UN: इस्राइल-लेबनान जंग में पर्यावरण को भारी क्षति; हमलों से बाग-बगीचे राख, उजड़े वन्यजीव आवास, कृषि भूमि नष्ट
सशस्त्र विद्रोही गुट हिज्बुल्ला के हमलों से उत्पन्न सुरक्षा खतरे के जवाब में की गई इस्राइली सैन्य कार्रवाई का प्रभाव केवल सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दक्षिणी लेबनान का सामाजिक और प्राकृतिक ताना-बाना भी इसकी चपेट में आ गया। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम और मानवीय संगठनों की रिपोर्ट के अनुसार युद्ध में कृषि भूमि नष्ट हुई, जंगलों और जैव विविधता को भारी नुकसान पहुंचा, जबकि जल स्रोतों और मिट्टी में प्रदूषण बढ़ने से स्थानीय आबादी पर दीर्घकालिक खतरा पैदा हो गया। तेल भंडारण स्थलों, औद्योगिक ढांचे और ऊर्जा संयंत्रों को हुई क्षति ने समुद्री और स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र को भी प्रभावित किया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि संघर्ष भले ही सशस्त्र गुटों और राज्यों के बीच हो, लेकिन उसकी कीमत सबसे अधिक आम नागरिक ही चुकाते है। यह भी पढ़ें - Iran Unrest: हजारों गिरफ्तार और 5000 से भी ज्यादा मौतें; ईरान में नहीं रुक रहे प्रदर्शन, ट्रंप बोले- मदद आ रही 21वीं सदी के बड़े युद्धों में है शुमार अक्तूबर से नवंबर 2024 के बीच इस्राइली हवाई हमलों की संख्या 21वीं सदी में वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक दर्ज किए गए हमलों में शामिल रही। इस संघर्ष में मानवीय क्षति भयावह रही। 4,000 से अधिक लोगों की मौत, 17,000 से ज्यादा घायल और लगभग 12 लाख लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हुए, लेकिन युद्ध का एक अपेक्षाकृत अनदेखा पहलू पर्यावरण पर पड़ा। उसका गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव है। मिट्टी-पानी भी प्रभावित दक्षिणी लेबनान आज भी युद्ध के ऐसे जख्म ढो रहा है, जो केवल इमारतों या सड़कों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उसकी मिट्टी, जंगलों, पानी और जीवनयापन की पूरी संरचना को प्रभावित कर चुके हैं। नवंबर 2024 में नाममात्र के संघर्षविराम के एक साल बाद भी, इस क्षेत्र में पर्यावरणीय तबाही के निशान साफ दिखाई देते हैं। एवोकाडो के बाग पूरी तरह खत्म हो चुके हैं। किसान बताते हैं कि मधुमक्खियों के छत्ते नष्ट हो गए हैं, जिससे उन हजारों परिवारों की आजीविका भी उजड़ गई है जो इन पर निर्भर थे। यह भी पढ़ें - Iran-India Relations: '3000 साल पुराने हैं भारत-ईरान के रिश्ते, चाबहार पर काम अच्छे से होगा', ईरानी प्रतिनिधि बिना फटे बमों से खतरा बरकरार इस्राइली हमलों से खेतों और जंगलों में भीषण आग लगी, जबकि शेल के टुकड़े और बिना फटे बम अब भी जमीन में दबे हुए हैं। इनसे खतरा बरकरार है। ये दृश्य बड़े पैमाने की पारिस्थितिक तबाही का संकेत हैं। खेत, जैतून के बाग और देवदार व चीड़ के जंगल बड़े पैमाने पर जल गए। जल संसाधन प्रदूषित हुए, पाइपलाइन और अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियां नष्ट हो गईं, और विस्फोटकों व मलबे ने जहरीली धूल तथा खतरनाक रसायनों की एक लंबी लकीर छोड़ दी। वर्ल्ड बैंक के एक आकलन के अनुसार इस नुकसान की मरम्मत के लिए 11 से 14 अरब अमेरिकी डॉलर तक की लागत वाला बहुवर्षीय पुनर्निर्माण कार्यक्रम आवश्यक होगा।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Jan 24, 2026, 01:58 IST
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