दोराहे पर एशिया के मजदूर: युद्ध के साए में रोजगार चुनें या जिंदगी, लाखों श्रमिक घर-परिवार के लिए अभी वहीं फंसे
अमेरिका-इस्राइल और ईरान के बीच बढ़ते युद्ध ने खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों एशियाई प्रवासी मजदूरों को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां हर दिन उनकी जिंदगी और रोजगार आमने-सामने खड़े हैं। बीबीसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि मिसाइलों, सायरनों और अनिश्चितता के बीच एक सख्त सच्चाई उभर रही है कि जो लोग इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, वही सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं और सबसे कम विकल्प उनके पास हैं। कतर में घरेलू कामगार के रूप में काम कर रहीं 49 वर्षीय नोर्मा टैक्टाकॉन के लिए हर दिन डर के साथ शुरू होता है। फिलीपीन में उनका परिवार, पति और तीन बच्चे पूरी तरह उनकी कमाई पर निर्भर है। वह अब अपने पति के साथ फिलीपीन लौटकर छोटा व्यवसाय शुरू करने पर विचार कर रही हैं। ईरानी हमलों के बीच कम वेतन वाले लाखों एशियाई मजदूर घरेलू कामगार, निर्माण श्रमिक, सुरक्षा गार्ड अब भी वहीं फंसे हुए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, कम से कम 12 दक्षिण एशियाई मजदूरों की मौत हो चुकी है। 32 वर्षीय फिलीपीनी केयरगिवर मैरी एन वेलास्केज तेल अवीव में उस समय घायल हो गईं जब एक बैलिस्टिक मिसाइल उनके अपार्टमेंट पर गिरी वह अपने मरीज को बचाने की कोशिश कर रही थीं। नेपाल के 29 वर्षीय दीबस श्रेष्ठ, जो अबू धाबी में सुरक्षा गार्ड थे, 1 मार्च को ईरानी हमले में मारे गए। दुबई में 55 वर्षीय बांग्लादेशी अहमद अली की मौत एक इंटरसेप्टेड मिसाइल के मलबे से हुई। उनके बेटे ने कहा, पिताजी को युद्ध का पता नहीं था। खाड़ी की अर्थव्यवस्था की अदृश्य रीढ़ 2.4 करोड़ जिंदगियां दांव पर अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार पश्चिम एशिया में करीब 2.4 करोड़ प्रवासी मजदूर हैं। यह दुनिया का सबसे बड़ा श्रम प्रवासन केंद्र है। इनमें अधिकांश भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, फिलीपीन व इंडोनेशिया से हैं। ये लोग कम वेतन, अस्थिर नौकरियों और सीमित स्वास्थ्य सुविधाओं के बीच काम करते हैं। फिलीपीनी घरेलू कामगारों को खाड़ी में कम से कम 500 डॉलर मासिक वेतन मिलता है जो उनके देश की तुलना में 4–5 गुना अधिक है। यही आर्थिक मजबूरी उन्हें यहां रोके रखती है। अन्य वीडियो:-
- Source: www.amarujala.com
- Published: Apr 02, 2026, 05:16 IST
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