खौफ का दरका तिलिस्म: मां, माटी, मानुष ने ठुकराया, ममताराज ध्वस्त; शाह की रणनीति से सत्ता के अहंकार पर प्रहार
सत्ता जब अपनी स्वाभाविक चमक और जन विश्वास खो देती है, तो वह अक्सर खौफ के अंधेरे को अपना सबसे बड़ा सुरक्षा कवच बना लेती है। बंगाल की राजनीति का यह निर्मम सच रहा है कि जब सत्ता से उम्मीद दम तोड़ने लगती है, तो उसकी जगह राज्य की मशीनरी और वैकल्पिक सत्ता का खौफ ले लेता है। मां, माटी, मानुष के भावुक नारों में लिपटी जिस सत्ता ने कभी वामपंथ के अभेद्य दुर्ग को ढहाया था, वह अपने अवसान के दिनों में जनता के दिलों पर राज करने के बजाय उनके भीतर बैठे उसी खौफ पर निर्भर हो गई थी। यह खौफ था दबंगई का, सिंडिकेट राज का और इस गहरी होती धारणा का कि इस निजाम से पार पाना नामुमकिन है। हालांकि, राजनीति के व्याकरण में खौफ की उम्र सबसे छोटी होती है। जब खौफ की वह महीन रेखा टूटती है, तो सत्ता परिवर्तन कोई संभावना नहीं रह जाती, बल्कि ऐतिहासिक अनिवार्यता बन जाती है। बंगाल में इस खौफ के तिलिस्म को तोड़ने का काम किसी रातों रात हुए चमत्कार ने नहीं किया, बल्कि इसके पीछे बेहद आक्रामक और सधी हुई रणनीतिक बिसात थी। इस मोर्चे पर सत्ता के अहंकार पर सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक प्रहार किया गृह मंत्री अमित शाह ने। शाह के बेबाक, आक्रामक और सत्ता की आंखों में आंखें डालकर दिए गए बयानों ने आम जनमानस के भीतर जमी उस बर्फ को पिघलाने का काम किया, जो डर के मारे जम चुकी थी। शाह ने केवल रैलियां नहीं कीं, उन्होंने सत्ता के खौफ से ग्रस्त कार्यकर्ताओं और मूक मतदाताओं को मानसिक सुरक्षा कवच दिया। उनका यह निरंतर संदेश कि डरने की जरूरत नहीं है, हम ईंट से ईंट बजा देंगे और पूरी ताकत आपके साथ खड़ी हैविपक्ष के लिए संजीवनी की तरह काम कर गया। उन्होंने रैलियों और बयानों से जबरदस्त माहौल बनाया। बूथ स्तर तक सांगठनिक ढांचा खड़ा कर आम मतदाता को भरोसा दिलाया कि निरंकुश दिखने वाली सत्ता को चुनौती ही नहीं दी जा सकती, बल्कि उखाड़ कर फेंका भी जा सकता है। बीते वर्षों में, बंगाल के मतदाताओं ने उम्मीदों के आसमान से शुरू होकर हताशा की खुरदरी जमीन तक का एक लंबा और कष्टप्रद सफर तय किया था। ममता का नेतृत्व जो कभी प्रतिरोध, सादगी और जमीनी ईमानदारी का सबसे मुखर प्रतीक हुआ करता था, एक बड़े वर्ग की नजर में धीरे धीरे दूरस्थ, केन्द्रीकृत और जनता के प्रति जवाबदेही से पूरी तरह विमुख होता चला गया। शासन प्रशासन की नीयत भले ही कागजों पर विकास की रही हो, लेकिन आम जनता की धारणा में यह एक ऐसी दरबारी संस्कृति में तब्दील हो गया, जहां केवल एकतरफा नियंत्रण, सत्ता का संरक्षण और एक बेलगाम अहंकार ही सर्वोपरि था। सत्ताधारी करते रहे घोटाले, बढ़ता गया आक्रोश खतरे की घंटियां और नैतिक पतन की सुगबुगाहट तो ममता के पहले कार्यकाल में ही बजने लगी थीं, लेकिन सत्ता के मद में अक्सर कान बहरे हो जाते हैं। शारदा से लेकर रोज वैली तक के घोटालों ने उस नैतिक आवरण को तार-तार कर दिया, जिस पर यह शासन गर्व के साथ खड़ा था। जन आक्रोश के ताबूत में आखिरी कील का काम किया शिक्षा और शिक्षक भर्ती क्षेत्र में हुए घोटालों ने। जब योग्य युवा अपनी नौकरियों के लिए सड़कों पर लाठियां खा रहे हों और सत्ता के करीबियों के घरों से नोटों के पहाड़ निकल रहे हों, तो वह सिर्फ एक खबर नहीं होती, बल्कि समाज के सीने पर किया गया एक ऐसा वार होता है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता। इसने अवाम के गुस्से में एक गहरे नैतिक पतन का तड़का लगा दिया। टूटते भरोसे को थामने और जमीन पर लौटकर अपनी गलतियों को सुधारने के बजाय तृणमूल ने ऐसा आत्मघाती रास्ता चुना, जो आज की कॉरपोरेट राजनीति का सबसे बड़ा मर्ज है। उन्होंने प्रोफेशनल पॉलिटिकल मैनेजमेंट यानी पीआर कंपनियों व चुनाव रणनीतिकारों की शरण ली। डाटा आधारित प्रचार और परसेप्शन इंजीनियरिंग या धारणा निर्माण को ही राजनीति का अंतिम सत्य मान लिया गया। इन रणनीतिकारों ने जवाबदेही और सक्रियता का एक सतही, चमकदार आवरण जरूर तैयार कर दिया, लेकिन इस प्रक्रिया ने राजनीति की मूल आत्मा को ही मार दिया। इसने नेता और जनता के बीच के स्वाभाविक और सहज जुड़ाव की जगह मतदाता की भावनाओं की एल्गोरिदम आधारित व्याख्या को दे दी। जब राजनीति एक्सेल शीट और पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन से चलने लगती है, तो जनता महज डाटा पॉइंट बनकर रह जाती है। इसी का नतीजा था कि एक मजबूत काडर आधारित संगठन भीतर से पूरी तरह खोखला हो गया। जनता की नब्ज पहचानने वालों की जगह वातानुकूलित कमरों में बैठे सलाहकारों ने ले ली। भाजपा ने मजबूत सांगठनिक ढांचे और रणनीति से तोड़ा तिलिस्म विपक्ष ने इसी खोखलेपन का फायदा उठाया। शाह के नेतृत्व में भाजपा ने जहां एक तरफ सत्ता का खौफ खत्म किया, वहीं निचले स्तर पर पनप रहे आक्रोश को एक मजबूत सांगठनिक ढांचा दे दिया। पहचान की राजनीति, क्षेत्रीय अस्मिता की नई परिभाषाओं और सामाजिक ध्रुवीकरण के एक निरंतर विमर्श ने पारंपरिक विभाजनों को पार करते हुए धीरे-धीरे उनके मतदाता आधार का उस हद तक विस्तार कर दिया, जिसकी भनक सत्ता के रणनीतिकारों को उनके डेटा डैशबोर्ड पर कभी नहीं लगी। यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि जो नतीजे सामने आए हैं, वे महज किसी चुनाव में राजनीतिक दल की हार का सूखा आंकड़ा नहीं हैं। यह एक बहुत ही लंबी, परत दर परत और तिल तिल कर घटने वाली प्रक्रिया की तार्किक परिणति है। सुशासन की कमी से उपजी जन थकान, संगठनात्मक ढांचे का क्षरण, नेतृत्व की संवेदनहीनता और शाह की रणनीति द्वारा खौफ के तिलिस्म का टूटना इन सबके संगम ने इस पूरे चुनावी परिदृश्य की इबारत को नए सिरे से लिख दिया। अन्य वीडियो
- Source: www.amarujala.com
- Published: May 05, 2026, 03:23 IST
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