Hasya Poetry: सोहनलाल द्विवेदी की कविता- गुरु एक थे और था एक चेला, चले घूमने पास में था न धेला
गुरु एक थे और था एक चेला, चले घूमने पास में था न धेला। चले चलते-चलते मिली एक नगरी, चमाचम थी सड़कें चमाचम थी डगरी। मिली एक ग्वालिन धरे शीश गगरी, गुरु ने कहा तेज़ ग्वालिन न भग री। बता कौन नगरी, बता कौन राजा, कि जिसके सुयश का यहाँ बजता बाजा। कहा बढ़के ग्वालिन ने महाराज पंडित, पधारे भले हो यहाँ आज पंडित। यह अँधेर नगरी है अनबूझ राजा, टके सेर भाजी, टके सेर खाजा। गुरु ने कहा-जान देना नहीं है, मुसीबत मुझे मोल लेना नहीं है। न जाने की अँधेर हो कौन छन में यहाँ ठीक रहना समझता न मन में।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Nov 29, 2022, 19:46 IST
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