्रीम के व्यवहार में बदलाव आता है। इससे अरब सागर से आने वाली नमी उत्तर-पश्चिम भारत की ओर आकर्षित होती है और राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और आसपास के क्षेत्रों में वर्षा बढ़ने की संभावना बनती है। दूसरी ओर, कुछ इलाकों में मौसम प्रणालियां कमजोर पड़ सकती है, जिससे वहां बारिश कम हो सकती है। यह भी पढ़ें:संयुक्त राष्ट्र ने दी चेतावनी:जून से अगस्त तक भयंकर गर्मी का अलर्ट, अल नीनो बढ़ाएगा आफत बारोट्रॉपिक गवर्नर तंत्र की भूमिका अध्ययन में वैज्ञानिकों ने इस प्रक्रिया को बारोट्रॉपिक गवर्नर मैकेनिज्म नाम दिया है। सरल शब्दों में, यह ऐसा तंत्र है जिसमें बड़े पैमाने की वायुमंडलीय प्रणालियां छोटे पैमाने की मौसमीय गतिविधियों को नियंत्रित करने लगती हैं।जब ऊपरी वायुमंडल में बड़े स्तर की हवाएं अधिक प्रभावी हो जाती हैं, तो वे छोटे तूफानों और स्थानीय मौसम प्रणालियों को विकसित होने से रोक सकती हैं। इसका सीधा असर वर्षा के वितरण पर पड़ता है और विभिन्न क्षेत्रों में बारिश के पैटर्न बदल सकते हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि यही प्रक्रिया भारतीय मानसून में देखे जा रहे बदलावों को समझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। मौसम पूर्वानुमान को मिल सकती है नई सटीकता वैज्ञानिकों के अनुसार इस अध्ययन का महत्व केवल भारतीय मानसून तक सीमित नहीं है। यह दुनिया के अन्य मध्य-अक्षांशीय क्षेत्रों में बढ़ती या बदलती तूफानी गतिविधियों को समझने में भी मदद कर सकता है। शोध यह भी दिखाता है कि पृथ्वी के एक हिस्से में होने वाला समुद्री या जलवायु परिवर्तन हजारों किलोमीटर दूर स्थित क्षेत्रों के मौसम को प्रभावित कर सकता है।शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि भविष्य के जलवायु मॉडल अटलांटिक महासागर और भारतीय मानसून के बीच इस संबंध को अधिक सटीकता से शामिल कर सकें तो मानसून, सूखे और बाढ़ जैसी घटनाओं का पूर्वानुमान पहले से कहीं अधिक विश्वसनीय बनाया जा सकेगा। इसका लाभ कृषि, जल प्रबंधन, आपदा तैयारी और करोड़ों लोगों की आजीविका की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Jun 03, 2026, 04:51 IST
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