Aligarh News: तब बीए के तीसरे सत्र में रोका प्रवेश, आठ साल बाद अब छात्र बनेगा ग्रेजुएट, यह है मामला

ग्रेजुएट बनने के लिए गोंडा के गांव पचावली निवासी महेश को बेशक अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। आठ वर्ष का लंबा वक्त लगा, लेकिन स्थायी लोक अदालत ने उनके तर्कों पर सहमति जताई है। अदालत ने स्नातक के पहले दो सत्रों में पास होने वाले महेश को तीसरे सत्र में प्रवेश लेने से रोकने पर आपत्ति लगा दी है, उसे तीसरे सत्र में प्रवेश देने के आदेश दिए हैं। इस आदेश के जारी होने के बाद उन्होंने बड़ी राहत महसूस की है। वे अब आगामी सत्र में प्रवेश लेने का इंतजार कर रहे हैं। यह मामला अलीगढ़ के गोंडा राजकीय महाविद्यालय से जुड़ा है। छात्र महेश ने स्थायी लोक अदालत में महाविद्यालय के प्राचार्य व डाॅ.बीआर आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा के रजिस्ट्रार के खिलाफ याचिका दायर की। जिसमें कहा कि उसने सत्र 2015-16 में बीए में हिंदी सामान्य, हिंदी साहित्य, अंग्रेजी साहित्य व संस्कृत साहित्य विषय में संस्थागत छात्र के रूप में प्रवेश लिया। पहले वर्ष में उसने परीक्षा पास की, फिर द्वितीय वर्ष में प्रवेश लिया और परीक्षा पास की, मगर दोनों वर्ष की मूल अंकतालिका उसे जारी नहीं की गई। दोनों बार अंक तालिका की फोटो प्रति जारी की गई। असली अंक तालिका प्राप्त करने के लिए प्रयास करने पर दोनों विपक्षी टालमटोल करते रहे। इसके बाद 2017-18 में जब वह तृतीय वर्ष में प्रवेश लेने पहुंचा तो कॉलेज ने यह कहकर प्रवेश नहीं दिया कि आपके पास तीन-तीन साहित्यिक विषय हैं। आपको विश्वविद्यालय के नियम के अनुसार प्रवेश नहीं दिया जा सकता। उसके नोटिसों पर भी उसे जवाब नहीं दिया गया। इस पर याचिका दायर करते हुए महेश ने कहा कि उसका स्नातक होने का सपना अधूरा रह गया। आगे पढ़ाई नहीं कर सका। उसका भविष्य खराब हो गया। समाज में भी छवि खराब हो गई। इस मामले में स्थायी लोक अदालत ने दोनों विपक्षियों को तलब किया। कॉलेज की ओर से तर्क रखा गया कि प्रवेश फार्म पर खुद छात्र ने गलती से इतिहास काटकर हिंदी साहित्य लिखा है, इसलिए उसका प्रवेश रोका गया। इस पर तर्क रखे गए कि पहले दो वर्ष में क्यों नहीं रोका गया। गलती छात्र से हुई तो उसे उसी समय क्यों नहीं बताया गया। पहले वर्ष में ही उस गलती पर फार्म अस्वीकार करना चाहिए था, मगर विश्वविद्यालय की ओर से इसका कोई जवाब नहीं आया। इसी मामले में हाईकोर्ट की कई दलीलों का हवाला देते हुए स्थायी लोक अदालत ने छात्र के हक में निर्णय सुनाया है। स्थायी लोक अदालत के अध्यक्ष शंकर लाल, सदस्य सत्यदेव व आरती की संयुक्त पीठ ने आदेश दिया है कि छात्र को हुए नुकसान की भरपाई के लिए तत्कालीन प्राचार्य के वेतन से 50 हजार रुपये व 10 हजार वाद व्यय दिया जाए। एक माह में भुगतान न होने पर सात फीसदी ब्याज देय होगा। साथ में आगामी सत्र में बीए तृतीय वर्ष के संस्थागत छात्र के रूप में उसे प्रवेश दिया जाए।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jan 17, 2026, 11:16 IST
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