साग़र सिद्दीक़ी: मुस्कुराओ बहार के दिन हैं, गुल खिलाओ बहार के दिन हैं
मुस्कुराओ बहार के दिन हैं गुल खिलाओ बहार के दिन हैं दुख़तरान-ए-चमन के क़दमों पर सर झुकाओ बहार के दिन हैं मय नहीं है तो अश्क-ए-ग़म ही सही पी भी जाओ बहार के दिन हैं तुम गए रौनक़-ए-बहार गई तुम न जाओ बहार के दिन हैं हाँ कोई वारदात-ए-साग़र-ओ-मय कुछ सुनाओ बहार के दिन हैं हमारे यूट्यूब चैनल कोSubscribeकरें।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Jan 28, 2026, 12:41 IST
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