मुद्दा: आधी सदी का मौन युद्ध, इबोला के खिलाफ योजना और धैर्य से लड़नी होगी जंग

वर्ष 1976 से लेकर 2026 तक 50 वर्षों की यात्रा में इबोला वायरस वर्षावनों से निकलकर अफ्रीका के गावों में मौतों का पिटारा खोलकर अपना डेरा डाल देता है और कुछ वर्षों के लिए शांत हो जाता है। लेकिन, 2026 का प्रकोप कुछ अलग तरह का है। एक महाद्वीप से लेकर अब यह पूरे विश्व में अपना वर्चस्व स्थापित करने पर उतारू है। जब विगत 15 मई को कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और युगांडा ने इबोला प्रकोप की घोषणा की, तब तक वहां 246 संदिग्ध मामलों और 80 मौतों की पुष्टि हो चुकी थी। एक अंतरराष्ट्रीय शोध दल के अनुसार, इबोला संक्रमितों की वास्तविक संख्या बहुत अधिक हो सकती है। इस वर्ष इबोला का एक नया अवतार, बुंडीबुग्यो (बीवीडी) प्रकट हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के महानिदेशक ने इस प्रकोप को अंतरराष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल (पीएचईआईसी) घोषित किया है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बुंडीबुग्यो की रोकथाम के लिए कोई टीका नहीं है, और न ही उपचार। डब्ल्यूएचओ ने अपनी सभी आपातकालीन प्रणालियों को सक्रिय कर दिया है। अफ्रीकी सीडीसी ने भी महाद्वीप की सुरक्षा के लिए डब्ल्यूएचओ के पीएचईआईसी के समानांतर घोषणापत्र जारी कर दिया है। विश्व की सबसे अधिक जनसंख्या वाला हमारा देश भी इबोला को लेकर सतर्क हो चुका है। भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने सभी निवारक तंत्रों को पूरी तरह सतर्क और क्रियाशील रहने के दिशानिर्देश जारी कर दिए हैं। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) को ट्रैकिंग, परीक्षण और निगरानी के लिए निरंतर तत्परता बनाए रखने का निर्देश दिया गया है। 1976 में, अफ्रीका के जैरे (अब कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य) का एक मिशनरी अस्पताल एक रहस्यमयी वायरस की वजह से मुर्दाघर बनता जा रहा था। तब किसी ने कल्पना नहीं की होगी कि यही वायरस 2026 में अपनी खोज की स्वर्ण जयंती मना रहा होगा। इबोला का प्रथम ज्ञात मामला इबोला नदी के आसपास से प्रकाश में आया था। अगस्त-सितंबर 1976 में इबोला नदी से 60 किलोमीटर दूर यंबुक मिशन अस्पताल में रक्तस्रावी बुखार के पीड़ितों का अंबार लगने लगा था। बेल्जियम के वैज्ञानिक पीटर पिओट और उनकी टीम ने इस बीमारी के वायरस की पहचान की। कार्ल जॉनसन ने इस वायरस का नाम इबोला नदी के नाम पर रखा। इबोला वायरस जूनेटिक है, अर्थात यह पहले जानवरों को संक्रमित करता है और फिर मानव समाज में फैलता है। फल-चमगादड़ (फ्रूट बैट) को इबोला का स्रोत माना जाता है। फ्रूट बैट से जब वायरस किसी जानवर में पहुंचता है, तो वे मनुष्यों के लिए इबोला के सेतु बन जाते हैं। वर्ष 1976 से पहले इबोला अपने प्राकृतिक परिवेश में शांत पड़ा था। पर, प्राकृतिक वनों के अतिक्रमण और जानवरों का शिकार कर उनका भक्षण करने वालों ने इबोला को मानव समाज में फैला दिया। इबोला ने अभी विश्वव्यापी महामारी का रूप नहीं लिया है, पर यह ऐसी क्षमता रखता है। इसके संक्रमण में ज्वर, थकान, मांसपेशियों में दर्द, सिरदर्द जैसे स्वास्थ्य-विकार पैदा हो जाते हैं। संक्रमण के बाद कुछ दिन तक मलेरिया या फ्लू जैसे लक्षण दिखाई पड़ते हैं, पर एक सप्ताह में ही शरीर टूटने लगता है। फिर उल्टी, दस्त, और आंतरिक अंगों से रक्तस्राव जैसी स्वास्थ्य समस्याएं होने लगती हैं। इबोला का घातक प्रभाव केवल चिकित्सा पद्धति पर ही नहीं, सामाजिक ताने-बाने पर भी पड़ता है। वायरस न केवल लोगों की जान लेता है, स्वास्थ्य सेवाओं में लोगों के विश्वास को भी लील जाता है। किसी महामारी के जड़मूल निराकरण के लिए केवल टीके ही पर्याप्त नहीं हैं। किसी क्षेत्र की गरीबी, संघर्ष, अविश्वास, और लचर स्वास्थ्य प्रणालियां इबोला को फैलाने में सहायक हो रही हैं। डब्ल्यूएचओ की इबोला महामारी के प्रबंधन की विस्तृत रणनीति में एक वाक्य छिपा है-बड़े पैमाने पर विश्वास निर्माण और सामुदायिक सहभागिता का वातावरण बनाएं। यदि इबोला नदी की तरह इबोला वायरस का खतरा भी अफ्रीका और दुनिया में लगातार न फैलता रहे, तो इसके लिए प्राकृतिक वनों का संरक्षण और विस्तार, जंगली जानवरों के शिकार पर प्रभावी रोक तथा वन्यजीवों के साथ मानव संपर्क को न्यूनतम करना बेहद आवश्यक है। इसके अलावा, मांसाहार से बचने जैसी सावधानियां वायरस को उसके प्राकृतिक परिवेश तक सीमित रखने और भविष्य में इबोला जैसी महामारियों के जोखिम को कम करने में मददगार हो सकती हैं।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jun 29, 2026, 04:20 IST
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