ACP संतोष पटेल की अनसुनी कहानी: इंजी.के बाद नौकरी नहीं मिली तो मजदूरी की, फॉरेस्ट गार्ड बने फिर हासिल की मंजिल

इंजीनियरिंग की पढ़ाई, फॉरेस्ट गार्ड की नौकरी, फिर डीएसपी और अब भोपाल में एसीपी की जिम्मेदारी। यह सफर जितना सुनने में आसान लगता है, उतना था नहीं। आर्थिक तंगी, भटकाव, परिवार की सख्ती, खेतों में मजदूरी और फिर मेहनत के दम पर मिली सफलता। भोपाल के नए एसीपी संतोष पटेल ने अमर उजाला से खास बातचीत में अपने संघर्ष, पुलिसिंग, सोशल मीडिया, राजनीतिक दबाव और निजी जिंदगी से जुड़े कई अनसुने किस्से साझा किए। ये भी पढ़ें-Twisha Sharma Case:त्विषा केस में आरोपी पक्ष तैयार, वॉइस सैंपल और पासवर्ड पर अदालत का आदेश 7 जुलाई को सवाल: इंजीनियरिंग की पढ़ाई, फिर फॉरेस्ट गार्ड, उसके बाद डीएसपी और अब भोपाल में एसीपी। इस पूरे सफर में सबसे बड़ी चुनौतियां क्या रहीं संतोष पटेल: भोपाल मेरे लिए संघर्षों का शहर रहा है। वर्ष 2009 में पढ़ाई के लिए यहां आया था। उस समय पैदल चलकर कॉलेज जाता था। आज उसी शहर ने मुझे वर्दी पहनकर लोगों की सेवा करने का अवसर दिया है। श्यामला हिल्स में मस्जिद के पास किराए के छोटे से कमरे में करीब डेढ़ साल रहा। जब दोबारा भोपाल आया तो पुरानी यादें ताजा हो गईं। फर्क सिर्फ इतना है कि तब पढ़ाई करने आया था, आज जनसेवा के उद्देश्य से आया हूं। मेरा मानना है कि बिना संघर्ष के कोई व्यक्ति आगे नहीं बढ़ सकता। सफलता की असली कीमत वही समझता है जिसने कठिनाइयों का सामना किया हो। कॉलेज के दिनों में कई युवा पैसा और प्यार जैसी चीजों में भटक जाते हैं। मैं भी ऐसे दौर से गुजरा। ये भी पढ़ें-'दिग्विजय सिंह को कोई सीरियस नहीं लेता':RSS पर पूर्व सीएम के आरोपों पर भाजपा सांसद का पलटवार; क्या-क्या बोले खेत की मेहनत से आसान काम कलम का इंजीनियरिंग पूरी होने के बाद नौकरी नहीं मिली। तब सोचा कि अब माता-पिता से पैसे नहीं मांगूंगा। इसी दौरान बीमार होकर घर पहुंचा तो परिवार ने मुझे गांव में ही रोक लिया। घर से बाहर निकलने तक की अनुमति नहीं दी। मां खेतों में ले जाती थीं। कभी फावड़ा चलाना पड़ता, कभी बारिश में फसल की गुड़ाई करनी पड़ती। तब समझ आया कि खेत की मेहनत से आसान काम तो किताब और कलम का है। वहीं से जिंदगी बदलने का फैसला लिया। दोबारा पढ़ाई शुरू की। पहले फॉरेस्ट गार्ड बना और फिर दूसरे प्रयास में डीएसपी के पद पर चयन हो गया। ये भी पढ़ें-MP News:18-19 जुलाई को ओरछा में होगी भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक, संगठनात्मक रणनीति पर होगा मंथन सवाल: बालाघाट जैसे नक्सल प्रभावित जिले से अब भोपाल आए हैं। यहां राजनीतिक और प्रभावशाली लोगों का दबाव भी रहता है। इसे कैसे देखते हैं संतोष पटेल: राजनीति का उद्देश्य शासन करना है और पुलिस का उद्देश्य सेवा करना है। हमारी कोशिश रहेगी कि हर व्यक्ति को निष्पक्ष सेवा मिले। यदि कोई सही काम के लिए फोन करेगा तो रात 12 बजे भी पहुंच जाएंगे, चाहे वह आम नागरिक हो या कोई जनप्रतिनिधि। लेकिन यदि कोई गलत काम के लिए दबाव बनाएगा तो उसे स्वीकार नहीं करूंगा। इस वजह से मेरा एक बार ट्रांसफर भी चुका हैं। ये भी पढ़ें-Bhopal:एमपी समेत चार राज्यों के बीच नर्मदा परियोजना का वर्षों पुराना विवाद खत्म, एकमुश्त समझौते पर लगी मुहर सवाल: आपने कहा कि आपका एक बार ट्रांसफर हुआ था। मामला क्या था संतोष पटेल: उस समय मेरे खिलाफ आंदोलन तक हुआ था। कई बार लोग दबाव बनाते हैं कि हमारे आदमी को छोड़ दो या कार्रवाई मत करो। मेरा स्वभाव ऐसा नहीं है। कई मामलों में शिकायत तो होती है, लेकिन उसके समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य नहीं होते। कई बार झूठी एफआईआर भी दर्ज हो जाती हैं। ऐसे मामलों में हमने निष्पक्ष जांच कर झूठे प्रकरण खत्म कराए, जिससे कुछ लोगों को आपत्ति हुई। पुलिसिंग का सिद्धांत साफ है दोषी को छोड़ो मत और निर्दोष को छेड़ो मत। क्योंकि जब एक निर्दोष जेल जाता है तो उसके साथ पूरा परिवार सजा भुगतता है। ये भी पढ़ें-MP:पीथमपुर में 272 करोड़ के नए निर्माण उपकरण प्लांट का होगा भूमि-पूजन, सीएम डॉ. मोहन यादव होंगे शामिल सवाल: सोशल मीडिया पर आपकी काफी सक्रियता रहती है। इतना समय कैसे निकाल लेते हैं संतोष पटेल: इसके लिए पत्नी से डांट भी खानी पड़ती है। कई बार घर पर भी मोबाइल पर लिखने-पढ़ने में व्यस्त रहता हूं। लेकिन मुझे लगता है कि इससे मेरा मानसिक और वैचारिक विकास होता है। सकारात्मक बातें लिखने से तनाव भी कम होता है। खाली समय और सफर के दौरान मैं लोगों के लिए प्रेरणादायक बातें लिखता हूं। ऐसे ही समय निकल जाता हैं। सवाल: सोशल मीडिया से आपकी कितनी कमाई हो जाती है संतोष पटेल: सोशल मीडिया से कोई कमाई नहीं होती। हम सरकारी कर्मचारी हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ पुलिस की सकारात्मक छवि लोगों तक पहुंचाना है। फिल्मों और सोशल मीडिया में अक्सर पुलिस का नकारात्मक पक्ष दिखाया जाता है। जबकि हजारों पुलिसकर्मी दिन-रात लोगों की मदद करते हैं। हम चाहते हैं कि लोगों का पुलिस पर विश्वास बढ़े। ये भी पढ़ें-Digvijaya Singh Latest News:'कोई राजनीति नहीं..' दिग्विजय सिंह का बड़ा एलान, क्या छोड़ेंगे राजनीति सवाल: यह बात कितनी सही है कि आपकी पत्नी की सोशल मीडिया पोस्ट के बाद आपका ट्रांसफर हो गया था संतोष पटेल: एक दिन घर में इसी बात पर चर्चा हो रही थी कि मेरा ट्रांसफर कब होगा। पत्नी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दी। बाद में हमने वह पोस्ट हटा भी दी, लेकिन तब तक लोगों ने उसका स्क्रीनशॉट ले लिया था। संयोग ऐसा रहा कि कुछ दिन बाद मेरा ट्रांसफर हो गया। लोगों ने इसे सकारात्मक तरीके से लिया। मेरा मानना है कि सरकार को महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों की बात जरूर सुननी चाहिए। यदि सरकार ने मेरी पत्नी की बात सुनी तो मैं धन्यवाद देता हूं। सवाल: आपकी शादी में पत्नी को साइकिल पर ले जाने वाला वीडियो काफी वायरल हुआ था। उसकी क्या कहानी है संतोष पटेल: हमारी शादी पूरी तरह सादगी और पारंपरिक तरीके से हुई थी। गांव की पुरानी परंपराओं का पालन किया गया। बाद में देवी-देवताओं की पूजा के लिए जंगल जाना था, जहां सड़क नहीं थी। इसलिए साइकिल से गए। उसी दौरान का वीडियो वायरल हो गया। हमने शादी में किसी तरह का दिखावा नहीं किया। हमारा उद्देश्य सादगी और प्रकृति के करीब रहना था। ये भी पढ़ें-MP:खंडवा में पुलिस ने कुख्यात बदमाशों का निकाला जुलूस, कान पकड़कर लगवाए नारे; ब्लैक स्कॉर्पियो भी जब्त सवाल: अब आप भोपाल में एसीपी हैं, लेकिन रहन-सहन आज भी पूरी तरह देशी है। क्या परिवार कभी इसे लेकर कुछ कहता है संतोष पटेल: नहीं। हम दोनों किसान परिवार से हैं। पत्नी का परिवार भी खेती-किसानी से जुड़ा है और मेरा परिवार भी। इसलिए हमारी सोच और जीवनशैली एक जैसी है। सादगी ही हमारी सबसे बड़ी पहचान है। सवाल: भोपाल में पढ़ाई के दौरान सब्जी विक्रेता सलमान भाई ने आपकी मदद की थी। वह किस्सा क्या है संतोष पटेल: अप्सरा टॉकीज के पीछे सलमान भाई ठेला लगाते हैं। छात्र जीवन में कई बार हमारे पास खाने तक के पैसे नहीं होते थे। लेकिन कपड़े साफ होने चाहिए, जूते पॉलिश होने चाहिए, यह सोच रहती थी। ऐसे समय में सलमान भाई कई बार सब्जियां दे देते थे। बदले में हम भी उनके ठेले पर सामान रखने जैसे छोटे-मोटे काम कर देते थे। जब अधिकारी बनकर दोबारा भोपाल आया तो सबसे पहले उनसे मिलने गया और उनको बुलवाया। पुलिस की गाड़ी देखकर वे घबरा गए। जब मैं गाड़ी से उतरकर उन्हें गले लगा तो वे भावुक हो गए। संघर्ष के दिनों में साथ देने वाले लोगों को कभी नहीं भूलना चाहिए।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jul 08, 2026, 07:13 IST
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