पश्चिम एशिया तनाव: बासमती, डायमंड पॉलिशिंग, ट्रैवल और एयरलाइंस सेक्टर पर मंडरा रहा बड़ा खतरा, जानिए क्या अपडेट

पश्चिम में चल रही भू-राजनीतिक अनिश्चिताएं बनी रहती हैं, यह फिर बढ़ती हैं तो भारत से निर्यात किए जाने वाली वस्तुओं और वहां से सीधे जुड़े सेक्टर पर बुरा असर पड़ेगा। रेटिंग्स एजेंसी क्रिसिल ने एक रिपोर्ट जारी कर बताया है कि, यदि मध्य पूर्व में चल रही भू-राजनीतिक अनिश्चिताएं बनी रहती हैं, तो बासमती चावल, डायमंड पॉलिशिंग, ट्रैवल ऑपरेटर और एयरलाइंस जैसे सेक्टर पर बुरा असर पड़ सकता है, क्योंकि इन सबका सीधा जुड़ाव इन क्षेत्रों से है। इसके अलावा सिरेमिक और फर्टिलाइजर जैसे सेक्टर जो निर्यात लिक्विफाइड नेचुर गैस (एलएनजी) पर अधिक निर्भर हैं, उनके उत्पादन पर जल्द असर पड़ सकता है। इसलिए इन क्षेत्रों में ध्यान देने की आवश्यकता होगी। रिपोर्ट के अनुसार क्रूड से जुड़े सेक्टर जैसे कि डाउनस्ट्रीम आयल रिफाइनर, टायर, पेंट, स्पेशलिटी केमिकल, फ्लेक्सिबल पैकेजिंग और सिंथेटिक टेक्सटाइल पर भी असर पड़ सकता है। मध्य पूर्व के देशों में वैश्विक कच्चे तेल का 30 प्रतिशत और वैश्विक एलएनजी उत्पाद का 20 प्रतिशत हिस्सा है। इसका अधिकरतर हिस्सा होर्मुन स्ट्रेट के जरिए ट्रांसपोर्ट किया जाता है। भारत अपने कच्चे तेल का 85 प्रतिशत और एलएनजी की जरूरत का आधा हिस्सा आयात करता है। इसमें 40 प्रतिशत कच्चा तेल और 50 से 60 प्रतिशत एलएनजी होर्मुन जलडमरूमध्य से भेजा जाता है। अधिकतर शिपिंग जहाजों ने 1 मार्च 2026 से इस रास्ते पर चलना बंद कर दिया है, क्योंकि इस रास्ते पर खतरा बढ़ गया है और इस व्यापरिक रास्ते में किसी भी लंबे समय तक रुकावट का असर पूरे विश्व भर के कच्चे तेल और एलएनजी की उपलब्धता और उनकी कीमतों पर असर डालेगा। कच्चे तेल की कीमतें जनवरी से बढ़ रही है रिपोर्ट बताती हैं कि, कच्चे तेल कीमतें जनवरी-फरवरी 2026 के एवरेज 66-67 प्रति डॉलर बैरल से बढ़कर पहले से ही लगभग 82-84 प्रति डॉलर बैरल हो गई हैं। एशियाई स्पॉट एलएनजी के लिए कीमत 10 डॉलर MMBtu से बढ़कर 24 डॉलर MMBtu हो गई हैं। अगर इसमें लगातार वृद्धि होती रही तो भारत का चालू खाता घाटा बढ़ेगा और महंगाई बढ़ेगी। यह इंडिया इंक के मुनाफ पर भी चोट करेगा। क्योंकि सभी सेक्टर में एनर्जी की अमह भूमिका है। इसके अलावा भारत अपनी लगभग दो तिहाई लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) आयात करता है, जिसमें अधिकतर मध्य पूर्व से आती हैं। एलपीजी का इस्तेमाल मुख्य रूप से घरेलू इस्तेमाल के लिए होता है, साथ ही उद्योग में इसका केवल 10 प्रतिशत फ्यूल के रूप में इस्तेमाल होता है। जिससे इंडिया इंक पर असर थोड़ा कम हो सकता है। रिपोर्ट के अनुसार इसका सबसे तीव्र असर आयात-निर्यात वाले क्षेत्रों और कारोबारियों को होगा। जिसमें एयर/सी फ्रेट कास्ट और इंश्योरेंस प्रीमियम बढ़ा दिया है। जिससे विश्व भर में बड़े ट्रेड एक्सपोजर वाले लोगों के मुनाफे पर असर पड़ सकता है। मध्य पूर्व के साथ भारत का सीधा व्यापार होता है। चालू वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों में कुल निर्यात का 15 प्रतिशत और कुल आयात का 20 प्रतिशत कच्चा तेल और पेट्रोलिमय उत्पादों के अलावा मर्चेडाइज ट्रेड में मुख्य रूप से बासमती चावल, फर्टिलाइजर और रफ/पॉलिश्ड डायमंड, साथ ही कुछ कैपिटल गुड्स और मसाले शामिल हैं। बासमती चावल: पिछले वित्त वर्ष में भारत के लगभग 6 मिलियन टन बासमती निर्यात वॉल्यूम का लगभग 70-72 प्रतिशत हिस्सा मध्य पूर्व और दूसरे पश्चिमी एशियाई देशों को निर्यात हुआ। बासमती चावल इन देशों का मुख्य खाना है, और उनमें से ज़्यादातर की मांग निर्यात से पूरी होती है। हाल के डेवलपमेंट से शिपमेंट में देरी हो सकती है और जल्द ही बासमती ट्रेड वॉल्यूम पर असर पड़ सकता है। लंबे समय तक टकराव से इन इलाकों में काउंटरपार्टीज से पेमेंट में देरी हो सकती है, जिससे वर्किंग कैपिटल साइकिल लंबा हो सकता है। हालांकि, निर्यातकों की स्वस्थ्य बैलेंस शीट क्रेडिट प्रोफाइल को सहारा देती है। फर्टिलाइजर: भारत अपनी फर्टिलाइज़र जरूरत का ~30 प्रतिशत इंपोर्ट करता है और मिडिल ईस्ट को इसका 40 प्रतिशत सप्लाई करता है। देश रॉक फॉस्फेट, फॉस्फोरिक एसिड और म्यूरिएट ऑफ पोटाश जैसे ज़रूरी रॉ मटीरियल और इंटरमीडिएट्स के ~30 प्रतिशत इंपोर्ट के लिए भी इसी इलाके पर निर्भर करता है। चल रही अनिश्चितताओं से आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट आ सकती है जिसका असर पड़ सकता है। डायमंड पॉलिशर पर असर: मध्य पूर्व एक बड़ा कारोबारी हब है, जिसमें इजराइल और यूनाइटेड अरब अमीरात (यूएई) मिलाकर इस वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों में कुल डायमंड का निर्यात का 18 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं। साथ ही इस क्षेत्र में होने वाले ऑक्शन की वजह से भारत के सभी रफ डायमंड आयात का 68 प्रतिशत यूएई और इजराइल से होता है। यहां राहत की बात यह हो सकती है कि पॉलिशर के पास बेल्जियम और हांगकांग जैसे दूसरे कारोबारी हब हैं, जिनके आखिरी खरीदार संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप में हैं। इससे उन्हें उसे सेक्टर पर बुरे असर को संतुलित करने में मदद मिलेगी जो अमेरिकी टैरिफ के दाबव में रहा है। घरेलू एयरलाइंस पर असर: भारतीय एयरलाइंस की कुल उड़ानों में से लगभग 10 प्रतिशत मध्य पूर्व को जाती हैं या वहीं से होकर अन्य जगह जाती हैं। अभी यह उड़ाने बंद हैं, हालांकि ऑपरेशन 3 मार्च से शुरू कर दिया गया है। लेकिन टूरिस्ट और विदेशी नागरिकों को निकालने के लिए, सामान्य होने में अभी समय लगेगा। इसके अलावा, मध्य पूर्व में एयरस्पेस पर पाबंदियों के कारण, भारतीय एयरलाइंस की यूरोप और अमेरिका आने-जाने वाली फ्लाइट्स में फ्यूल का खर्च ज़्यादा होगा क्योंकि डायवर्जन और चक्कर लगाने से उड़ान का समय बढ़ जाएगा। एयरलाइंस की ऑपरेटिंग कॉस्ट का 35-40 प्रतिशत हिस्सा फ्यूल का होता है। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से ऑपरेटिंग मार्जिन पर असर पड़ेगा, क्योंकि एयरलाइंस की पास ऑन करने की क्षमता सीमित है, खासकर डोमेस्टिक रूट्स पर। इसके अलावा, रुपये में कोई भी तेज गिरावट भारतीय एयरलाइनों के मुनाफे पर भी असर डालेगी क्योंकि उनकी लीज लायबिलिटी का एक बड़ा हिस्सा विदेशी करेंसी पर निर्भर है। सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन: एलएनजी इंपोर्ट सेक्टर की कुल मांग का ~40 प्रतिशत है और चल रही अनिश्चितताएं जल्द ही एलएनजी सप्लाई पर असर डाल सकती हैं। हालांकि, इसका असर मुख्य रूप से इंडस्ट्रियल सेगमेंट पर पड़ेगा, जो इंपोर्टेड गैस पर बहुत ज़्यादा निर्भर है और सप्लाई की दिक्कतों के कारण सेल्स वॉल्यूम में गिरावट आ सकती है। फिर भी, इस सेगमेंट में मार्जिन कुछ हद तक कम हो जाएगा, क्योंकि कस्टमर्स के लिए ज़्यादातर अल्टरनेटिव की कीमतें भी क्रूड से जुड़ी हैं, जिनमें भी बढ़ोतरी की उम्मीद है। डाउनस्ट्रीम ऑयल रिफाइनर: तेल की कीमतों में लंबे समय तक बढ़ोतरी से ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन पर दबाव पड़ेगा क्योंकि ज़्यादा इनपुट कॉस्ट रिटेल फ्यूल की कीमतों में बढ़ोतरी से पूरी तरह या तुरंत पास नहीं हो पाएगी। पेंट्स और स्पेशलिटी केमिकल्स सेक्टर: प्रॉफिट मार्जिन पर कुछ दबाव हो सकता है क्योंकि प्रोडक्शन कॉस्ट का ~30 प्रतिशत कच्चे तेल की कीमतों से जुड़ा होता है, जहां प्रतिस्पर्धा की तेजी और दबी हुई मांग कस्टमर्स को बढ़ी हुई इनपुट कीमतें पास करने की क्षमता को सीमित कर सकती है और इस तरह कुछ हद तक मुनाफे पर असर डाल सकती है। टायर सेक्टर: इस सेक्टर की लगभग आधी ऑपरेटिंग कॉस्ट क्रूड ऑयल की कीमतों से जुड़ी है। जबकि टायर प्रोड्यूसर ज़्यादा प्रोडक्ट कीमतों के ज़रिए कॉस्ट में बढ़ोतरी का कुछ हिस्सा पास ऑन कर सकते हैं। फ्लेक्सिबल पैकेजिंग और सिंथेटिक टेक्सटाइल: जबकि इन सेक्टर्स के लिए प्रोडक्शन कॉस्ट का 70-80 प्रतिशत कच्चे तेल ऑयल की कीमतों से जुड़ा होता है, बाद वाली कीमतों में बढ़ोतरी का असर बेहतर डिमांड-सप्लाई सिनेरियो और फर्मों की कस्टमर्स को कॉस्ट पास ऑन करने की क्षमता के कारण, थोड़ी देरी के साथ, मॉडरेट हो सकता है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Mar 05, 2026, 12:56 IST
पूरी ख़बर पढ़ें »

Read More:
Business diary



पश्चिम एशिया तनाव: बासमती, डायमंड पॉलिशिंग, ट्रैवल और एयरलाइंस सेक्टर पर मंडरा रहा बड़ा खतरा, जानिए क्या अपडेट #BusinessDiary #SubahSamachar