हिम्मत वतन की हमसे है: शरीर छलनी, पर हौसला चट्टान,18 गोलियां खाकर भी लड़ते रहे थे कैप्टन प्रह्लाद

जब तक सांस है, दुश्मन को भारत की जमीन पर टिकने नहीं देंगे। यह महज़ शब्द नहीं, बल्कि भालौठ के वीर सपूत कैप्टन प्रह्लाद सिंह का संकल्प था, जिन्होंने 1971 के भारत-पाक युद्ध में शरीर में 18 गोलियां लगने के बाद भी पाकिस्तानी मशीनगन के सामने घुटने नहीं टेके। अदम्य साहस की मिसाल रहे कैप्टन प्रह्लाद को जब पूरा गांव ''शहीद'' मान चुका था, लेकिन जंग के एक साल बाद आई उनकी एक चिट्ठी ने पूरे परिवार के आंसू खुशी में बदल दिए। राष्ट्रपति से ''वीर चक्र'' पाने वाले इस महानायक की विरासत को आज उनकी तीन पीढ़ियां सेना, विज्ञान और एविएशन के क्षेत्र में देश का नाम रोशन कर आगे बढ़ा रही हैं। भालौठ के वीर सपूत कैप्टन प्रह्लाद सिंह को 5 दिसंबर 1971 को पूर्वी मोर्चे पर कंपनी की एक प्लाटून का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी मिली थी। प्रह्लाद दुश्मन का पीछा करते गए और शिखर पर चढ़ते गए। दुश्मनों की ओर से मंझोली मशीनगन से की जा रही गोलियों की बौछार के आगे दीवार की तरह अड़ गए थे और तब तक दुश्मनों के सामने डटे रहे थे, जब तक मिशन को सफलता नहीं मिली थी। मिशन पूरा होने बाद वह जमीन पर गिर पड़े थे। उन्हें गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया। कैप्टन प्रह्लाद ने 1962 के चीन युद्ध और 1965 व 1971 के पाकिस्तान युद्ध में अहम भूमिका निभाई थी। अदम्य साहस दिखाने के चलते उन्हें जीवित रहते हुए राष्ट्रपति ने वीर चक्र देकर सम्मानित किया था। जंग के एक साल बाद पता चला- जिंदा हैं कैप्टन प्रह्लाद पुत्रवधू उर्मिला देवी बताती हैं कि 1971 की लड़ाई में दुश्मनों का सामना करते समय घायल होने के एक साल बाद तक भी कैप्टन प्रह्लाद घर नहीं पहुंचे थे। इस अंतराल में उनका अस्पताल में उपचार चल रहा था। उन्होंने गांव में चिट्ठी भेजी तो ग्रामीणों को पता चला कि वह जीवित हैं। उर्मिला देवी ने बताया कि उनके बेटे बिजेंद्र श्योराण ने पिता की लिखावट पहचान कर गांव वालों को बताया। इससे पहले गांव में सभी लोग मान चुके थे कि वह शहीद हो गए हैं।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jun 06, 2026, 16:09 IST
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