देवगुरु ने दैत्यगुरु का रूप क्यों धारण किया
देवराज इंद्र के मन में सदैव दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य का भय बना रहता था। एक दिन इंद्र ने अपनी पुत्री जयंती से कहा, बेटी, शुक्राचार्य हमारे शत्रुओं के हित में तप कर रहे हैं। यदि उनका तप सफल हो गया, तो देवताओं की कठिनाई बढ़ जाएगी। तुम शुक्राचार्य के पास जाकर उन्हें अपनी सेवा से प्रसन्न करो, ताकि वह कुछ समय तक अपने कार्य से विमुख हो जाएं। पिता का आदेश मानकर जयंती शुक्राचार्य के पास पहुंची। उस समय शुक्राचार्य ध्यान में लीन थे। जयंती ने बड़ी श्रद्धा से उनकी सेवा आरंभ कर दी। कुछ समय बाद जब शुक्राचार्य ने जयंती को देखा, तो उन्होंने पूछा, सुंदरी, तुम कौन हो मुझसे क्या चाहती हो जयंती ने उत्तर दिया, ऋषिवर! मैं आपके साथ कुछ समय व्यतीत करना चाहती हूं। यह सुनकर शुक्राचार्य ने जयंती को अपने साथ दस वर्षों तक रहने की अनुमति दे दी। इन दस वर्षों में शुक्राचार्य असुरों से दूर रहे। इसी अवसर की देवताओं को प्रतीक्षा थी। उधर बृहस्पति को जैसे ही यह समाचार मिला कि शुक्राचार्य दैत्यों को छोड़कर चले गए हैं, तो उन्होंने तुरंत उनका रूप धारण किया और असुरों के पास पहुंच गए। असुरों ने उन्हें देखते ही प्रणाम किया और बोले, गुरुदेव! आप आ गए! शुक्राचार्य के रूप में बृहस्पति ने उत्तर दिया, मैं तप करके लौटा हूं और अब तुम्हें नई विद्याएं सिखाऊंगा। यह सुनकर असुर प्रसन्न होकर बोले, गुरुदेव, हम आपसे नई विद्याएं सीखने के लिए तैयार हैं। इस प्रकार असुर, दस वर्षों तक बृहस्पति को शुक्राचार्य मानकर उनसे शिक्षा ग्रहण करते रहे। उधर जब दस वर्ष पूरे हुए, तब शुक्राचार्य असुरों के पास लौट आए। उन्होंने देखा कि कोई उनका रूप धारण करके असुरों को शिक्षा दे रहा है। वह समझ गए कि यह देवताओं के गुरु बृहस्पति की एक चाल थी। शुक्राचार्य ने दैत्यों को समझाने का प्रयास किया और उनसे कहा, दैत्यों! मैं ही तुम्हारा सच्चा गुरु शुक्राचार्य हूं। यह जो तुम्हारे सामने खड़े हैं, ये वास्तव में देवताओं के गुरु बृहस्पति हैं और इन्होंने मेरा रूप धारण करके तुम्हें भ्रम में डाल दिया है। असुरों ने जब दो शुक्राचार्य देखे, तो वे दुविधा में पड़ गए और सोचने लगे कि उन दोनों में से असली शुक्राचार्य कौन है। असुर दुविधा में पड़े सोच-विचार कर ही रहे थे कि तभी बृहस्पति ने असली शुक्राचार्य की ओर संकेत करते हुए असुरों से कहा, असुरो! यह कोई बहुरूपिया है। तुम्हारा गुरु मैं ही हूं। यह तुम्हें धोखा देने का प्रयास कर रहा है। यह सुनकर असुर और उलझन में फंस गए। तब उन्होंने विचार किया, जो हमें दस वर्षों से शिक्षा दे रहा है, वही हमारा गुरु है! यह सोचकर उन्होंने बृहस्पति को ही अपना गुरु मान लिया। यह देखकर शुक्राचार्य का क्रोध भड़क उठा। उन्होंने कहा, मूर्खो! मैंने तुम्हें समझाया, फिर भी तुमने मेरी बात नहीं मानी। इसलिए मैं तुम्हें शाप देता हूं कि युद्ध में तुम्हारी बुद्धि नष्ट हो जाएगी और तुम देवताओं के हाथों पराजित हो जाओगे! इतना कहकर शुक्राचार्य वहां से चले गए। बृहस्पति की योजना सफल हो गई थी। वह प्रसन्न होकर अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए और फिर मुस्कुराते हुए अंतर्ध्यान हो गए। यह देखकर असुरों को अपनी भूल का एहसास हुआ। वे पछताते हुए बोले, हम ठग लिए गए! हम अपने सच्चे गुरु को पहचान नहीं पाए। फिर असुरों ने प्रह्लाद को आगे किया और शुक्राचार्य के पास गए। प्रह्लाद ने विनम्रतापूर्वक कहा, गुरुदेव, हमें क्षमा कर दीजिए। हमसे भूल हो गई। हम आपकी शरण में आए हैं। इस बीच शुक्राचार्य ने भी अपनी दिव्य दृष्टि से सब कुछ जान लिया था। उनका क्रोध शांत हो गया और उनके मन में असुरों के लिए करुणा जाग गई। वह बोले, प्रह्लाद! दैवीय विधान सबसे बलवान होता है। मेरे शापवश असुरों की नष्ट हुई चेतना फिर से लौट आएगी। साथ ही, विपरीत समय आने पर तुम्हें देवताओं पर विजय पा लेने पर भी पाताल में जाना पड़ेगा। उस समय तुम्हारा पौत्र बलि त्रिलोक का अधीश्वर होगा। इस प्रकार, असुरों ने पुन: शुक्राचार्य को अपना गुरु बना लिया।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Apr 19, 2026, 05:31 IST
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