अशोक अंजुम: यूं तो सारे ही अपने हैं लेकिन है परिवार अलग !
खाना- पीना, हंसी-ठिठोली , सारा कारोबार अलग ! जाने क्या-क्या कर देती है आँगन की दीवार अलग ! सारे भाई, मां-बापू भी कहने को संग रहते हैं यूं तो सारे ही अपने हैं लेकिन है परिवार अलग! पहले इक छत के ही नीचे कितने उत्सव होते थे, सारी ख़ुशियाँ पता न था यूँ कर देगा बाज़ार अलग ! पत्नी, बहन, भाभियाँ, ताई, चाची, बुआ, मौसीजी सारे रिश्ते एक तरफ़ हैं लेकिन माँ का प्यार अलग ! कैसे तेरे-मेरे रिश्ते को मंज़िल मिल सकती थी कुछ तेरी रफ़्तार अलग थी, कुछ मेरी रफ़्तार अलग ! जाने कितनी देर तलक दिल बदहवास-सा रहता है तेरे सब इकरार अलग हैं, लेकिन इक इनकार अलग ! अब पलटेंगे, अब पलटेंगे, जब-जब ऐसा सोचा है 'अंजुम जी' अपना अन्दाजा होता है हर बार अलग ! हमारे यूट्यूब चैनल कोSubscribeकरें।
- Source: www.amarujala.com
- Published: May 14, 2026, 18:51 IST
अशोक अंजुम: यूं तो सारे ही अपने हैं लेकिन है परिवार अलग ! #Kavya #UrduAdab #AshokAnjum #Hasya #SubahSamachar
