मेज के दूसरी तरफ भी देखिए: वैश्विक मंच पर भारत की मौजूदगी को लेकर छिड़ी बहस

आजकल सारी चर्चा मेज के इर्द-गिर्द ही घूमती नजर आती है। सवाल उठाया जा रहा है कि जिस भारत ने अपनी वैश्विक आकांक्षाओं को कभी नहीं छिपाया, वह तब वहां क्यों मौजूद नहीं है, जब पूरी दुनिया एक बेहद नाजुक धुरी पर टिकी हुई है। यह उन लोगों का विलाप नहीं है, जिनका दिल भारत के वैश्विक पटल से बाहर हो जाने के विचार से टूट गया है। शिकायतें उन लोगों की ओर से आती हैं, जिन्होंने निराशा फैलाने को ही अपना धर्म बना लिया है। दुनिया तानाशाहों और अयातुल्लाओं, खुद को सबसे बड़ा समझने वालों और सनकी राष्ट्रवादियों की सबसे बुरी प्रवृत्तियों के बोझ तले दबी हुई है। यूक्रेन में लगातार सुलगती आग से लेकर गाजा में अब भी जारी अशांति तक, बुरी तरह से पस्त ईरान से लेकर उस अमेरिका तक (जो अपनी बेइज्जती को इज्जत में तब्दील करने के लिए जूझ रहा है)-यह साफ जाहिर है कि दुनिया के सबसे ऊंचे मंच पर भी कोई स्थायी समाधान नहीं मिल पा रहा है, और भारत जैसे देश के पास भी देने के लिए कोई खास समझदारी नहीं बची है-कम से कम, कुछ लोग तो बड़े मजे लेकर यही कहते हैं। इसी सोच के तहत उसे ऐसे देश की तरह चित्रित किया जा रहा है, जो कभी वैश्विक निर्णयों की ऊंची मेज पर बैठने का दावेदार था, लेकिन अब वहां से फिसलता हुआ दिखाई दे रहा है। इसके पीछे सत्ताधारी विचारधारा की संकीर्णता और इसकी विदेश नीति की नैतिक सीमाओं का संयुक्त प्रभाव जैसे तर्क बताए जा रहे हैं। इस चित्र का अंतिम स्ट्रोक एक अस्वीकृति है कि भारत वैश्विक नजरों से ओझल हो चुका है। ऊपर दी गई आलोचना को गलत नीयत से देखने से पहले, हमें ऊंची मेज के बड़े दिग्गजों और उनकी वैचारिक बनावट पर गौर करना होगा। पहला प्रतीक है वह अमेरिकी, जिसकी अपने देश में साख लगातार गिर रही है, जिससे उसकी पार्टी में हर कोई परेशान है, सिवाय खुद उसके, क्योंकि वह अब भी बदले की राजनीति और सिर्फ मैं वाली सोच से अंधा हुआ पड़ा है। वॉल स्ट्रीट जर्नल जैसे मुख्यधारा के एक रूढ़िवादी अखबार ने भी यह निष्कर्ष निकाला है कि डोनाल्ड ट्रंप शासन की राह से भटक गए हैं। अपनी ही पार्टी में लगातार अलग-थलग पड़ते जा रहे, अनैतिक वित्तीय सौदों से बेपरवाह, एक बुरे युद्ध की मार झेल रहे ट्रंप जैसे-जैसे मध्यावधि चुनावों के झटके की ओर बढ़ रहे हैं, वह इससे अनजान हैं कि उनकी उपलब्धियां (जो वैसे भी बहुत कम हैं) किस तरह उनके अपने चारित्रिक दोषों के कारण लगातार बेअसर होती जा रही हैं। ट्रंप, अपने तमाम शोर-शराबे के बावजूद अकेले पड़ गए हैं। अटलांटिक के उस पार, एक और कमजोर नेता वामपंथी खेमे में है, और उसका पतन सबसे तेजी से हुआ है। कीर स्टार्मर की हालत ऐसी हो गई है कि वह अब सत्ता की दावेदारी करने लायक भी नहीं रहे। ब्लेयर के बाद की लेबर पार्टी अब भी किसी उद्धारक का इंतजार कर रही है, ठीक वैसे ही, जैसे थैचर के बाद की कंजर्वेटिव पार्टी किसी 'क्रांतिकारी' की राह देख रही है। लेकिन दक्षिणपंथी विचारधारा के लोगों को लगता है कि उन्हें निगेल फराज के रूप में एक सफल नेता मिल गया है। स्थानीय चुनावों में उनकी पार्टी रिफॉर्म यूके की शानदार जीत के बाद, मध्य इंग्लैंड के कुछ अछूते रूढ़िवादी और कुछ अति-प्रभावित राजनीतिक विश्लेषक आश्वस्त हैं कि वही अगले प्रधानमंत्री होंगे। फराज की कट्टर रूढ़िवादिता एक तरह से सनकी राष्ट्रवाद का उत्सव है और उन रूढ़िवादियों के लिए एक करारा जवाब है, जो अब पर्याप्त रूप से रूढ़िवादी नहीं रह गए हैं। वह ऊंची मेज पर अपनी जगह का इंतजार कर रहे हैं। जर्मनी और फ्रांस के कट्टरपंथी लोकलुभावनवादी भी कुछ ऐसे ही हैं। वे सभी यूरोप के भविष्य को अधिक शुद्ध और विशिष्ट मानते हैं। उनके अनुसार, एकीकरण तो केवल उन वैश्वीकरणवादियों के लिए है, जो राष्ट्र-विमुख हैं। इस उच्च-मंच के वर्तमान और भावी सदस्यों को जो बात एक सूत्र में पिरोती है, वह है उनकी वह मानसिकता, जो एक ऐसे विभाजित विश्व को प्राथमिकता देती है, जहां संकीर्ण राष्ट्रीय हितों को ही सर्वोपरि स्थान प्राप्त हो। दो अन्य सदस्य (चीन और रूस) इस मेज को और भी अधिक अस्थिर बना देते हैं। भारत को वैश्विक मंच पर जगह न मिलने की बात को जिस खुशी के साथ जाहिर किया जाता है, उसके पीछे यह सोच काम करती है कि मोदी के भारत को वैश्विक भूमिका निभाने का कोई अधिकार नहीं है। लेकिन ध्यान देने वाली बात है कि दूसरी जगहों पर, दक्षिणपंथी खेमे के समक्ष वैधता का सवाल है: सत्ता उन्हीं लोकतांत्रिक भावनाओं के विरुद्ध खड़ी है, आज, कैरिकेचर ही उसका आधिकारिक चित्र बन गया है। अपने ज्यादातर घरेलू सार्वजनिक कार्यक्रमों में, वह किसी मार्वल कॉमिक्स के खलनायक की नकल जैसा दिखता है। मोदी के भारत में वैधता की किसी परीक्षा की कोई जरूरत नहीं है, और इसकी सिर्फ एक ही वजह है: इसकी रूढ़िवादिता, जिसमें एक विशिष्ट सांस्कृतिक तत्व निहित है। किसी प्रतिबंधात्मक लोकतंत्र के बजाय यह एक रचनात्मक लोकतंत्र को दर्शाती है। सत्ता में रहते हुए मोदी सबसे अधिक स्थायी और लोकप्रिय रूढ़िवादी बने हुए हैं, क्योंकि अन्य जगहों पर अपने उन समकक्षों के विपरीत, जिनकी वैधता समाप्त हो चुकी है, वे अब भी लोकतंत्र को नियंत्रित करने के बजाय उसे जीतने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। खतरे का ढोल पीटने वाले लोग (जो अब भी एक सुस्त, जकड़े हुए नागरिक समाज और छिपे हुए फासीवाद की बयानबाजी के मोहताज हैं) हिंदू राष्ट्रवाद को केवल आधुनिकता-विरोधी और यहां तक कि 'लोकतंत्र-विरोधी' के रूप में ही देख पाते हैं। यह उन प्रगतिशीलों का पक्ष है, जो भारत के सांस्कृतिक पुनर्गठन को एक विशिष्टतावादी और प्रतिगामी परियोजना के रूप में खारिज करते हैं। सवाल यह है कि क्या भारत को, विवादों से भरे इस विश्व के समक्ष अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए, वास्तव में ऐसे किसी ऊंचे मंच की आवश्यकता है वहां मौजूद न होने से भारत छोटा नहीं हो गया है। न ही उसने अपनी मनचाही चीज पाने की शक्ति खोई है, और न ही किसी नए साथी के साथ बातचीत शुरू करने के लिए तैयार रहने की अपनी क्षमता। इस सदी में जब भी युद्ध छिड़े, तो भले ही भारत नैतिक रूप से थोड़ा हिचकिचाया हो। लेकिन उसने अपनी आवाज नहीं खोई है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jun 08, 2026, 03:19 IST
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