आंकड़ों में यातनाएं: हर 10वें मिनट एक महिला की हत्या, इन अपराधों से पारदर्शिता और वस्तुनिष्ठ तरीके से निपटना..

यूएन वुमेन की ताजा रिपोर्ट हमारे समय का सबसे डरावना लैंगिक आंकड़ा देती है कि दुनिया में हर दिन, 137 महिलाओं और लड़कियों को उनके करीबी साथी या परिवार के सदस्य मार देते हैं। यानी दुनिया में हर दस मिनट में एक महिला किसी ऐसे व्यक्ति के हाथों मर रही है, जिसने कभी उससे प्यार करने का दावा किया था। वर्ष 2024 में दुनियाभर में मारी गई लगभग 83,000 महिलाओं और लड़कियों में से 50,000 से ज्यादा की हत्या उनके अपने घरों में हुई, न कि अजनबियों द्वारा किसी अंधेरी गली में। जब भी किसी महिला के खिलाफ सार्वजनिक जगहों पर कोई अपराध होता है, तो हम अधिकारियों पर गुस्सा करते हैं (जैसा कि हमें करना भी चाहिए), लेकिन जब किसी महिला के खिलाफ उसके अपने परिजन ही कोई अपराध करते हैं, तो एक अजीब-सी खामोशी छा जाती है। ऐसा लगता है कि हम शर्मिंदा हैं, पर गुस्सा नहीं। क्या इसलिए कि हम सभी मानते हैं कि ये अपराध और बुरा बर्ताव घर-घर की कहानी है नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक, भारत में 2023 में महिलाओं के खिलाफ 4,48,211 अपराध दर्ज हुए, जो 2022 के 4.45 लाख मामले से ज्यादा हैं। हैरानी की बात है कि महिलाओं के खिलाफ हुए कुल अपराध के 29.8 फीसदी, यानी करीब 1.33 लाख, मामले आईपीसी की धारा 498ए (पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता) के तहत दर्ज हुए। सच तो यह है कि भारतीय महिलाओं के लिए सबसे बड़ा खतरा घर में ही है। एक समाज के तौर पर महिलाओं को देवी या मां के रूप में आदर करने की बात पाखंड के अलावा कुछ भी नहीं है। कुछ लोगों के लिए ये महज आंकड़े होंगे, जिनका उनकी जिंदगी से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन ये आंकड़े हवा में उड़कर नहीं आए हैं। हर संख्या के पीछे एक जीती-जागती औरत है। कुल मिलाकर यह संख्या लाखों में है। ये लाखों महिलाएं अपने साथी की हिंसा और दुर्व्यवहार का शिकार हुई हैं। नेशनल सर्वे बताते हैं कि लगभग 30 फीसदी भारतीय महिलाओं ने अपनी जिंदगी में घरेलू हिंसा का सामना किया है, और ये सिर्फ वे महिलाएं हैं, जिन्होंने इसकी रिपोर्ट की, जिन्होंने पर्दा हटाकर रोशनी में कदम रखा। ये पीड़िता नहीं, बल्कि साहसी योद्धा हैं, क्योंकि ये न सिर्फ अपने साथी, बल्कि समाज के बुरे व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाती हैं। यह बात शोध अध्ययनों से भी साबित होती है, कि घरेलू हिंसा, मनोवैज्ञानिक प्रताड़ना व जबरन नियंत्रण के खिलाफ अक्सर शिकायतें दर्ज नहीं होतीं, क्योंकि इससे परिवार की बदनामी होने का डर रहता है और आम बात यह है कि-लोग क्या कहेंगे घर की चाहरदिवारी के अंदर होने वाली घरेलू हिंसा को पहचानना और उसकी गिनती करना मुश्किल है, क्योंकि मेकअप से चोट के निशान छिपाना और सोशल मीडिया पर घरेलू खुशियों के बारे में पोस्ट करना आसान हो गया है। सच छिपाने के लिए हमारे पास पहले कभी इतने तरीके नहीं थे। हाल ही में, दिल्ली के एक पान मसाला कारोबारी की 40 साल की बहू की आत्महत्या की खबर आई थी। उसकी डायरी में लिखा है कि घर में प्यार नहीं था, वफादारी नहीं थी। यानी उसे मानसिक परेशानी हुई और इसी वजह से उसने यह बड़ा कदम उठाया। दो बच्चों की मां, जो देश की राजधानी के सबसे महंगे इलाकों में से एक में रहती थी, जिसके पास ऐशो-आराम की सुविधाएं थीं, उसे भी जिंदगी से मौत बेहतर लगी। हालांकि, आंकड़ों के तौर पर इसे हिंसा नहीं कहा जाएगा, लेकिन ये ऐसी औरतें हैं, जिन्हें हर रोज थोड़ा-थोड़ा मारा जाता है, जो पितृसत्ता के चंगुल में फंसी हुई हैं। यह एक धीमी हत्या से कम नहीं है। एनसीआरबी ने 2022 में 6,450 से ज्यादा दहेज हत्याएं दर्ज कीं, यानी दहेज के कारण हर दिन लगभग 17 महिलाओं की मौत हो रही है। इसे एक बड़ी चूक कहा जा सकता है। भारत अब भी जीवन साथी या रिश्तेदारों द्वारा महिलाओं की हत्या को स्त्रीद्वेष नहीं मानता है। चूंकि, ये मौतें दहेज के लिए हुई मौतों, आत्महत्या, उकसाने और हत्या में फैली हुई हैं, इसलिए जीवन साथी द्वारा की गई हत्याओं की असली संख्या आधिकारिक तौर पर दर्ज संख्या से निश्चित रूप से काफी अधिक है। अब समय आ गया है कि हम स्त्रियों के प्रति हिंसा की गणना करते समय ज्यादा ईमानदार रहें। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट एक ऐसे पैटर्न को दिखाती है, जो उन खराब रिश्तों में सामने आता है, जो तबाही की ओर बढ़ रहे हैं। इन सभी स्थितियों में कुछ बातें सामान्य हैं, चाहे वे किसी भी वर्ग या आर्थिक स्थिति वाले हों। स्त्रियों पर नियंत्रण की शुरुआत हल्के ढंग से होती है, जिसे अक्सर देखभाल या सुरक्षा समझ लिया जाता है, फिर यह भावनात्मक शोषण और धमकियों, पीछा करने तथा निगरानी करने, शारीरिक हिंसा व अंत में जानलेवा हमलों तक पहुंच जाता है। आजकल इसमें डिजिटल दुरुपयोग भी शामिल हो गया है, जिसमें साइबर स्टॉकिंग एवं बदला लेने के लिए पोर्न का इस्तेमाल महिलाओं को शर्मिंदा करने तथा उनकी इज्जत को धूमिल करने के लिए किया जाता है। इज्जत का डर हमेशा महिला से जुड़ा होता है और उसके जरिये महिलाओं का शोषण व उत्पीड़न किया जाता है। महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध से पारदर्शिता और वस्तुनिष्ठ तरीके से निपटना होगा। हमें पारदर्शिता से शुरुआत करनी होगी, स्त्रीद्वेष के लिए एक अलग श्रेणी होनी चाहिए, जो करीबी साथी और परिवार से जुड़ी हत्याओं से जुड़े हों। हमें इन अपराधों की सही गिनती करनी होगी तथा उन्हें अलग-अलग श्रेणियों में बांटने से गुरेज करना होगा। घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए शरणगाह, प्रतिक्रिया इकाई और पुनर्वास के लिए भारी निवेश की जरूरत है। साथ ही, शिकायत करने वालों की निजता और सुरक्षा भी जरूरी है। घरेलू हिंसा को सिर्फ पारिवारिक मामला नहीं, बल्कि एक गंभीर अपराध मानना चाहिए। डिजिटल दुर्व्यवहार एक नया मोर्चा है, जो युवा महिलाओं को विशेष रूप से कमजोर बनाता है। डिजिटल साक्षरता के अलावा, तस्वीर आधारित ब्लैकमेल और डिजिटल स्टॉकिंग को घरेलू हिंसा के अपराध के तौर पर पहचानना जरूरी है। एक समाज के तौर पर हमारे लिए इस सच्चाई को मानना मुश्किल हो सकता है, लेकिन अगर हमें लड़कियों तथा महिलाओं को सुरक्षित रखना है, तो यह एक जरूरी सवाल है, जिसके लिए ईमानदारी की जरूरत है। जो समाज महिलाओं को सुरक्षित नहीं रख सकता, वह समाज कहलाने के लायक नहीं है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Nov 29, 2025, 03:30 IST
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